गुरुवार, 19 दिसंबर 2024

हासिल ना हुआ -- कविता

 जो हासिल न हो सका ,आखिर उसका मलाल क्यों करें,

हम खुद अपने आप में सिमट जाएं, ऐसा हाल क्यों करें।

 तमन्ना तो हर किसी की होती है बहुत कुछ पाने की,

  ना मिले तो जरूरत है अपने आप को समझाने की। 

मुसाफिर को जाना कहीं है लेकिन कहीं और जाएंगे,

 इस तरह भटकेंगे तो आखिर मंजिल को कैसे पाएंगे।

कुछ लोग कहते हैं कि क्या करें किस्मत में नहीं था, 

लेकिन सच तो यह है कि जितना करना था किया नहीं था।

मौसम आते हैं, जाते हैं और फिर लौट कर आते हैं,

सूरज और चंदा रात को दिन, दिन को रात बनाते हैं।

समय कभी भी स्थाई रूप से कहीं नहीं जाता है,

जो कर्म करता है उसका फल अवश्य ही पाता है।

जो यह सोचते हैं कि यह तो हमें हासिल नहीं होगा,

 तो मानिए कि वह हासिल करने के काबिल नहीं होगा।


Mssa


सोमवार, 16 दिसंबर 2024

तराने बहुत हैं -- कविता

 तराने बहुत हैं, गुनगुनाने की चाहत तो हो,

सरगम बसी हो दिल में, तो कोई राहत तो हो।

गमों की पोटली तले जब दिल हो जाए बोझिल, 

छेड़ दो जो कोई तराना, तो खुश हो जाए दिल।

हर रोज जो दिन होता है तो रात भी तो होगी ही,

खुशी की ही क्यों, गम की भी बात तो होगी ही।

खुशहाल जो हो जिंदगी,तो लुटा दो खुशी का खजाना,

आज ही जी लो जी भर के,कल को किसने जाना।

सपने जो देखो तो उन्हें पिरोकर एक कहानी बना दो,

मुस्कुराती,खिलखिलाती सी खुशनुमा जिंदगानी बना दो।

जिंदगी में जिंदगी जीने को,एक नहीं, कई कई बहाने हैं,

दिल में जो गुनगुनाने की चाहत हो,तो कई कई तराने हैं।


Mssa 

मेरा दर्द -- कविता

 बेदर्द अपने,बेदर्द पराए, यहां बेदर्द है हर कोई,

 हर कोई अपना दर्द जाने ,मेरा दर्द न जाने कोई।

कितने कांटे हैं मेरी राहों में, यह कोई न जाने,

 मैं कितना ही जताऊं जमाने को,कोई न माने। 

प्रबल हो उठती हैं मेरी भी इच्छाएं, कभी-कभी 

चाहता हूं कुछ तो पूरी हो‌ जाएं,अभी बस अभी।

ये इच्छाएं या अभिलाषाएं कुछ सिमटती हुईं,

 चाहती नहीं छोड़ना, रहती हैं मुझसे लिपटती हुईं।

 समंदर की लहरों की मानिंद दुख आते हैं जाते नहीं,

 मेरे ही घर में क्यों, दूसरों के घर में डेरा जमाते नहीं।

क्या इनका मेरे ऊपर, पिछले जन्म का कोई कर्ज है,

 इसीलिए क्या मुझको सताना इनका एकमात्र फर्ज है। 

 अब तो दिल को समझाता हूं यही दर्द तेरे भाग्य में है,

 नहीं कोई मात्रा,भार,मापनी तुम्हारे अपने काव्य में है।

शनिवार, 23 नवंबर 2024

उड़ा दिए लाखों महफिल में -- गज़ल

 उड़ा दिए लाखों महफिल में हमने फकत सुकून पाने को, 

 मालूम न था मिलेगी बेचैनी बेचारे दिल को तड़पाने को।

 वह मंजर क्यों भयानक हुआ हमने तो दर्दे दिल बयां किया,

