शनिवार, 15 अगस्त 2020

 स्वतंत्रता दिवस की सभी मित्रोँ को शुभकामनाएँ ।

खुशी तो हेै ही लेकिन साथ मेँ दिल में कुछ कसक भी । इसी संदर्भ मे प्रस्तुत हेै, मेरी एक कविता । (for more--visit my blog. anjaanrah.blogspot.in)


फिर पन्द्रह अगस्त मनाओ

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लो फिर आया  स्वतंत्रता का एहसास दिलाने 

अगस्त का पन्द्रहवा दिवस 

पर मानव मन मेरा पुलकित हुआ नहीं 

कुछ उफनती सी कुछ अनदेखी सी 

उभरती रही सिसक। 

आकांक्षाये सब मर मिटी 

स्वप्न सब फूल से झर गए 

पंछी का मुक्त आकाश में 

विचरण करना अब संभव नहीं 

क्योंकि समय की तेज धार से 

उसके पंख कट गए। 

आओ तुम मेरे साथ आओ 

शंख ध्वनि ध्वनि करो ,अलख जगाओ 

मानव के सुशुप्त मन में चेतना जगाओ 

 और फिर पन्द्रह अगस्त मनाओ।


 सतीश कुमार गुप्ता ,'पोरवाल'


बुधवार, 24 जून 2020

स्त्री के गहने

 रोजाना की तरह , सुबह सुबह जल्दी उठकर , चाय बना कर  कप ड्राइंग रुम की टेबल पर रखे और बेडरूम में जा कर पत्नि से बोला- उठो इलू इलू गर्ल , उठो चाय तैयार है । पत्नी ने उनिंदी आखों से, हल्की सी मुस्कुराहट लेते हुए मेरी तरफ देखा , लगा जैसे मैंने उगता हुआ सूरज देख लिया हो ।आगे मैंने कहा की आज आज 24 जून है , अपनी शादी की 43 वीं वर्षगांठ , तुम्हें बहुत-बहुत बधाई ।  प्रत्युत्तर में उसने भी मुझे बधाई दी और उठकर चाय पीने आ गई । थोड़ा समय निकला और मैंने दूध और बिस्किट लाकर टेबल पर रखे और पत्नी को आवाज लगाई- बेबी किधर हो ,आ जाओ नाश्ता तैयार हैं । चेहरे पर मुस्कुराहट लिए हुए हम लोगों ने नाश्ता किया । फिर दोपहर में भोजन के समय उसने अतिरिक्त रोटी और लेने के लिए कहा तो मैंने कहा डार्लिंग और कितना खिलाओगी, लोकडाउन चाहे खुल गया है लेकिन अभी बाहर कहीं आ जा नहीं सकते तो पच नहीं पाएगा । फिर तीसरे पहर का समय हो गया और फिर रोजाना की तरह मैंने चाय बनाकर टेबल पर रखी और आवाज लगाई रानी आ जाओ चाय तैयार है । फिर से मुस्कान के साथ हम दोनों ने चाय पी । शाम होते होते मैंने पत्नी को कहा बोलो माय लव तुम्हारे लिए क्या लें सोने की चूड़ियां , कंगन , हार या कुछ और ? तो मेरी और प्यार से देखती हुई बोली कि आप दिन भर में मुझे इतने प्यारे प्यारे संबोधन दे देते हो कि उनके सामने गहने कुछ भी नहीं , मुझे वास्तव में कुछ भी और नहीं चाहिये ।
    गलत कहते हैं लोग  कि स्त्री गहनों की भूखी होती है ,  वास्तव में वह तो प्यार , सम्मान और समर्पण की भूखी होती है ।

मंगलवार, 23 जून 2020

*फूल और कांटे* 

   गुलाब के पौधे में असंख्य कांटे होते हैं , लेकिन फिर भी लोग इसे अपने घर के बगीचे में लगाना चाहते हैं और सर्वाधिक पसंद करते हैं ,आखिर क्यों ? कभी सोचा है आपने ?
  एक होता है बबूल का पेड़ , कोई नहीं चाहता कि एक भी बबूल का पेड़ उसके आंगन में हो,क्योंकि उसमें कांटे ही कांटे होते हैं । मगर दुनिया में आए हैं तो जीना ही पड़ेगा की तर्ज पर ,उनको स्थान मिलता तो है लेकिन न घर में न गांव में और न ही शहर में । इनको जगह मिलती है सिर्फ और सिर्फ जंगल में ।हालांकि बबूल बिल्कुल ही नाकारा भी नहीं होता , पर्यावरण संतुलन में यह बहुत सहायक  होता है लेकिन आम आदमी पर्यावरण के बारे में सोचता ही नहीं और कोई भी इन्हें जंगल से अपने आंगन में लाना नहीं चाहता ।
 दूसरे पायदान पर ऐसे पेड़- पौधे होते हैं जो फूलों से लदे रहते हैं , देखने में बहुत सुंदर लगते हैं , लोगों का मन उन्हें देखकर प्रसन्न होता है । उनमें खुशबू रहे ना रहे , अपने घर के बगीचे में लगाना पसंद करते हैं । ऐसे फूलों की उपस्थिति दिल को सुकून देती है ।
    तीसरे पायदान पर हम बात करते हैं ऐसे पौधे की जिसमें कांटे हैं और फूल भी । आप समझ ही गए होंगे,यह पौधा है गुलाब का । कांटो के होते हुए भी सर्वाधिक लोग इसे पसंद करते हैं और अपने घर के आंगन / बगीचे में लगाना चाहते हैं । किसी आदरणीय को गुलाब के फूलों की माला पहनाना चाहते है। यहां तक कि मंदिर में अर्पण के लिए भी गुलाब के फूल पहली पसंद है । इनकी सुंदरता ही नहीं , साथ में मनभावन खुशबू इसे बनाते हैं पहली पसंद। 
      गुलाब के पौधे की तुलना हम इंसान के गुणों से भी कर सकते हैं। गुलाब के पौधे में  फूल भी हैं और कांटे भी । इसी प्रकार से हर इंसान में  कुछ गुण होते हैं और कुछ अवगुण । गुण अधिक है या अवगुण, यही बात उस व्यक्ति की उपयोगिता निर्धारित करती है ।बबूल के जैसे ही कुछ इंसान होते हैं जिनमें गुण कम और अवगुण ज्यादा होते हैं । ऐसे इंसानों से लोग दूर रहना ही पसंद करते हैं क्योंकि उन्हें डर रहता है कि वे किसी भी बात पर उत्तेजित हो सकते हैं और ऐसी बातें कर सकते हैं जो नापसंद होंं और चुभने वाली होंं । हालांकि ऐसे व्यक्ति जहां पर हैं वहां उनकी उपयोगिता होती है । 
   दिखने में सुंदर आकर्षक फूलों वाले पौधे भी होते हैं जिनमें महक नहीं होती। इसी प्रकार मीठी बोली बोलने वाले इंसानों की भी कमी नहीं है जिनके गुण नजर आते हैं लेकिन दुर्गुण छिपे रहते हैं । ऐसे लोगों से , लोग मिलना तो पसंद करेंगे लेकिन हर वक्त मिलेंं ऐसा नहीं चाहेंगे ।
     इंसानों की ऐसी भी प्रजाति होती है जो आकर्षक तो होते ही हैं और गुणों की खान होते हैं उनमें कुछ अवगुण जरूर हो सकते हैं लेकिन उनको छुपाते नहीं , लोग उन्हें चाहते हैं,चाहते हैं कि उनके आसपास बने रहें । जिस तरह गुलाब के फूलों की खुशबू हमें महका देती है,उसी तरह से ऐसे लोगों से हमें प्रेरणा मिलती है, हमारा मन मुस्कुराता है और जीवन महक उठता है ।
    तो फिर देर किस बात की--गुलाब की तरह ही महकिये और मुस्कुराइए। 


