टूटकर फूल डाली से कुछ परेशान है,
क्या पड़ा रहेगा वह जहां है,
इस जहान में उसकी क्या गति होगी,
गंतव्य उसका आखिर कहां है।
बड़ा खुशनुमा माहौल था,
जब वह कली बनकर आया था ।
देखकर यहां का सुहाना मंजर,
फूला नहीं समाया था।
कसूर क्या था आखिर उसका,
वह तो अपनी खुशबू ही बिखेर रहा था।
अपनी उपस्थिति से इस जहान का,
अप्रतिम सौंदर्य ही बढ़ा रहा था।
अब ना जाने उसकी मंजिल क्या होगी,
क्या उसका रुप ही बदल दिया जाएगा।
जैसा कुछ कलियों और फूलों के साथ हुआ,
क्या उसे भी वैसे ही मसल दिया जाएगा।
क्या किसी माला में गुंथ कर,
किसी के गले की शोभा बढ़ाऊँगा,
या फिर ऐसे ही किसी मंदिर में,
ईश्वर के सम्मुख चढ़ा दिया जाऊंगा।
हो सकता है किसी मैयत पर जाऊं,
बड़े ही पशोपेश में पड़ा हुआ हूं।
कितना बैचेन और असहाय हूं,
मैं एक फूल डाली से तोड़ा हुआ हूं।
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