‌ मालूम न था एक ही चिंगारी काफी है मेरा घर जलाने को।

सपनों को हर पल संजोते रहे ,टूटन से हर पल बचाते रहे,

‌सपने ही कातिल बन जुट गए मेरे मन को  हराने को। 

नादान दिल की तमन्ना बढ़ते- बढ़ते हुई हजारों में,

मालूम न था बदल न‌ पायेंगी हकीकत में फसाने को।

क्यों बद्दुआएं दें हम किसी को जमाने भर में ,

 मालूम न था अपने ही लगे थे मेरा घर ढ़हाने को।

आती है सदा कहीं से गमगीन न हो ए सतीश,

यहां कुछ और भी बैठे हैं तेरा घर सजाने को।

Mssa


बुधवार, 23 अक्टूबर 2024

दुल्हन सी भोर - कविता

 नई नवेली दुल्हन सी भोर जब धरा पर उतर आती है,

 पीत‌ चुनर ओढ़ आती जब ,बहुत मन को भाती है।

नया उल्लास नई कामना जगाती धरा की सखियों में,

 लगता है जैसे सुरमा लगा जती है हमारी अंखियों में।

क्यों न करें हम स्वागत ऐसी नई नवेली दुल्हन का,

 जो सदा ही करे नाश हमारी कल की उलझन का।

 यूं ही नहीं हमें यह भोर सुहानी लगती है,

 हर दिन यही तो एक नई कहानी गढ़ती है।

Vhssm 

शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2024

हर शब्द में सूरत तेरी नज़र आये - कविता

 जिधर देखता हूं बस तू ही नजर आए,

 इस जहां से और कहीं से कोई खबर ना आए। 

तेरी उलझी जुल्फें जब संवर संवर जाए, 

 तेरा खुला मस्त मस्तक ही नजर आए।

देखूं जब तेरी बालियों को लगे ध्वनि यंत्र,

लगता है जैसे फूंक दिया हो वशीकरण मंत्र।

यह जो पहना है सुंदर सा हार मन को लुभाये,

 लेकिन मुझे तो तेरी सुराही सी गर्दन ही भाये।

और जो पहिना है हरी चूड़ियों संग स्वर्णिम कंगन,

लगता है इन्हीं हाथों से करोगी मेरा आलिंगन।

तू अपने होठों से मेरा नाम ले या गीत गुनगुनाए,

मुझे तो बस हर शब्द में सूरत तेरी नज़र आए।


Mssa


बुधवार, 16 अक्टूबर 2024

धरती और आसमान - कविता

 धरती की गहराई को मैं नाप नहीं सकता,

 आसमान की ऊंचाई को मैं भांप नहीं सकता।

 चाहता तो बहुत हूं लेकिन क्या करूं,

  समंदर की चौड़ाई को में लांघ नहीं सकता।

 बन करके भंवरा यहां से वहां डोलता हूं मैं,

 कभी इस कली को कभी उस कली को चूमता हूं मै।

 सच तो यह है कि नहीं मिलता कोई भी ठिकाना,

 यहां से वहां तक बस अपनी पसंद को ढूंढता हूं मैं।

न मिलता किसी जंगल में किसी मकान में,

 ढूंढता फिर रहा मैं उसे सारे जहान में। 

 थक गया हूं इस धरा पर उसे ढूंढते हुए,

 पाने को उसे दिल चाहे उड़ना‌ आसमान में।

बुधवार, 9 अक्टूबर 2024

मेरी हिंदी भाषा -- कविता

 तन हिंद का, मन हिंद का, करेंगे कुछ मनमानी,

 हिंदी को सर्वव्यापी करने की हमने है ठानी।

जन-जन के बोले जाने की भाषा है हिंदी,

हर दिल के भावों की आशा है हिंदी।

हम हिंद के वासी, हमें इस पर अभिमान है,