स्वरचित--
  सतीश गुप्ता 'पोरवाल' 
 मानसरोवर,जयपुर।

रविवार, 5 अप्रैल 2020

🏵 दीप जले 🏵

 कोटि -कोटि जन के मन में प्रीत पले ,
सबसे सुंदर,यही दीप जले।
     निशा क्षितिज पर ले आई दिनकर को
     कम हुई चंदा से अब दूरी ,
     नन्हे तन , पर विशाल हृदय के दीपों से
     छा गई नई रौनक सिंदूरी।
अंधियारा बैचेनी से नयन मले,
                               दीप जले।
     गगन मण्डल के विशाल वक्ष पर
     जगमग -जगमग चमके तारे,
     धरती की इस हरी गोद के,
     आज हुए तारे ये नन्हे दीपक सारे।
तारे क्यों दीपक से मन ही मन जले,
                                        दीप जले।
     कुण्ठा और भ्रम मन से सभी त्याग
     लेलें प्रेम और सदभाव का गुण ,
     दिये से दिल में हो तेल सी दया
     प्रेम की बाती हो मन रहे ना रुग्ण।
अवचेतन से उठ चेतन की ओर चले,
                                       दीप जले।
      अंधियारा हो तल में चाहे
      जग को उजियारा दे दें ,
      लौ प्रेम की उठे प्रेम की बाती से
      ग़म लें सबके और  खुशियां दे दें।
प्रेमी सुर में गम के गीत ढले ,
                             दीप जले।



बुधवार, 18 मार्च 2020

" अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस और महिला "
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  लो जी , हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी , अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मन ही गया । असंख्य महिलाओं और पुरुषों ने इस अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर असंख्य ही शुभकामनाएं एवं बधाईयां दीं। कहीं पर कुछ पुरस्कार बांटे गए , कुछ को सम्मान दिया गया और कहीं पर एक दिन के लिए मुफ्त यात्रा का लॉलीपॉप दिया गया । वर्ष में एक दिन महिलाओं के नाम हो गया लेकिन शेष 364 दिनों के लिए क्या ? वे तो पुरुषों के नाम ही हैं । स्त्रियों को वर्ष में 1 दिन दे देने से महिलाओं का क्या भला हो जाएगा  ? महिला तू महान है , महिला तू शक्ति है , महिला तू पूजनीय है- इस तरह के जुमलों से ही महिला खुश हो जाती है । वास्तव में महिलाओं की प्रकृति ही ऐसी है कि वे थोड़े में ही प्रसन्न हो जाती हैं और इतने में ही संतुष्ट हो जाती हैं । यही कारण है की शैक्षिक और आर्थिक रूप से उन्नति करने के बावजूद भी , सामाजिक रूप से महिलाओं और पुरुषों में बहुत असमानता है । देवता  और देवियों  को हम समान रूप से पूजते हैं , दोनों को और उनके परिवारों को  हम समान रूप से सम्मान देते हैं , तो फिर  जगत में , पुरुष और महिला  को बराबर सम्मान क्यों नहीं ? महिला चाहे राष्ट्रपति , प्रधानमंत्री ,मंत्री ,कलेक्टर , एस पी आदि कुछ भी बन जाए लेकिन रह जाती है सिर्फ महिला ही - सामाजिक रूप से ।
   आइए इसको विस्तृत रूप से समझने का प्रयत्न करें । मान लें की महिला राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री की पुत्री का विवाह होता है , तब भी उन्हें ही लड़के वालों को ( पुरुष वर्ग को ) सगाई देनी पड़ेगी, उसी महिला के भाई या पिता को मामा भात ( मायरा ) देना पड़ेगा । विवाह में नाना प्रकार की सामग्री भी वधू के साथ देनी होगी । क्या ऐसा संभव होगा कि सगाई लड़के वाले लड़की के परिवार वालों को दें या मामा भात की जगह चाचा भात हो । या तो इन रस्मों को समाप्त कर दिया जाय या फिर इस तरह की रस्में दोनों ही ओर से , एक दूसरे के लिए होंं ।
ऐसा नहीं है की पहल नहीं हुई , बरसो-बरसो पूर्व कोटा के एक स्वजातीय इंजीनियर युवक ने सगाई में मात्र एक रुपया लिया और दहेज में कुछ नहीं , लेकिन अफसोस कि उसका अनुसरण नहीं हुआ । कुछ वर्ष पूर्व कोटा के ही एक स्वजातीय प्रतिष्ठित परिवार में लड़के की शादी में सगाई नहीं ली , इसका भी अनुसरण नहीं हुआ । मैंने स्वयं अपनी तीनों पुत्रियों के विवाह में मामा भात (मायरा) नहीं लिया लेकिन संतोष की बात है कि इसका कुछ अनुसरण हुआ और विगत कुछ वर्षों में देखा गया कि कई विवाह समारोहों में इस रिवाज (मामा भात /मायरा ) को दरकिनार कर दिया गया और इस तरह का चलन गति पकड़ने लगा है।
    बरसों से ऐसा ही चला आ रहा है ऐसा कह कर , ऐसे अनेक रीति-रिवाजों का बचाव करना ठीक नहीं । समय आ गया है कि अब , जन्म से लेकर मृत्यु तक महिला पक्ष ही पुरुष पक्ष को दे , ऐसे रीति-रिवाजों में संशोधन किया जाय  । जब संविधान में और कानून में संशोधन हो सकता है तो रीति-रिवाजों में क्यों नहीं ? विश्लेषण करें और ठोस निर्णय लें, महिलाओं के पक्ष में ।


