शुक्रवार, 28 अप्रैल 2023

पुरवाई-रुसवाई -- कविता

जब-जब भी चली यह सुहानी पुरवाई,

 सच कहता हूं प्रिये तुम्हारी याद आई। 

 तुमको लेकर देखे थे मैंने जो सपने,

 अभी तक नहीं हो पाए वे अपने। 

 मेरा दिल तुम्हारे नाम से ही धड़कता है,

 दिल रह-रह कर बस तुम्हें ही याद करता है।

  मेरे दिल की आवाज नहीं दी तुम्हें सुनाई,

  सह नहीं पा रहा हूं मैं तुम्हारी यह रुसवाई।


स्वरचित-सतीश गुप्ता पोरवाल, जयपुर।

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