 भाषा की बात करें तो हिंदी हमारा मान है।

बोलें हिंदी,सोचें हिंदी ,मन में बसी बस हिंदी है,

 ज्यों स्त्री के मस्तक का सौंदर्य उसकी बिंदी है।

यही तो वह भाषा है जो सबसे ज्यादा समृद्ध है,

 यही तो वह भाषा है जो सबसे ज्यादा प्रसिद्ध है।

इस देश के हर कोने में यही तो बोली जाती है,

इस बोली में लगता जैसे मिश्री घोली जाती है। 

देश हो या विदेश हिंदी में अपनत्व झलकता है ,

 कितना भी अनजान हो, हमें अपना समझता है।

अपनी हिंदी भाषा पर मैं क्यों न अभिमान करुं,

पूरे देश की यह भाषा हो, क्यों न यह अभियान करुं।

*स्वरचित एवं मौलिक- सतीश गुप्ता पोरवाल, जयपुर।*

सोमवार, 30 सितंबर 2024

बस इतना चाहूं -- कविता

 समझना चाहेंगे तभी तो समझ पायेंगे,

 वरना तो चक्रव्यूह में फसते जाएंगे।

 यह जग तो है जाल माया का,

 क्या लेकर आथे थे, क्या लेकर जाएंगे। 

न चाहते थे आना,न चाहते हैं जाना, 

पर नियति को तो था हमको जग में लाना। 

भवसागर में नहीं यूं ही डोलते रहना,

 जाने दुनिया, काम ऐसा कर जाना। 

पर्वत से ऊंचे ख्वाब नहीं पालना ,

सागर की गहराई नहीं नापना।

 जीवन में बस मैं इतना चाहूं,

जब भी हो, किसी के काम आ जाना।

 हे दयानिधि मैं द्वार तुम्हारे आया,

 झूठी है दुनिया, झूठी है यह काया। 

 ढूंढ रहा था पागल भंवरा बन,

 सच क्या है यह तेरी भक्ति में ही पाया।


Mssa


गुरुवार, 22 अगस्त 2024

उस बस यात्रा के दौरान - संस्मरण

 बात उस समय की है जब मैं कक्षा दसवीं में पढ़ रहा था । तीन दिन की छुट्टियां थीं,मैं और मेरा छोटा भाई बारां से कोटा आये। कोटा में 3 दिन बुआ और मौसी के रहने के पश्चात वापस बारां के लिए रवाना हुए। लाल रंग की बस थी। उस समय बसें "मुंह" वाली हुआ करती थी। रास्ते में काली सिंध नदी पड़ती है।अत्यधिक बरसात हो जाने के कारण पुलिया के ऊपर काफी पानी बह रहा था।‌नदी का पाट भी काफी लंबा था ।कुछ बसें, जीप,कार बगैरह वहीं रूके हुए थे। हमारी बस का ड्राइवर थोड़ा 'मूडी' लेकिन हिम्मतवाला था, जिसे लोग गुरु के नाम से पुकारते थे।उन्होंने हिम्मत के साथ बस को नदी की पुलिया पर उतार दिया। बस आगे बढ़ती गई ,लगभग मध्य में पहुंचने के बाद बस के पहियों पर बहुत ज्यादा दबाव पड़ा और  'स्टीयरिंग' घूमने लगा।ड्राइवर गुरु जी के ललाट पर पसीना आने लगा, उन्होंने तुरंत कंडक्टर को आवाज देकर बुलाया और कहा कि 'स्टियरिंग' को तुम भी पकड़ो और‌ जरा भी घूमने मत देना, कंडक्टर ने ऐसा ही किया।हम लोगों की सांस ऊपर-नीचे हो रही थी, हलक सूख रहा था, कहीं बस बह गई तो ! सभी यात्रियों ने बजरंगबली की जय - बजरंगबली की जय नारे लगाना शुरू किया और बस धीरे-धीरे चलती हुई नदी को पार कर गई। सब यात्रियों की सांस में सांस आई। 