 सतीश कुमार गुप्ता 'पोरवाल' मानसरोवर , जयपुर ।
     मोः। 94140 47338

बुधवार, 4 मार्च 2020

मेरी आवाज सुनो

सन 2012 में टीवी पर आमिर खान का एक कार्यक्रम प्रसारित हुआ था-" सत्यमेव जयते "। मुख्य मुद्दा था कन्या भ्रूण हत्या , और यह राजस्थान क्षेत्र पर केंद्रित रहा । कार्यक्रम में समस्या के समाधान के लिए इस बात पर जोर दिया गया कि लिंग परीक्षण एवं गर्भपात करने वाले चिकित्सकों को सजा दी जाए ।आप लोग क्या सोचते हैं,क्या ऐसे चिकित्सकों को सजा देने से कन्या भ्रूण हत्या रुक जाएगी , क्या ऐसा हो जाने पर भी जन्म पश्चात हत्या की घटनाएं घट जाएंगी ? गहरी जड़ों वाले कटीले या विषैले पेड़ों को जड़ से उखाड़ फेंकना संभव नहीं है ,उनकी डालों या पत्तों पर मट्ठा डालने से कुछ नहीं होगा , मट्ठा जड़ में डालना होगा ।
  आखिर वे कौन से कारण हैं जिनकी वजह से कन्या भ्रूण हत्या या कन्या हत्या होती है ?आखिर क्यों नहीं चाहते लोग कि उनके यहां कन्या जन्म ले ? मुख्य कारण एक ही है- महिला को "दोयम"यानी दूसरा दर्जा प्राप्त होना , प्रथम दर्जे पर तो पुरुष का एकाधिकार है । आखिर ऐसे कौन से रीति रिवाज एवं परिपाटियां हैंं जो महिलाओं को दूसरे दर्जे की श्रेणी में रखते हैं । बहुत समय से इस बारे में आवाज उठाने की सोच रहा था किंतु हौसला नहीं हो रहा था क्योंकि आवाज दबाने वाले व्यक्ति दूर नहीं बल्कि आपके अगल-बगल ही बैठे होते हैं । वे समझते हैं कि यह आपकी निजी राय है और निजी राय सामान्य रुप से कोई महत्व नहीं रखती है । मुझे हौसला मिला " दैनिक भास्कर जयपुर" के दिनांक 15 मई 2012 के संस्करण में प्रकाशित "बेटी बचाओ अभियान के तहत त्वरित टिप्पणी " से । इस टिप्पणी की पंक्तियां ज्यों की त्यों पेश हैंं। सगाई के बाद शादी तक बेटे वालों को हर त्यौहार पर केवल मिठाई और कपड़े ही नहीं खाना तक भेजना पड़ता है। घर के 5 सदस्य होते हैं फिर भी 25 के मुंह का नाप भिजवाया जाता है , पैसे बेटी वालों के लगते हैं और बचा खाना फेंक दिया जाता है । शादी के बाद एक साल तक फिर से हर त्यौहार पर यही सिलिला और बेटा पैदा हो जाए तो फिर दुनिया भर के कपड़े , यही नहीं देवरानी और जेठानी के बच्चे का बर्थडे हो तो भी कपड़े ले जाने पड़ते हैं । बेटे वालों की बेटी जहां ब्याही गई है उस घर में बेटा हो तो भी यह सब करना पड़ता है । यह दो ढाई साल बीतते बीतते  दूसरी बेटी हो तो भी यह सब करना पड़ता है । फिर दो ढाई साल बीतते बीतते दूसरी बेटी की शादी का वक्त आ जाता है और इसके दो ढाई साल बाद तीसरी का । फिर इनकी परंपराएं निभाते निभाते मृत्यु की उम्र हो जाती है फिर भी उलाहने कम नहीं होते- उसकी शादी में मेरा बेस हल्का था , उसके मायरे में पगड़ी कम पड़ गई थींं और पहली गणगौर पर भेजे घेवरों में पनीर कम था। बेटी के माता-पिता ताने सुनते सुनते मर जाते हैं । आगे लिखा है- समाज में सुधार तो सामाजिक स्तर पर ही आएगा और आना ही चाहिए । युवा बेटे बेटियां यह काम बखूबी कर सकते हैं ।आखिर जो बेटा दहेज में कार लेने के लिए अड़ सकता है वह कार न लेने के लिए भी तो अड़ सकता है । आखिर यह त्यौहार पर ससुराल से आए नए कपड़े पहनना क्यों जरूरी है ताकत है, कुव्वत है तो खुद खरीदिये और नहीं है तो मत पहनिये नये कपड़े । जरा सोचिए - बेटी हो , बहू हो या सास सबका मूल बेटी है ।उसका और उसके पिता का सम्मान नहीं होगा तो यह परिवार , यह समाज और आखिर यह देश कैसे सुखी हो सकता है , कैसे सम्मान पा सकता है ?

तो पढ़ा आपने , समझा , चिंतन किया और निष्कर्ष निकाला ? कहते हैं अच्छे काम की शुरुआत अपने घर से ही होती है यह घर हमारा भी हो सकता है । यह मुद्दा उठाया जाए, एक मुहिम छेड़ी जाए। शांति से बैठकर सोचिए और लिख डालिए ऐसे रीति रिवाज / परिपाटी एवं परंपराएं जो स्त्री के साथ ही जुड़ी हुई हैं पुरुष के साथ नहीं जो स्त्री या नारी का प्रथम दर्जे में आने से रोकते हैं और दोयम दर्जे में बनाए रखते हैं । क्या पुरुष और स्त्री को एक समान दर्जा प्राप्त नहीं होना चाहिए ?क्या आप नहीं सोचते कि यदि ऐसा हो जाए तो बेटा जन्म ले या बेटी कोई फर्क नहीं पड़ेगा ? अपनी प्रतिक्रियाएं /अपने विचार अवश्य बताएं और लिखेंं ताकि आगे के लिए भूमिका तैयार हो सके । फिर मिलेंगे---- --

