मंगलवार, 27 जनवरी 2026

तेरी कसम -- कविता

 तेरी कसम तेरा वादा,

 सच है कम झूठ है ज्यादा।

 ऐसी बेवफा से क्यों किया,

 हमने प्यार का इरादा।

 हम तो अपने में ही, 

खूब खूब मस्त थे। 

अपना ही कामों में,

रहते  व्यस्त थे। 

 फिर क्यों हमने,

 ऐसा झंझट पाला।

 लगता है जैसे गले में,

 अटक गया हो निवाला।

 हम हो गए अधर झूल में,

 इधर जाएं या उधर जाएं।

  भटक रहे हैं इधर उधर,

आखिर जाएं तो किधर जाएं।

अंधेरे में रास्ता नजर आता नहीं, 

आंखों में जैसे पड़ गया हो जाला।

 अब किसकी दें दुहाई,

किसका दें  हवाला।

शूर तुम वीर तुम -- कविता

 शूर तुम वीर तुम, दुश्मनों के लिए शमशीर तुम, 

जब तक न हो वार कोई तब तक बनो धीर तुम। 

जिनकी क्रोध दृष्टि देख छूट जाए कंपकपी,

ऐसे रणबांकुरों के मस्तक का हो अबीर तुम।


देश प्रेम का सागर हिलोरें मार रहा जहां, 

रग-रग में ऐसा जोश आकर भर रहा कहां।

गीत जब कोई गुनगुनाने लगे देशभक्ति का,

कानों में गूंजे देश राग, समां बन जाये खुशनुमा।


न समझो हमें भीर, शांति के दूत हैं हम,

दुश्मनों की कुटिल चाल पर यमदूत हैं हम।

हम दो नहीं ,चार नहीं ,दस बीस ही नहीं,

तुम्हारी चालों को नाकाम करने को अकूत हैं हम।


देश के जन-जन को नाज हमारे वीर जवानों पर,

दुश्मन का पहरा नहीं हो सकता,हमारे अरमानों पर।

सीमा पर शौर्य देख तुम्हारा, दुश्मन भी घबराये,

ऐसे शूरवीर तुम, खेल जाते हो अपनी जानों पर।

Mssa


सोमवार, 19 जनवरी 2026

गीत - फूल बनकर महक जाऊं

 इस रंग बिरंगी  दुनिया में मुमकिन है कि मैं बहक जाऊं,

आरज़ू है कि मैं तो बस बगिया का फूल बनकर महक जाऊं।


क्या-क्या ख्वाब देखे थे मैंने,पर क्या क्या ख्वाब दिखाये,

सीखना चाहता था क्या-क्या, पर क्या-क्या सबक सिखाए।

वक्त आ गया है कि अब मैं उन सबको सही सबक सिखाऊं,

आरजू है कि मैं तो बस बगिया का फूल बनकर महक जाऊं।


साथ साथ चलना था हमको वे हमको छोड़ कर चले गये,

हम तो फूल थे राहों के, वो हमें पत्थर समझ कर चले गये।

मैं नहीं पत्थर,फूल हूं राह का, यह कैसे उनको समझाऊं,

आरजू है कि मैं तो बस बगिया का,फूल बनकर महक जाऊं।


जमाने के दस्तूर मुझे अब तक भी समझ नहीं आए,

क्या बताऊं कुछ नासमझ लोग मुझे समझाने आए।

दुनियादारी होती है क्या, क्या अब मैं उन्हें समझाऊं,

आरजू है कि मैं तो बस बगिया का फूल बनकर महक जाऊं।

Mssa


रविवार, 18 जनवरी 2026

मुझे कुछ कहना है -- कविता

 अब तक जुबान पर लगाया था ताला ,

लेकिन अब मुझे कुछ कहना है।

 बहुत कुछ सहता रहा मैं,

 लेकिन अब मुझे कुछ नहीं सहना है।

क्या अंबर क्या धरा और क्या हवा,

सभी तो गमगीन हो गए थे।

किसी में भी नहीं था साहस कुछ करने का 

तुमसे तो सभी भयभीत हो गए थे।

ऐसा नहीं है कि तुम सामान्य से अलग,

बलशाली क्रूर और आक्रांता हो।

तुम उन सब से बिल्कुल ही अलग हो,

जो किसी नाराज को प्यार से मनाता हो।

रंगीन ख्वाबों से मेरे होठों को नहीं सिलना है,

होठों पर तो मेरे कमल पुष्प खिलना है,

सीने में दबाये रखा जिन भावों को,

अब नहीं सहना, मुझे कुछ कहना है।


बुधवार, 7 जनवरी 2026

हमारा सुरुर -- विरह कविता

 मन से हमें उतार दिया यह उसका गरुर था

 दिल में जगह बनाएंगे यह हमारा सुरूर था 

दिन तो हमने गुजार दिए देखा उनको ख्वाब में,

 न नींद आती है और न सपने हमको रात में।

दिल तो आखिर दिल जो ठहरा, धड़कता है,

धड़कनों में यादें समाकर यह दिल महकता है।

मैं तेरी राह का फूल हूं चाहे तो होठों का प्यार दे,

या फिर मुझे रास्ते का पत्थर समझ ठोकर मार दे।

आखिर कब तक यूं ही याद करके तुम्हें पुकारता रहूंगा,

इस जानी पहचानी राह पर, तेरी राह निहारता रहूंगा।

जब तू साथ थी, फिजाओं में जैसे थे फूल ही फूल,

अब तो मेरी राहों में जैसे बिखरे पड़े हैं,शूल ही शूल। 

अब जब से तू मुझसे दूर हुई, रही मेरे करीब नहीं,

तेरी जुल्फों की वो ठंडी छांव मुझे नसीब नहीं।

तेरे आ जाने भर से दिल हो जाता था बाग बाग,

अब तो जैसे सीने में सुलग रही है बस आग आग।

मत कर गुमान न जाने क्या से क्या हो जाएगा,

जो सपना तू देख रही वह सपना ही रह जाएगा।

रेत के महल भी कभी लहरों से बच पाते हैं

न कर नादानी, समय के क्षण यह कह जाते हैं।

या तो जैसे गुजर रहे हैं दिन मेरे, तू भी वैसे गुजार ले

या फिर दिल को समझाकर,मुझे फिर से पुकार ले।