वह घटना आज तक मस्तिष्क पर अंकित है।

Mssa

रविवार, 4 अगस्त 2024

मुक्तक

 फिर एक बार तेरी महफिल में आएंगे सनम,

 तेरे दर पर दर्द भरे नगमे गुनगुनाएंगे सनम।

 फिर भी तू न  मानी तो, अब तू ही बता,

  तेरी दुनियां को छोड़कर,कहां जाएंगे सनम। (१)

अंदर का शोर मुझे सोने नहीं देता,

कुछ अनहोनी तो होने नहीं देता।

कुछ पाऊं ना पाऊं यह दीगर बात है,

लेकिन जो कुछ पाया,वह खोने नहीं देता। (२)

नहीं नहीं, नहीं मैं फूलों का सुंदर हार हूं,

 किसी न किसी के लिए कुछ तो गुनहगार हूं।

 मैं तो जानता हूं बस इतना ही ,

 कि मुरझाए फूलों के लिए मैं जाने बहार हूं। (३)

मन नहीं है रिक्त यह तो धर्म से है लबालब 

तन नहीं है थका हुआ यह कर्म करे अब-तब

अपनी प्रकृति से कर दे सब को प्रभावित 

ऊपर वाला दे अवसर उन्हें जब-जब। (४)

मानव जन्म मिला है,धर्म-कर्म से रच ले नई कहानी,

अंत समय तो फिर,यह काया मिट्टी में है मिल जानी। (5)

तुम नहीं थे अपने फिर क्यों हमें अपने लगे थे,

मेरे अधूरे जीवन के तुम क्यों पूरक सपने लगे थे।

तुम तो शायद अपने आप को ही अपना समझते हो,

गलत हम ही थे,परायों को अपना समझने लगे थे। (6)

माना कि हमारे वादे पर तुम्हें एतबार नहीं है, 

ये न सोचो कि हमें तुम्हारा इन्तज़ार नहीं है। 

ये समझ लो कि हम त कतई बेवफा नहीं ,

नहीं हो सकता कि हमारा दिल बेकरार नहीं है।(7)

हरी-भरी हुई धरती,चहुं और छाई हरियाली है,

 उदासी हुई दूर अब मन पर छाई खुशहाली है।

गमों के बोझ को क्योंकर ढोना है हम सबको,

क्यों न समझें हम कि आज ही होली और दिवाली है।(8)

न जाने सब की नींद को क्या हो गया है,

कोई तो फूलों की क्यारी में कांटे बो गया है।

चैन और सुकून जो था जिंदगी में भरपूर,

 अब वह न जाने कहां खो गया है।(9)

अक्सर जो जैसा होता है वैसा नजर नहीं आता,

तुम्हारा यह स्वांग हमें बिल्कुल भी नहीं भाता।

क्यों असली को छोड़ नकली बना फिरता है,

जो दिल में है वही बात जबान पर क्यों नहीं लाता।(10)

आज के इस दौर में कोई भी कहां महफूज है,

हर शख्स बस अपने में ही मशगूल हैं,

स्पष्ट कहूं तो बस यही कहूं कि,

है यहां खामोश लब, चीखती रूह है। (11)