गुरुवार, 20 फ़रवरी 2020

☺थाली में जूठन और लिफाफा☺

 ☺☺थाली में जूठन तो हम भी नहीं छोड़ना चाहते लेकिन क्या करें मजबूरी जो है ।
    कुछ महीने पहले हमारे शहर के एक सजातीय ,संभ्रांत और प्रतिष्ठित परिवार में शादी का रिसेप्शन था , बुलावा हमें भी था ,सो हम पत्नी सहित विवाह स्थल पर पहुंचे ।  उन्होंने निमंत्रण पत्र में एक पंक्ति अंत में छपवा दी थी जिसमें लिखा था कि कृपया कोई भी उपहार न लायें, आपका आना ही हमारे लिए उपहार स्वरूप है (आजकल ऐसा चलन चल पड़ा है )। जैसे ही हमने विवाह स्थल  में अंदर प्रवेश किया , दूल्हे के पिताश्री ने बड़ी गर्मजोशी से स्वागत किया  और कहा कि बहुत अच्छा लगा आप आये , आईये अब भोजन का  आनंद लीजिए । उनके इस प्रेम भरे स्वागत से हमारा पेट आधा तो  वैसे ही भर गया ,सो हमने पहले तो सब व्यंजनों का मात्र नैनोंं से जायजा लिया और फिर कुछ "सेलेक्टेड"व्यंजन ही अपनी थाली में सजाये और शुरु हो गये । सच मानिए हमने जूठन नाममात्र की भी नहीं छोड़ी ।
   इसी महीने एक और शादी का रिसेप्शन था । निमंत्रण पत्र में "उस वाली"पंक्ति  को  स्थान नहीं मिला था ,सो हमने लिफाफा तैयार किया और उसमें अपनी और उनकी हैसियत के हिसाब से, "लक्ष्मीजी"का  वास कराया । फिर सावधानी बरतते हुए पेंसिल से ( इसलिए कि यदि लिफाफा बच गया तो- - -) , अपना व उनका नाम लिखा और पहुंचे विवाह स्थल । जैसे ही हमने अंदर प्रवेश किया , दूल्हे के पिताश्री हाथ में  "फुल"भरा हुआ बैग लेकर खड़े दिखाई दिए।  ऐसा लगा जैसे ट्रेन से उतर कर स्टेशन पर बाहर निकलते हैं तो"टी सी" गेट पर  खड़ा मिलता है और हम उसे टिकट देकर ही  आगे बढ़ पाते हैं । हमने , हमेशा की तरह , बचकर निकलने की कोशिश की लेकिन कोशिश व्यर्थ रही । उनकी "दिव्य दृष्टि" हम पर पड़ चुकी थी और हमारी ओर , एक हाथ में बैग दबाये हुए और दूसरा हाथ आगे बढ़ाते हुए , बढ़ते हुए बोले  आइए आइए सतीश जी , आईये । हम समझ गए थे उनका बढ़ा हुआ खाली हाथ हमें भरना ही पड़ेगा सो ,भारी मन से , लिफाफा जेब से निकाला और उनके हाथ में रखा । लिफाफा पकड़ते हुए , मुस्कुराहट से लिफाफे को  उस भरे हुए बैग में ठूंसते हुए उन्होंने कहा, अरे इसकी क्या जरूरत है , आप आये वही बहुत है , आइए और भोजन कीजिए । सच मानिए , लिफाफा देने के बाद हमारी भूख और बढ़ गई थी सो हमने , जैसे वे खाली बेग को भरते जा रहे थे ,  वैसे ही हमने भी खाली पेट को भरना शुरू किया । शुरू से आखिर तक , जो भी व्यंजन दिखा किसी एक को भी हमने नहीं बख्शा , किसी भी  स्टॉल को हम निराश नहीं करना चाहते थे । व्यंजनों की तादाद के हिसाब से  प्लेट छोटी पड़ रही थी सो हमने उसे "ओवरलोड" कर दिया । पेट प्रक्रति से लचीला.होता है लेकिन आखिर कितना खींचते , इसको भरना था सो भर ही गया लेकिन हाथ की प्लेट खाली न कर सके और अभी भी उसमें भरपूर व्यंजन विराजमान थे । प्लेट डालने के लिए हम गंतव्य पर पहुंचे और जैसे ही प्लेट को डालने लगे एक महानुभव जो वहां बैठे थे ,चौकीदारी कर रहे थे ,उन्होंने हमारी प्लेट को पकड़ा और बोला कि भाई साहब इतनी जूठन ? कृपया इसको पूरा खाइए ,साथ ही उपदेश देने लगे, कि  प्लेट में खाना "लिमिटेड " ही लेना.चाहिये ।हमने कहा , भाई साहब आपको इससे क्या लेना देना हमने कितना खाया और कितना छोड़ा और वैसे भी हमने गेट पर ही एडवान्स पेमेंट कर दिया है तो "अनलिमिटेड" लेंगे ही ।  अब वह मेरा मुंह ताक रहा था , और मैं उसका ।☺☺

गुरुवार, 13 फ़रवरी 2020

नादान हूं , अन्जान हूं

नादान हूं , अन्जान हूं,कहने को मगर यह आया हूं मैं,
दुनिया में आकर जियो ना ऐसे, कुछ शब्द कहने को लाया हूं मैं नादान हूं अन्जान हूं ।
 समंदर के झाग बटोरे हैं, गहरे से मोती ना ला पाए हो तुम, दुनिया का मेला देखा है, गिरेबांं में अपने न झांके हो तुम,
जानी न तुमने दुनिया है क्या,दुनिया ही बताने को आया हूं मैं नादान हूं अन्जान हूं - - -
पुण्य का मतलब न जानो तो तुम पापों से अपने इनको न तोल तन बिकते हैं दुनिया में लेकिन मन का न कोई होता है मोल जीवन की आभा हो जिसमें तस्वीर ऐसी दिखाने लाया हूं मैं नादान हूं अन्जान हूं ।
जो दुख ना होता तो सुख भी ना होता ,
जो पतझड़ ना होता तो सावन ना होता ,
सांसों के तारों से जीवन बंधा है पर ,
घुट घुट के जीना तो जीना ना होता।
दिलों में सबके बनी है जो खाई, वह खाई पटाने को आया हूं मैं नादान हूं अन्जान हूं ।
 राहों में आकर के गुमराह होना आसान है मुश्किल नहीं है,
राहों में जो अड़चन आये टकरा ले इनसे वह बुजदिल नहीं है, दुनिया में आकर जीना जो जाने वह इंसांं बनाने को आया हूं मैं नादान हूं अन्जान हूं ।
 जीवन घुटे ना वह बंगला बना ले,
फिसले न जिन पर वो राहें बना ले,
कांटे हटा ले पैरों के अपने,
अपने गुणों का उपवन खिला ले।
 दुनिया हो कैसी, ख्वाबों की जैसी
वो दुनिया बसाने को आया हूं मैं,
 नादान हूं अन्जान हूं ,कहने को मगर यह आया हूं मैं
 दुनिया में आकर जियो न ऐसे कुछ शब्द कहने को लाया हूं मैं, नादान हूं अन्जान हूं ।

बुधवार, 12 फ़रवरी 2020

यह रिश्ता क्या कहलाता है

बरसों से, दोनों एक ही आवास में निवास करते हैं । दोनों का जन्म एक साथ हुआ और तब से अब तक एक पल भी ऐसा नहीं आया जब एक दूसरे से अलग हुए हों । दोनों जब अच्छे मूड में होते हैं तो गुनगुनाते हैं -- तू जहां जहां चलेगा मेरा साया साथ होगा- --- , साथ जिएंगे साथ मरेंगे यही है तमन्ना - - - , ये दोस्ती हम नहीं तोडेंगे , आदि आदि । दोनों के संबंध इतने प्रगाढ़ हैं कि क्या कहूं । दोनों में बहुत सी समानताएं हैं तो बहुत सी विषमता है लेकिन मजाल जो दोनों के संबंधों में कोई खटास आई हो । दोनों ने एक दूसरे से वादा तो नहीं किया ना ही कोई कसमें खाई किंतु फिर भी एक दूसरे के सुख में सुखी और दुख में दुखी होते हैं । दोनों के मिजाज में बहुत सी विशेषताएं हैं -   एक की सोच कभी संकुचित तो विस्तृत भी मिजाज कभी गर्म तो कभी ठंडा , कभी दूसरे से सलाह ले कर काम करे तो कभी किसी की ना सुने , कभी खुद खाली रहे तो कभी चाहे भूसा ही भर ले ,कभी मिजाज धरातल पर तो कभी पहुंचे सातवें आसमान तक ।  दूसरा कभी संग कभी तंग ,कभी उदार तो कभी हर दिल अजीज ।कभी ठेस लगे तो उदास हो जाए और कभी खुशी मिले तो बल्लियों उछलने लगे ।कभी उथला तो कभी गहराई सात   समुंदर की । कभी कोमल तो कभी कठोर , कभी साफ तो कभी काला । दोनों का कार्य अलग-अलग ,अपने अपने हिसाब से कार्य करते रहते हैं किंतु यदि कहीं अटक गए तो एक दूसरे से सलाह अवश्य करते हैं । हालांकि कभी-कभी सहमत नहीं होते और अपनी ही कर लेते हैं लेकिन फिर भी धैर्य रखते हैं , रिश्ते वही रहते हैं । लगाव इतना कि यदि एक की मृत्यु हो जाए तो तो दूसरा उसी क्षण आत्महत्या कर ले ।
  ये हैंं शरीर के दो विभिन्न किंतु अभिन्न अंग दिमाग और दिल , दोनों ही अति महत्वपूर्ण । दोनों के अपने-अपने , अलग-अलग कार्य ,.कभी एक दूसरे से नहीं मिले कभी हाथ नहीं मिलाया ,हमेशा निश्चित दूरी बनाए रखी , लेकिन इतना प्यारा रिश्ता । इस रिश्ते को मैं क्या नाम दूं , समझ नहीं पा रहा हूं ।
   इसी तरह एक परिवार के अभिन्न अंग --  माता-पिता भाई-बहन और बच्चे , एक अटूट रिश्ता जो अद्वितीय है । इस मीठे रिश्ते में कहां से आ जाती है, खटास । नए रिश्ते चाहे कितने ही जुड़ते जाएंं, पुराने रिश्तों की गहराई कम नहीं होनी चाहिये और यदि होती है तो यह परिवार के सदस्यों की कमजोरी है । जीवन पर्यंत रिश्तों की मिठास वैसी ही बनी रहनी चाहिए । रिश्ते जब टूटते हैं तो बड़ी ठेस पहुंचती है , दिल के कोने में एक रिक्तता बनी रहती है । कभी-कभी तो  रिश्तों में खटास इतनी बढ़ जाती है कि यह जीवन पर्यंत चलती है और यह रिक्तता लिए हुए हैं व्यक्ति इस संसार से पलायन कर जाता है । उसके जाने के पश्चात , उसके परिवार के अन्य सदस्यों को चाहे आप भिन्न से अभिन्न बना लें , फिर से रिश्ता कायम कर लें , किंतु आप का वह अभिन्न अंग दिल में रिक्तता लिए ही इस दुनिया से चला गया , उसका क्या ? अच्छा है  ,समय रहते ही , रिश्ते सुधार लिये जायें ।

