नंदूजी गांव में अपनी खेती में मेहनत करके अच्छी कमाई कर लेते थे। तीन बेटे थे उनके, गांव वाले नन्दूजी को खुशकिस्मत मानते थे। नंदूजी ने बेटों को अच्छा पढ़ाया-लिखाया और आगे पढ़ाई के लिए शहर भी भेजा। लोगों ने उनको सलाह दी कि सबसे छोटे बेटे को अपने पास कोई दुकान खुलवा दें, उन्होंने ऐसा ही किया। दोनों बड़े बेटे अच्छी कंपनी में नौकरी पाकर दूर शहर में चले गए और अपने परिवार के साथ समय बिताने लगे। उतनी ही पढ़ाई करके छोटे बेटे ने वहीं दुकान खोल ली और बूढ़े हो चुके मां-बाप की सेवा में लगा रहा।
कालांतर में ,सबसे छोटे बेटे ने यह महसूस किया कि उसके बड़े भाई जब भी आते हैं बड़े ऑफिसर की तरह व्यवहार करते हैं,मेहमान की तरह रहते और कुछ ही दिनों में वापिस चले जाते। तो सबसे छोटे बेटे ने भी दुकान समेटी और शहर में नौकरी कर ली। वह भी अपने परिवार के साथ वहीं रहने लगा। फिर उसे अच्छा अवसर मिला और विदेश में नौकरी पाकर वहां चला गया। मां-बाप पर बुढ़ापा हावी हो चुका था, कमजोर भी हो चुके थे, क्योंकि कुछ गंभीर बीमारियों ने उनको घेर लिया था। बेटों से बातचीत पड़ोसियों के फोन के जरिए हो पाती थी। धीरे-धीरे बीमारी इतनी बढ़ गई कि दोनों ने बिस्तर पकड़ लिया, दवाएं भी कोई असर नहीं कर रही थीं ।एक दिन नंदूजी ने देखा कि उनकी पत्नी की हालत ऐसी हो गई कि सांस लेना भी मुश्किल हो रहा था,तो उन्होंने उसका हाथ अपने हाथ में लेकर ढाढस बंधाया, अपना बिस्तर पत्नी के पास ले लिया और दोनों एक दूसरे के हाथ में हाथ लेकर सो गए ।
दोनों ही अगला सवेरा नहीं देख पाए और इसी अवस्था में मृत पाए गए। दोनों का हाथ छुड़ाना भी मुश्किल था अतः एक ही चिता में दोनों का अंतिम संस्कार किया गया। बेटे जब तक गांव आए वे राख में परिवर्तित हो चुके थे।
Akdm
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