बुधवार, 24 जुलाई 2024

रास्ते का पत्थर -- कविता

 इस फरेबी दुनिया में,

 हम प्यार से ठगे गये।

 हमने फूल बिछाए राहों में,

 वो कांटे बिछाकर चले गए।

 अब तो फूलों पर भी ऐतबार न रहा,

 प्यार का अब तो खुमार भी न रहा ।

राह निहारते थे जिनकी पल पल,

 अब तो उनका इंतजार भी न रहा। 

आखिर कहां जाएं, क्या करें ,

राह कोई नजर आती नहीं,

 अनमना, गुमसुम सा हो रहा मन,

बात कोई भी उमंग जगाती नहीं। 

कटी पतंग सा डोल रहा है मन,

 विरह वेदना से भर गया हूं मैं।

तेरी राह में  बिछाए थे फूल,

 लेकिन रास्ते का पत्थर बन गया हूं मैं।

सोमवार, 22 जुलाई 2024

गमों की बरसात - कविता

 खुशियों की कोई सौगत मेरे लिए नहीं थी,

 गमों की पोटली लिए सब मेरे लिए खड़े थे।

 सबकी राहों में बिछ रहे थे फूल,

  मेरी राह में बस कांटे पड़े थे। 

दुनिया में जब आया तो बहुत रो रहा था,

मेरे साथ साथ कोई भी न आंसू न बहा रहे थे।

 कुछ एक दूसरे को दे रहे थे बधाई, 

और कुछ मुझे देखकर मुस्कुरा रहे थे।

दुनिया के उपवन में गुमसुम खड़ा था,

 खुशियों के फूल मुझे चुनने थे।

 जो हो चुका उसका चोला हटाकर,

  अब तो नए सपने मुझे बुनने थे।

पतझड़ का मौसम बहुत झेल चुका,

 अब तो मुझ पर भी बहार आने दो। 

गमों के बोझ को कांधे से हटाकर, 

खुशियों की कल-कल नदिया बहाने दो। 

आसमान में घनघोर घटा छा गई ,

लेकिन कहीं और जाकर पानी बरसा गई।

बादलों की बारिश में हम अकेले ही थे, 

जब बरसी खुशियां न जाने भीड़ कहां से आ गई।

शनिवार, 20 जुलाई 2024

जो दर्द दिया था तूने- कविता

 चैन खो कर बेचैन हो चला था मैं,

 हर शहर हर गली की धूल फांकता रहा।

 सुकून चाहिए था मुझे कुछ तो,

 इसलिए कभी यहां कभी  वहां भागता रहा। 

तेरे साथ बिताए पल बहुत खूबसूरत थे,

 उन यादों की परछाई मेरे पीछे पड़ी थी।

 पुकार रहे थे मुझे कई कई मेले,

लेकिन तन्हाई बस अपने पर अड़ी थी। 

खत भी तो लिखे थे तूने मुझे,

 इन खतों की स्याही क्यों फीकी हो गई।

आती थी जो तुझसे प्यार की महक,

 वह अब‌ न जाने कहां खो गई।

  तारों की छांव भी कुछ काम न आई,

चंदा की शीतलता भी थक-हार गई।

 एक तसल्ली अक्सर आकर मुझे बहलाती,

 लेकिन वह भी लौट लौट कर हर बार गई। 

दिल मेरा इतना भी नादान नहीं ,

आखिर कब तक इसको समझाऊंगा।

 जो दर्द दिया था तूने मुझको,

 उसको ताजिंदगी कैसे भूल पाऊंगा।


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रविवार, 9 जून 2024

कविता -- मंजिल

 बीच राह में क्यों अड़ा हुआ,

 क्यों गुमसुम सा खड़ा हुआ।

सोचेगा तो रोशनी मिल ही जायेगी,

 चलते-चलते मंजिल मिल ही जायेगी।

पतझड़ आता है तो आने दो,

 पत्ते गिरते हैं तो गिरने दो।

 फूल गिरे पर कली खिल ही जायेगी,