नारी सशक्तिकरण एक विचार

जब से हमने होश संभाला है "गरीबी हटाओ" और "महिलाओं को सशक्त बनाओ" के नारे सुनते आये हैं, सुन रहे हैं और , ना जाने कब तक, सुनते रहेंगे। ऐसा नहीं है कि प्रयास नहीं हुए ,प्रयास हुए , लेकिन प्रभावी नहीं हुए । वर्षों बीत जाने के बाद भी ,आज भी , हम वही महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं, यह चिंता का विषय है। हर्ष होता है इस बात से कि पोरवाल समाज भी अन्य समाजों के साथ खड़ा है, इस दिशा में अलख जगाने को और सार्थक प्रयास करने को तत्पर भी है ।हमने देखा है कि सरकार ने महिलाओं से संबंधित नए कानून बनाए हैं / संशोधन किए हैं और स्थानीय न्यायालयों से लेकर शीर्ष न्यायालयों ने महिलाओं के प्रति अपराध करने वालों को समय-समय पर दंडित भी किया है , लेकिन क्या यह असरदार रहा ? यदि कानून बनाने से और सजा देने से अपराध समाप्त हो सकते तो , अब तक चोरी, लूट , बलात्त्कार , हत्या आदि अपराध समाप्त हो गए होते । स्पष्ट है कि सरकार कानून बना सकती है , न्यायालय सजा दे सकता है लेकिन अपराध को ,कुछ सीमा तक तो कम कर सकते हैं किंतु, समाप्त नहीं कर सकते । महिलाओं के प्रति होने वाले दुर्व्यवहार ,असम्मान ,अत्याचार ,अन्याय और दुष्कर्म पर यही बात लागू होती है । हां , सरकार और न्यायालयों के फैसलों से महिलाओं का मनोबल अवश्य ही बढ़ा है और हम देख रहे हैं कि इन अपराधों के विरोध में अब महिलाएं खुलकर सामने आने लगी हैं ।
  जब से दो या तीन बच्चों का चलन हुआ है ,बेटा और बेटी में अंतर न के बराबर हो चुका है । शिक्षा एवं आर्थिक क्षेत्र में लड़कियों ने आशातीत प्रगति की है और इनकी स्थिति इन क्षेत्रों में लड़कों से कम नहीं है । महिलाओं की स्थिति यदि चिंतनीय और दयनीय है और उनको दोयम दर्जे में समझा जाता है तो उसका कारण है सामाजिक स्तर में अंतर । अभी भी पुरुषों एवं महिलाओं के सामाजिक स्तर के बीच एक गहरी खाई है , बावजूद इसके कि महिलाएं शिक्षा एवं आर्थिक रूप से संपन्न हैं । इस खाई को पाटने का काम न तो सरकार कर सकती है और ना ही कोई न्यायालय । यदि कोई कर सकता है तो वह है ,व्यक्ति , परिवार और समाज ।
  इस समस्या का मुख्य कारण महिला व पुरुष के साथ संलग्न वैवाहिक  और सामाजिक रीति रिवाज में जमीन आसमान का अंतर होना है ।बच्चे के , जन्म से लेकर मृत्यु तक , आयोजनों में "कुछ ना कुछ" करने का दायित्व महिला के परिवार वालों का  ही होता है । 'न जाने कितने' वर्षों पुराने इन रिवाजों को बदलने के बारे में कोई नहीं सोचता । आश्चर्य की बात तो यह है कि महिलाएं भी नहीं , शायद इसलिए कि महिलाओं की सुलभ.प्रवत्ति है कि बिना खर्च किए कहीं से मिल जाए चाहे स्वयं के पीहर से हो या बहू के पीहर से । कभी-कभी लगता है कि महिलाएं अपनी सामाजिक स्थिति या स्तर से संतुष्ट हैं और इस घेरे से बाहर निकलने को व्यग्र नहीं है । छोटे / बड़े महिला क्लब और महिला सामाजिक संगठन की बैठकें होती रहती है लेकिन इनमें महिला सशक्तिकरण के बारे में विचार विमर्श करके ठोस कदम उठाने के बजाय खेल-कूद और मनोरंजन - हाउजी /चम्मच दौड़/ कुर्सी दौड़ /रंगोली आदि करके ही अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली जाती है ।

संक्षेप में यही कहा जा सकता है कि महिलाएं स्वयं ही जागरूक होंं । "उसकी साड़ी मेरी साड़ी से सफेद क्यों" की भावना से बाहर निकलकर उसकी कमीज मेरी साड़ी से सफेद क्यों की भावना को अंगीकार करें । इस विषय पर मात्र चर्चा करने से कुछ नहीं होने वाला इस दिशा में ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है तभी परिणाम प्राप्त हो सकते हैं वरना तो यह विचार , मात्र एक सपना ही बनकर रह जाएगा ।

रविवार, 9 फ़रवरी 2020

अभिलाषा

पूरा ना मिले , मिल जाए बस आधा,
 हां यही है मेरी अभिलाषा ।
 गले मिलो या ना मिलो पर,
 देखने दिखाने को तो आजा।
 इतनी भी रंजिश क्या ए मेरे यार,
  खिड़की खुली है पर बंद है दरवाजा ।
 खरा उतरे ना उतरे गम न कर,
मिलने का एक बार तो कर ले वादा ।
 कुछ तो बोल ए मेरे नसीब ,
 कम बोलेगा पर समझूंगा ज्यादा ।
पूरा न मिले,मिल जाये बस आधा ।

