यूं न सितम ढ़ाओ इन प्यार के मारों पर,
तुम्हारी राह में फूल बिछाते इन कुंवारों पर।
बहुत बेजार हो चुके हैं तुम्हारे इन्तजार में,
अब तो कुछ तो रहम खाओ हम बेचारों पर।
कली-कली,फूल-फूल चमन में खिल गये,
पर देखे थे जो ख़्वाब वो सब अधूरे रह गये,
तुमने कहा था आज तो आने को,
पर हम फिर राह तकते रह गये।
मैं तो यहां हूं और तुम न जाने कहां,
ढूंढा था हमने तुम्हें यहां और वहां।
कर दो अब तो इस इंतजार की इन्तहाँ,
तभी बस पाएगा हमारे दिल का जहां।
न जाने क्यों हमें तुम्हारी याद आती है,
जमीं से आसमांं तक यही फरियाद आती है,
चले आओ अब तो सभी फासले मिटा कर,
अब तो रोज कयामत की रात आती है।
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