 चलते-चलते मंजिल मिल ही जायेगी। 

घबराना नहीं किसी भी मोड़ पर,

नहीं पहुंचा है अभी धरती के छोर पर।

 धैर्य और हिम्मत से दिशा दिख ही जायेगी 

  चलते चलते मंजिल मिल ही जायेगी।

होश कभी भी न खोना,

 निराशा कभी भी न होना।

 दृढ़ निश्चय से हिम्मत मिल ही जायेगी,

 चलते चलते मंजिल मिल ही जायेगी।

Mssa

मंगलवार, 23 अप्रैल 2024

इजहार करके देखो - ग़ज़ल


 हमसे अपने प्यार का इजहार करके देखो,

 ना कहो बार-बार कि इंतजार करके देखो।

 दिल की धड़कन तुम्हारी बढ़ ही जाएगी,

 हमारे प्यार में दिल बेकरार करके देखो।

 यूं स्वस्थ रहना किसे है गवारा,

तुम्हारे प्यार का बीमार करके देखो।

भर जाएगी तुम्हारे दामन में खुशियां, 

प्यार एक बार बेशुमार करके देखो। 

आंखों में जो है तुम्हारे हमें है पता,

जुबां से भी एक बार इकरार करके देखो।


*राब्ता जमीन से आसमान तक

बुधवार, 3 अप्रैल 2024

बुढ़ापे में बेसहारा - कहानी

 नंदूजी गांव में अपनी खेती में मेहनत करके अच्छी कमाई कर लेते थे। तीन बेटे थे उनके, गांव वाले नन्दूजी को खुशकिस्मत मानते थे। नंदूजी ने बेटों को अच्छा पढ़ाया-लिखाया और आगे पढ़ाई के लिए शहर भी भेजा। लोगों ने उनको सलाह दी कि सबसे छोटे बेटे को अपने पास कोई दुकान खुलवा दें, उन्होंने ऐसा ही किया। दोनों बड़े बेटे अच्छी कंपनी में नौकरी पाकर दूर शहर में चले गए और अपने परिवार के साथ समय बिताने लगे। उतनी ही पढ़ाई करके छोटे बेटे ने वहीं दुकान खोल ली और बूढ़े हो चुके मां-बाप की सेवा में लगा रहा।

  कालांतर में ,सबसे छोटे बेटे ने यह महसूस किया कि उसके बड़े भाई जब भी आते हैं बड़े ऑफिसर की तरह व्यवहार करते हैं,मेहमान की तरह रहते और कुछ ही दिनों में वापिस चले जाते। तो सबसे छोटे बेटे ने भी दुकान समेटी और शहर में नौकरी कर ली। वह भी अपने परिवार के साथ वहीं रहने लगा। फिर उसे अच्छा अवसर मिला और विदेश में नौकरी पाकर वहां चला गया। मां-बाप पर बुढ़ापा हावी हो चुका था, कमजोर भी हो चुके थे, क्योंकि कुछ गंभीर बीमारियों ने उनको घेर लिया था। बेटों से बातचीत पड़ोसियों के फोन के जरिए हो पाती थी। धीरे-धीरे बीमारी इतनी बढ़ गई कि दोनों ने बिस्तर पकड़ लिया, दवाएं भी कोई असर नहीं कर रही थीं ।एक दिन नंदू‌जी‌ ने देखा कि उनकी पत्नी की हालत ऐसी हो गई कि सांस लेना भी मुश्किल हो रहा था,तो उन्होंने उसका हाथ अपने हाथ में लेकर ढाढस बंधाया, ‌अपना बिस्तर पत्नी के पास ले लिया और दोनों एक दूसरे के हाथ में हाथ लेकर सो गए ।

‌दोनों ही अगला सवेरा नहीं देख पाए और इसी अवस्था में मृत पाए गए। दोनों का हाथ छुड़ाना भी मुश्किल था अतः एक ही चिता में दोनों का अंतिम संस्कार किया गया। बेटे जब तक गांव आए वे राख में परिवर्तित हो चुके थे।