अभागन

💥एक लघुकथा 💥

  अरे ओ बंसी , जा रस्सी लेकर आ और बांध दे इसके हाथ और पैर । आज फैसला हो ही जाए , दो  साल से खुद तो फोकट का खा ही रही है और एक बच्चा और पैदा कर दिया, इसको भी हम ही खिलाते रहें, हराम का पैसा है क्या हमारे पास , इसका बाप तो आगे कुछ देता नहीं । कहा था हमने,  जो दिया था.वह क्या जिंदगी भर चलेगा ? दो लाख और दे दो लेकिन , इसके बाप के कान में जूं भी नहीं रेंग रही, आज तो अंतिम फैसला होकर ही रहेगा । बंसी ने जैसे ही उसके हाथ और पैर बांधे , मां के कहने पर सबसे पहले बंसी ने ही उद्घाटन किया और  डंडे मार मार कर अपनी पत्नी को बेहाल कर  दिया । फिर मां डंडा अपनी बेटी को देते हुए  बोली , ले अब तेरा नंबर आ गया , मोबाइल चाहिए था ना तेरे को , नहीं मिला , तो दे दे अब सजा । और बेटी शुरू हो गई- दे दनादन, दे दनादन  । मां ने अब बेटी से डंडा लेकर बेटे को दिया और कहा- ले तेरे को मोटरसाइकिल चाहिए थी ना , नहीं मिली तो ले तू भी ले बदला । देवर ने भाभी की मार मार कर चमड़ी उधेड़ दी । मां ने छोटे बेटे से डंडा लेकर फिर से बंसी को देते हुए कहा कि,ले और अब अंतिम क्रिया कर ही दे ।बंसी ने डंडा उठाया और पूरे वेग से उस "अभागन" के सिर पर मार दिया । बेचारी बहू अब अंतिम सांस तक पहुंचते पहुंचते , मन ही मन बुदबुदाई - पिताजी मुझे माफ कर देना , मैं असमय.ही जा रही हूं , मैं आपको कंगाल नहीं कर सकती थी और इसीलिये मैंने आपको ,  इनकी मांग पूरी करने को मना किया ।  पिताजी , आपने कहा था कि बेटी खड़ी हुई ससुराल जाती है  और वहां से निकलती है- लेटी हुई । मुझे संतोष है कि मैंने आपका कहा पूरा किया । एक हिचकी आई और बस - - - -

-उपरोक्त कथा काल्पनिक नहीं है, यह एक सत्य घटना पर आधारित है जिसका 'वीडियो' काफी चर्चित रहा । मैंने यह 'वीडियो' कई बार देखा और इसे एक लघुकथा का रूप दिया ।
 अब कुछ प्रश्न आपके लिए--
1).  क्या वास्तव में ऐसा होता है ?
2)  ऐसा केवल निम्न वर्ग या मध्यम वर्ग में ही होता है या उच्च वर्ग में भी ?
3)  समय के साथ साथ ऐसी मानसिकता में परिवर्तन क्यों नहीं हुआ ?
4) लड़की "वर्किंग" हो, ऐसी मांग रखने वाले भी क्या ऐसी मानसिकता के शिकार हैं ?
5) हमारे समाज में भी क्या दहेज की लालसा रखने वाले कुछ लोग हैं ?
6)  ऐसा क्या किया जाना चाहिए कि दहेज की लालसा शून्य हो जाए और महिलाएं ऐसी यातनाओं की शिकार ना हों ?
  आपके जो भी विचार हों, कृपया प्रेषित करें । 

शनिवार, 8 फ़रवरी 2020

आप भी जा अब तो प्रिये

 आ भी जा अब तो प्रिये कि सपनों के महल खंडहर बने हैं,
 मेरे ही ख्वाब मेरे ही सपने खाने को ठोकर दर-दर बने हैं।
पाया तुझे तो मुझे सपना सुहाना मिला था,
  नीरस से जीवन में जीने का बहाना मिला था,
 पर अब तो सांसें भी रुकने लगी हैं,
खुशियों के मोती की माला टूटने लगी हैं।
अब तो नजर मेहरबांं कर कि दिल के घर से बेघर बने हैं,
 आ भी जा अब तो प्रिये - - - -
 मेरी इन सांसों में तेरी ही महक थी,
 दिल की तरंगों में कैसी एक चहक थी,
कहां गई वह घड़ी मिलन की बनी थी जो,
 सूख गई नदिया क्यों प्यार की बनी थी जो।
अब तो सुन पुकार मेरी कि दुख के समंदर की लहर बने हैं ,
आ भी जा अब तो  प्रिये- - - -
 सूरज के गोले सा दिल दहक रहा है,
 विरह वेदना से दिल तड़प रहा है,
 कैसी थी तेरी वह होठों की मधुर मुस्कान,
 भूल सकूंगा कैसे गाए थे हमने जो प्रणय गान ।
माफ कर मुझे कि ये गीत अब तो जहर बने हैं ,
आ भी जा अब तो प्रिये- - - -
 न जाने दिन गुजर जाता था कैसे ,
वर्ष भर भी एक पल लगता था जैसे,
तेरी ही राहों में अपने को ढाला था मैंने,
 पाकर तुझे अपने पथ पर किया उजाला था मैंने।
  देर न कर कि पल पल भी अब तो कहर बने हैं,
 आ भी जा अब तो प्रिये- - - -
 सोचा था सपने सच बनेंगे हमारे,
 चमकेंगे नभ में बनके.सितारे,
 निराशा छोड़ आशा का दामन थाम रहा हूं,
 स्वीकार करे यह सोच प्रणय निवेदन फिर कर रहा हूं।
अब न ठुकरा निवेदन कि मेरे भाव इस प्रणय गीत के स्वर बने हैं,
 आ भी जा अब तो प्रिये कि सपनों के महल खंडहर बने हैं।

शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2020

तू मेरा गीत नहीं ,मैं तेरा साज नहीं

नहीं नहीं, तू मेरा गीत नहीं, मैं तेरा साज नहीं ।
अंधियारा था जब बचपन में ,
अरमान मचलते थे जब मन में ,
कोयल जैसी कूक लगाती ,
इठलाती बलखाती सर्पों जैसी लहराती ,
बहार साथ में लाकर के जब
छा जाती थी मेरे मन उपवन में,
धन्य धन्य हो जाता था मैं
 पाता था तुझको जब मन आंगन में।
 क्या इन सब बातों का हो गया अवसान नहीं ,
नहीं नहीं - - - -
 हिमगिरी के उच्च शिखर पर
 टिके हुए हैं तेरे आशा के नयन ,
चाहेंं छूना नभ के तारे
अभिलाषाओं से भरा रहे मन,
 मैं तो धरा से ही ऊपर
नजरें न उठा सकता हूं,
 जा सागर के पूर्ण गर्त में
मोती चुन चुन ला सकता हूं ।
तेरे मेरे भावों से क्या
मानस होता हैरान नहीं ।
नहीं नहीं - - - -
श्मशानों की नीरवता में
सिद्धि शांति की छिपी हुई है,
 नभ सी ऊंची आशाओं में
नहीं बादल से घिरी हुई है।
 तू चाहे हिमगिरी के शीर्ष मुकुट से
 पाना शांति का अमिट वरदान ,
तुषारापात ना हो जाए कहीं
हैंं तेरे उपवन जैसे अरमान ।
श्मशानों से हिमगिरी तक क्या गूंजती यह आवाज नहीं ,
नहीं नहीं - - - -
कंचन सी काया में लिपटी है तू
साया कांटोंं का मैं झेल रहा हूं ,
सुवासित है हर सांस तेरी
रुकती सांसो को मैं देख रहा हूं ।
चांदी की दुनिया दिखती है तुझको
मग्न हो रही प्रति पल प्रति क्षण ,
घुटन हो रही दुनिया में मुझको
सिसक रहा है दिल का कण कण।
 मेरे दिल में तेरी यादों का कोई ताज नहीं,
 नहीं नहीं - - - -
प्रकृति की इस हरी गोद में
जीवन का सुख मिल जाता है,
 वैभव से पूर्ण हो जीवन चाहे
पर वो सुख कहां मिल पाता है ।
लुट गए हैं जो भाव मेरे
 उन्हें अब आवाज नहीं दूंगा ,
विरह से व्याकुल हो अब चाहे तू
पर फरियाद मैंं अब नहीं सुनूंगा ।
तेरे वीरह के गीतों को मेरे दिल का साज नहीं ,
नहीं नहीं तू मेरा गीत नहीं मैं तेरा साज नहीं।

