सुभाष को कोई जवाब न देते हुए राम नारायण ने अपनी आंखों से चश्मा उतारा और कुर्ते की छोर से उसे पोंछने लगे,शायद उन्हें कुछ समय चाहिए था सोचने के लिए।उन्होंने सुभाष को आज नहीं जाने के लिए कहा और सुकेश को कहा कि आओ अंदर बैठते हैं फिर सोचते हैं। अंदर आकर उन्होंने सुकेश को कहा कि जाओ, नहा धोकर तरोताजा हो जाओ, कुछ नाश्ता करेंगे और फिर बातचीत करते हैं ।सुकेश स्नानघर की ओर रवाना हो गया और राम नारायण सोच विचार की ओर बढ़े और अपने सुभाष के साथ हुए घटनाक्रम के दौर में पहुंच गए।
सुभाष के एक बेटा और दो बेटियां थीं। दोनों बेटियों की शादियां, शिक्षा पूर्ण होने के बाद, हो चुकी थीं और वे अपने परिवार में खुश थीं। सुभाष ने अपने बेटे को उच्च शिक्षा दिलवाई, वह एक कंपनी में इंजीनियर हो गया और 2 साल बाद ही जर्मनी में एक अच्छी कंपनी में नौकरी पाकर वहां चला गया। पिछले 20 सालों से अपने परिवार के साथ वह वहीं पर था। पिछले वर्ष उनके बेटे ने उन्हें कहा कि आप और माताजी दोनों ही वहां बुढ़ापे में अकेले हैं काफी तकलीफ होती होगी, तो क्यों न आप लोग भी हमारे साथ जर्मनी में ही आकर रहें। वहां का मकान बेच देंगे और यहां पर थोड़ा बड़ा मकान ले लेंगे ताकि आपको और हमें कोई असुविधा ना हो। बेटे की बात मानकर सुभाष ने मकान बेचने की कोशिश की लेकिन समय रहते ऐसा नहीं हो पाया,और वे दोनों , बेटे के साथ जर्मनी चले गए। लेकिन ज्यादा समय तक वहां रह नहीं पाये। शुरू में तो उनकी बहू और बच्चों ने खूब आवाभगत की ,बहुत आदर सत्कार किया। लेकिन समय के साथ धीरे-धीरे उसमें कमी आती गई। कभी-कभी तो किसी बात पर झगड़ते और अनादर कर बैठते। कुछ समय तो सुभाष और उनकी पत्नी ने यह सब बर्दाश्त किया लेकिन जब पानी सर से ऊपर गुजरने लगा तो वे वापस अपने देश लौट आए। उन्होंने राम नारायण को सारा वृत्तांत सुनाया। जो आप बीती सुनाई, उसके अनुसार--
उन्होंने कहा कि शुरू शुरू में तो अतिथि तुम कब आओगे से शुरुआत होती है, फिर अतिथि आइए आपका स्वागत है ,अतिथि कब तक रहोगे ,फिर अतिथि कब जाओगे, फिर अतिथि जाते क्यों नहीं हो की भावना पनपती जाती है। राम नारायण भाई तुम तो समझ सकते हो कि जो बेलगाम रहे हों, थोड़ा सा भी लगाम उन पर कस दी जाए, यानी उनकी स्वतंत्रता में थोड़ी सी भी बाधा आ जाए तो वह सहन नहीं होता और धीरे-धीरे तकरार होने लगती है और बढ़ती ही जाती है। वह तो अच्छा था हमने मकान नहीं बेचा था, तो हम वापस आकर इस मकान में शांति से रह रहे हैं।
थोड़ी देर में सुकेश स्नानादि से निवृत्त होकर पिताजी के पास आकर बैठ गया। इस बीच पिताजी ने चाय बना ली थी और साथ में बिस्किट रख दिए थे ।चाय की चुस्की लेते हुए फिर से सुकेश ने पूछा - तो पिताजी सामान पैक कर लें, चलना ही है ।पिताजी ने तसल्ली से कहना शुरू किया- देखो बेटा तुम लोग वहां शहर में बसे हुए हो, तुम्हारी मां को गुजरे हुए भी कई साल हो चुके हैं,मैं यहाँ शांतिपूर्वक अपना बुढ़ापा गुजार रहा हूं, मुझे किसी तरह की कोई तकलीफ नहीं है घर की सफाई,खाना बनाना ,बर्तन आदि के लिए एक महिला लगा रखी है जो वह यह काम कर जाती है बाकी मेरे हम उम्र साथियों के साथ समय गुजर जाता है। मैंने निर्णय कर लिया है कि मैं तुम्हारे साथ जरूर चलूंगा । यह सुनकर कमल प्रसन्न हो गया और बोला तो पिताजी सारा सामान पैक कर लेते हैं तो पिता जी बोले-सारा सामान नहीं केवल कुछ ही , मैं सिर्फ 15 दिन वहां रहूँगा और तुम लोगों के साथ हंसी-खुशी यह समय व्यतीत कर वापस यहां आऊंगा। शेष समय यहीं पर बिताऊंगा अपने साथियों के साथ। विश्वास के साथ उन्होंने यह कहा, सुकेश उनका चेहरा देखता ही रह गया।
उसे शायद नहीं मालूम था कि दूसरों के अनुभव से भी सबक लिया जा सकता है।
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