Akdm

गुरुवार, 28 मार्च 2024

जिंदगी में चाहिए - कविता

 साथ चलना‌ है तो भाई जबान पर लगाम,

 और व्यवहार में ठहराव चाहिए।

जिंदगी उलझी है अनगिनत सवालों में,

 मुझे चंद सवालों का जवाब चाहिए।

 रुकावट बनते हैं जो मेरी राह में डराने को,

  उनसे मुझे टकराव चाहिए।

 जीना दुश्वार किया जिस जमाने ने,

 मुझे उस जमाने का बिखराव चाहिए। 

 उन्मुक्त होकर उड़ता फिरुं खुले आसमां में,

 ऐसा मुझे रंगीन ख्वाब चाहिए।

 जिंदगी गुजर गई कांटों पर चलते-चलते,

 अब अंत में अदद एक गुलाब चाहिए।

 बर्फ सी जम गई है यह जिंदगी,

 जिंदगी चलाने को बस एक अलाव चाहिए।

अकेले-अकेले कब तक चलेंगे,

 अब तो कुछ लोगों से मेल मिलाप चाहिए।

आवारा सी चल रही इस जिंदगी को, 

 अब तो कुछ रख-रखाव चाहिए।


Ckkk 

मंगलवार, 26 मार्च 2024

समंदर में -- कविता

दुनिया भर का सब कुछ नजर आता,

 नहीं झांकते अपने अंदर में।

 सात समंदर पार की डींग हांकते,

 खुद समाए किसी समंदर में।

अपने साए में ही हरदम गुम रहते,

 नहीं घुल-मिल जाते किसी मंजर में।

मानव बनकर करते अजीब सी हरकतें,

खुद मानवता ढूंढते बंदर में।

सौ-सौ झूठ बोलते नहीं अघाते,

 हाथों में फूल,निगाहें रहती खंजर में।

 रहना चाहे खुद बाग बगीचे में,

 चाहे डालें दूसरों को बंजर में।


Mskm

रविवार, 17 मार्च 2024

राजा टोडरमल जी-कविता

 धन्य धन्य हो राजा टोडरमल जी,

 ख्याति रहेगी आज और कल भी।

 बूंदी में जिनने जन्म लिया,

 कार्य कुशलता और बुद्धिसे काम लिया।

 राज्य सेवा में पिता ने लगा दिया,

 सुयोग्य कर्मचारी सिद्ध करके दिखा दिया।

 श्रेष्ठ गुण,स्वामी भक्ति, प्रशासन कुशलता भरी हुई,

 प्रसन्न हो शाहजहां ने राय की उपाधि प्रदान करी।

 अपनी बुद्धिमानी से ऐसे ऐसे कार्य किये,

शाहजहां ने खिलअत,घोड़े हाथी प्रदान किये।

उनमें ऐसी विलक्षण बुद्धि थी,

 सदैव राजकोष में राजस्व वृद्धि की।

21वें वर्ष में उनकी बुद्धि ऐसी खिली,

 कि इस वर्ष में उनका राजा की उपाधि मिली।

 परम मित्र धन्नाशाह जब कंगाल हुआ,

 टोडरमलजी के मन में मलाल हुआ।

 अपने धन से कन्या का विवाह किया,

और इस कर्म से दानी नाम कमाया।

 कृतज्ञ है उनके प्रति पोरवाल का जन-जन,

 हृदयके अंतरतल से हम करते उनको नमन।

करते उनको नमन।

गुरुवार, 18 जनवरी 2024

अयोध्या ने पुकारा है - गीत

 चलो चलें राम जी आए,

 अयोध्या ने पुकारा है।

 दर्शन जो मिले हमको,

  तो यह सौभाग्य हमारा है।


 मेरा दिल क्यों यह व्याकुल है,

 मेरे मन में क्यों उलझन है।

 बिना श्री राम के अब तो,

 न जीवन में गुजारा है।

 चलो चलें राम जी आए,

 अयोध्या ने पुकारा है। 


प्रभु ने वनवास झेला है,

 पापियों ने तंबू में धकेला है। 

बिगाड़ा तो फिर क्या,

 प्रभु ने फिर सुधारा है।

चलो चले रामजी आए,

 अयोध्या ने पुकारा है।


तुम्हारा दिल तो हर्षित है,

मेरा हर रोम पुलकित है।

आशा ने निराशा को,

अब तो हराया है।

चलो चलें राम जी आए,

अयोध्या ने पुकारा है।