अनुभूति

 प्रकाश की इन किरणों में
 ये कण क्यों डोल रहे हैं ,
आते जाते भाव मेरे मन के
 क्यों दिल के झूले में झूल रहे हैं ।
किरणों में ये जो कण हैंं
 चमचम क्यों चमक जाते हैं ,
भाव गीतों के मेरे दिल में
आते आते क्यों बहक जाते हैं ।
किसने रोका पथ किरणों का
कौन राह में बना अड़चन है,
 और कौन है जो छाया है मुझ पर
 क्यों दिल में हुई तड़पन है।

मार्च गीत

 हम बनायें , हम बनायें ,
 पर्वत को कटवा देंं हम
सागर को बंधवा दें हम
ऐसे चलें कर्म करें
हम बनाए रास्ता ।
हम बनायें- - -
 आंधियों से ना घबरायें
 रोक के उनको सबक सिखायें,
 हौसला हो बुलंद हमारा
जो चाहेंं करके दिखलायें।
 स्वच्छंद बनेंं कर्म करें
 नहीं रहेगी दासता,
 हम बनायें - - -
पवन हमें संदेश दिलाये
 बादल भी हमें नम्र बनाये,
 आलोकित हो पथ अपना
यह सूरज हमको सिखलाये।
 सूर्य बनेंं चंद्र बनेंं
हमें वतन से वास्ता ।
हम बनायें - - -
 हम बच्चे सब मिल जो जाएं
मातृभूमि को सबल बनाएं ,
एक भी दुश्मन बच न पाये
 मार के उनको दूर भगाएं।
 शूर बनेंं वीर बनेंं
हम बनाए रास्ता
हम बनायें , हम.बनायें।

प्रतिशोध

आसमां में लाखों सितारे ,
एक सितारा तो मेरा होता।
 तो यूं ही नाकारा ना होकर, 
 कुछ न कुछ तो जरूर होता।
 न मालूम मेरी किस्मत का सितारा,
 मुझसे इस तरह क्यों रूठा।
  क्या मेरी ही कुंडली में,
  राहु या केतु आ बैठा ।
 नभ की ऊंचाइयों को लांघ
 आसमांं के सितारे को छू लूं ,
जकड़ लूं मुट्ठी में कभी न छोडू़
दिल के पाटों के बीच उसे मसल दूं ।
उतारता हूं मैं इसी पर
क्रोध सारा का सारा,
 क्योंकि बन न सका यह
मेरी किस्मत का सितारा।

अब दशहरा मनाएं

 राम का इतिहास नहीं दोहरा रहे हैं ,
पर हम दशहरा मना रहे हैं ।
 अत्याचारों को सहा है हमने
अज्ञान बने रहे ज्ञान कैसे आये,
आलस्य तजना तो दूर रहा
पक्षपात भी अब तक तज न पाये।
 बेईमानी तो जीवन का अंग बना है
स्वार्थ में हो गए सब अंधे हैं ,
बेकारी तो बढ़ रही निरंतर
 रिश्वत के चलते खूब धंधे हैं ।
भुखमरी के मारे हैं कुछ लोग
 द्वेष इन बेचारों से क्यों करें,
 इन सब शत्रुओं से अब तक हारे हैं
 पर अब हारों से जमकर लड़ेंं ।
 यदि इन दस शत्रुओं को हम हरा रहे हैं,
तब कहेंं हम,हम दशहरा मना रहे हैं ।

त्योहार और दायित्व

 त्योहार आते हैं ,चले जाते हैं
 पर इनका महत्व है इतना ।
इंसान के सोए दायित्व को
दे जाते हैं ये एक नई चेतना।
मिला मुझे और ग्रहण किया
 तुम्हारे स्नेह में भीगा
भ्राता और भगिनी के बीच
 अटूट प्रेम को द्रढ़ बनाने और
 चतुर्मुखी उन्नति की मनोकामना लिए
 पवित्र धागा।
मेरे दायित्व को
 मिली नई चेतना
मैंने जानी कच्चे धागे की मजबूती
भगिनी मैं भी करता हूं
हृदय की गहराइयों से
तुम्हारे प्रति अपना दायित्व
निभाने का वादा।

गुरुवार, 6 फ़रवरी 2020

अवसरवादी नहीं, गांधीवादी

 आदर्शवादी बनने का
 ढोंग रचाते हैं कुछ लोग
 ढक देते हैं वे आदर्शवाद को
 स्वार्थ की गहरी परतों में।
 दामन आदर्शवाद का छोड़
पकड़ते हैं अवसरवाद का
और बन जाते हैं अवसरवादी ।
 मानव हैं हम
फिर मानव मात्र की सेवा को
हटा दें हम आदर्शवाद पर छाई
स्वार्थ की गहरी पर्तों को।
संजो कर दिलों में गांधी का गांधीवाद
बन जाएं हम गांधीवादी ।

अकालग्रस्त क्षेत्र का दौरा

अकाल ग्रस्त क्षेत्र में
 भूख से आक्रांत मानव को
देखने को मिलते हैं
रोटी की जगह
 अनेक अनजान चेहरे।
कुछ कवि और पत्रकार आये
 स्थिति पर सौ सौ आंसू बहाए
कवि की कविता और पत्रकार के लेखों को
 चोटी की पत्रिकाओं में स्थान मिला,
 और साथ ही भरपूर पारिश्रमिक मिला।
 कुछ चित्रकार भी आये
 दिल जिनके दुख से भर आये
 और तुरंत ही कल्पना में
 एक नई आकृति ने जन्म लिया ।
उनके चित्र प्रदर्शनी में रखे गये
और कुछ छपे भी
कोई चित्रकार है ऐसा लोग जान पाये।
 अकाल से निपटने को
 कई कोष खोले गये
सैकड़ों अधिकारी भी
 सेवार्थ भेजे गये
 इस अकाल में उनका
 सकाल आ गया ,
कईयों ने अपने बंगलों का
प्लान बना लिया ।
मंत्री जी को भी तो आना था
क्योंकि उनके आये बिना
 हर काम अधूरा रहता है
हां तो उनका भी दौरा हुआ ,
अकाल ग्रस्त क्षेत्र में
 पकवानों पर हाथ साफ हुए
 और मंत्री जी का ही नहीं
और भी कईयों का TA,DA पक्का हुआ।
लोग आते रहे
 स्थिति का जायजा लेते रहे
 पर उस नर कंकाल को मिला क्या,
 जिसकी आंखें तरस रही हैं
 देखने को रोटी का एक टुकड़ा ?
सिर्फ कुछ आश्वासन और सर्द आहें ।

