यह यात्रा वृतांत सन 1977 का है । दूरदर्शन केंद्र मुंबई में सेवा के दौरान , 3 महीने की ट्रेनिंग के लिए मुझे दिल्ली भेजा गया। देश के अन्य शहरों से भी दूरदर्शन एवं आकाशवाणी केंद्रों से इंजीनियर ट्रेनिंग के लिए आए थे। ट्रेनिंग अवधि के दौरान 3 दिन की छुट्टियों में हमारा 7 लोगों का समूह , एक ट्रैवल कंपनी की बस के द्वारा, देहरादून,मसूरी, ऋषिकेश, हरिद्वार दर्शन के लिए रवाना हुआ ।रास्ते भर रमणीक दृश्य देखते हुए, देहरादून , मसूरी तक यात्रा की। इसके पश्चात वहां से ऋषिकेश पहुंचे। बस के ड्राइवर ने आधे घंटे का समय दिया और कहा कि इस समय अवधि में लक्ष्मण झूला के उस पार जाकर भ्रमण कर आ जाएं। हमारा समूह कुछ मस्ती में था तो समय होने पर एक साथी ने कहा कि समय हो रहा है जल्दी चलें तो दूसरे ने कहा कि हम 7 लोग हैं छोड़कर थोड़े ही जा सकते हैं, और इस तरह आराम से वापस बस स्टैंड पर पहुंचे।
वहां जाकर देखा तो हमारे होश उड़ गए। हमारी बस वहां नहीं थी। हमने आसपास पूछा तो उन्होंने बताया कि इस बस को तो गए हुए लगभग 20 मिनट हो चुके हैं। अब करते क्या ? हरिद्वार जाने वाली बस का इंतजार किया, बस आई, तुरंत उसमें बैठे और हरिद्वार पहुंचे। वहां पहुंचकर गंगा नदी के किनारे गए और आसपास नजर दौड़ाई तो पुल के उस पार बस खड़ी हुई नजर आई ।जल्दी-जल्दी चल कर बस तक पहुंचे और ड्राइवर पर बरसने लगे।लेकिन ड्राइवर ने अन्य यात्रियों को पहले ही समझा दिया था , तो दूसरे यात्री हमारे ऊपर हावी होने लगे। हमारे लिए चुप हो जाने के अलावा और दूसरा रास्ता नहीं था। क्योंकि बस को रवाना होने में कुछ ही समय बचा था , तो ड्राइवर ने में सिर्फ 15 मिनट का समय दिया।इतने कम समय में हम स्नान नहीं कर पाये, सिर्फ हाथ और मुंह पर गंगा जी का पानी लगाया और बस में बैठकर दिल्ली के लिए रवाना हो गए। सच ही कहा है कि समय की कीमत पहिचाननी चाहिए।
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