बड़े जतन से कमाई थी इज्जत मैंने,
जाने क्यों वह इसे घटाना चाहता है।
बहुत कुछ किया मैंने जमाने के लिए,
पर जाने क्या मुझसे जमाना चाहता है।
दिलों में छाया अंधेरा अपनों में ही,
जाने क्यों इसे बढ़ाना चाहता है
तिल तिल जलकर घर को रोशन किया।
जाने क्यूँ शमा को बुझाना चाहता है ।
लाख समझा लो तुम किसी को,
पर वह कहां मानना चाहता है।
बड़ा बेरहम है यह जालिम जमाना,
बस अपनी ही चलाना चाहता है।
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