सोमवार, 19 जनवरी 2026

गीत - फूल बनकर महक जाऊं

 इस रंग बिरंगी  दुनिया में मुमकिन है कि मैं बहक जाऊं,

आरज़ू है कि मैं तो बस बगिया का फूल बनकर महक जाऊं।


क्या-क्या ख्वाब देखे थे मैंने,पर क्या क्या ख्वाब दिखाये,

सीखना चाहता था क्या-क्या, पर क्या-क्या सबक सिखाए।

वक्त आ गया है कि अब मैं उन सबको सही सबक सिखाऊं,

आरजू है कि मैं तो बस बगिया का फूल बनकर महक जाऊं।


साथ साथ चलना था हमको वे हमको छोड़ कर चले गये,

हम तो फूल थे राहों के, वो हमें पत्थर समझ कर चले गये।

मैं नहीं पत्थर,फूल हूं राह का, यह कैसे उनको समझाऊं,

आरजू है कि मैं तो बस बगिया का,फूल बनकर महक जाऊं।


जमाने के दस्तूर मुझे अब तक भी समझ नहीं आए,

क्या बताऊं कुछ नासमझ लोग मुझे समझाने आए।

दुनियादारी होती है क्या, क्या अब मैं उन्हें समझाऊं,

आरजू है कि मैं तो बस बगिया का फूल बनकर महक जाऊं।

Mssa


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