बुधवार, 5 फ़रवरी 2020

ठूंठ

 ठूंठ ,क्यों कर रहा तू मौन तपस्या
  हो ध्यान में लीन ,
लगता है कर रहा इस जग में 
शांति की खोजबीन।
  शांति जिसे चाह रहा 
हर प्राणी हर इंसान ,
मगर पा न सका कोई,
 इसका कभी निदान।
 पुकार रहा यह जग है
 हर पल हर क्षण,
 हर समय समय से जूझ रहा 
सदियों से कर रहा काल से घर्षण।
 राष्ट्र राष्ट्र से टकरा रहा 
मानव मानव से जूझ रहा 
क्यों? केवल एक ही है प्रश्न,
 राष्ट्र औ मानव देख रहे 
शांति का चिर स्वप्न ।
देख रहा तीक्ष्ण दृष्टि से 
बिजली की चमचम में,
गंगा की पवित्र धार में 
यमुना की कलकल में।
मैं बताऊं शांति तो है 
क्षितिज के उस पार,
इसलिये मानव कर न सकेगा 
स्वप्न अपना साकार।
 तो सुन है मौन व्रत सन्यासी 
न रह निर्वस्त्र ,
कर दे बंद शांति की खोज
 क्योंकि रहेगी यहां तो अशांति ही सर्वत्र।
 किंतु फिर भी है तू अडिग
 करने को अपनी पुरातन खोज,
 तो फिर रह अडिग ही
शायद क्षितिज के उस पार
 शांति तू पाकर 
दिखा सके दुनिया को
 अपना ओज ।
द्रढ़वत हो होजा ध्यान में लीन
 ताकि न रहे तपस्या तेरी निराधार ,
निर्विकार हो इस जग में
 कर दे मानव का स्वप्न साकार ।

सोमवार, 3 फ़रवरी 2020

राही मंजिल के

देश भाव डूबे न कभी भी,
 रहेंं रत सेवा में हर दम।
 कटुता का संचार रहे ना हम में,
गूंजे दिल में वीणा की सरगम।

कभी-कभी जब भी छा जायें,
उमड़ घुमड़ कर संकट के बादल ,
हटें न पीछे  ये बादल मिटा दें,
 गूंजती रहे गंगा-यमुना की कल कल।

स्वतंत्र हैं हम पर फिर भी,
 हैं परतंत्र क्यों अपने दिल के।
 उजाला दिलों में अपने कर दें,
बन जायें हम राही मंजिल के।

दायरा

 अतीत के दायरे से निकल,
वर्तमान की कठोर धरती पर,
 जब मैं विचरण करता हूं,
 तो सोचता हूं कि आदमी,
आदम से आदमी हो गया है ।
पर जब वर्तमान की कठोर धरती से उठ,
भविष्य की कल्पना में उड़ान भरता हूं,
 तो सोचता हूं कि कहीं आदमी,
आदमी से आदम न हो जाये।

धरती कहे पुकार के

जन्म दात्री इस माटी का सम्मान करें,
सर्वप्रिय है जो देश हमें उसका गुणगान करें।
 आजाद हिंद के होंं सिपाही सेवा देश की कर जायें,
 मोह रहे न तन का प्राण न्योछावर कर जायें।
 गुलशन बन जायें हम भी देश में आती बहार के,
पूर्ण धरा पर हरियाली कर दें धरती कहे पुकार के।
 मातृभूमि के जन-जन को नूतन जीवन दान करें,
 पाठ पढ़ायें ऐसा उनको भारत पर अभिमान करें।
 हटेंं ना पीछे कभी भी हम काम निराला कर जायें,
 हो जायें चाहे शहीद नाम देश का अमर कर जायें।
  बन जायें वंशज हम डोली उठाते कहार के,
उठाएं मातृभूमि की डोली फिर धरती कहे पुकार के।
 सर्वत्र देश का नाम हो ऐसा हम अभियान करें,
  सर्वमुखी प्रतिभा फैले जग में ऐसा हम अरमान करें।
 आभा से हो जाए पूर्ण सेवा ऐसी करते जायें,
सुवासित हो उपवन यह खून से इसे सींचते जायें।
 माझी ना बन जायें कहीं हम नदियों की मझधार के,
 नय्या देश की पार करें हम धरती कहे पुकार के।
वीर शहीदों ने सींचा इसको हम इसकी रखवाली करें,
संपन्नता से हो जाए पूर्ण फिर रोज हम दिवाली करें।
 ना रहे भूख कहीं भी अन्न इतना उपजायें,
 आंख उठाये दुश्मन जो सीमा पर डट जायें ।
गीत गायें फिर हम खुशहाली की नौका विहार के,
भारत मां के लाल हैं हम धरती कहे पुकार के।

रविवार, 2 फ़रवरी 2020

श्मशान से नाता

श्मशान है जीवन मेरा
 शमशान  सी नीरवता है मुझमें
मौन उदासी की तपस्या में
 घुट घुट कर में यूं ही जी रहा हूं,
जुग भी  न गिने थे मैंने
 क्षण क्षण अब गिनकर
 जीवन के चिथड़े सी रहा हूं ।
कोहरा मुसीबत का क्यों छाया है मुझ पर
 मैं तो जीवन में ज्योति जला रहा था ,
ज्योति जलाकर जीवन में अपने
 पथ पर उजाला मैं कर रहा था।
 चक्र समय का चला तभी से
 मेरे जीवन का आनंद भंग हुआ,
 सुख के साथी छूटे सब
दुख एक साथी संग हुआ ।
तारे झिलमिलाते रहे गगन में
मैं घुटता रहा अपने ही मन में,
 बादल जो छाये बिजली जो चमकी
तो मुझको सुध आई इस तन की ।
 हां श्मशान नहीं है जीवन मेरा
 श्मशान तो मृत्यु है मेरी ,
उजाला है यहां चेतना का
 रातें नहीं अज्ञान की अंधेरी ।
 कोहरा जो छाया समय का मुझ पर
 चुप क्यों हूं मिटा इसे दूं ,
जूझ पड़ूं जीवन से अपने
 ज्योति जीवन में अपने जला दूं।

शनिवार, 1 फ़रवरी 2020

मैं इंसान बनना चाहता हूं

मैं इंसान बनना चाहता हूं
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😜😜😜😜😜😜😜

-- तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है, बनना चाहता हूं तो बनना चाहता हूं । क्यों बनना चाहता हूं , इस बात को छोड़ो, मूल बात यह है कि बनना चाहता हूं । आप सोच रहे होंगे कि जैसे आप लोग इंसान हो वैसे ही मैं भी इंसान हूं लेकिन, मैं इस बात को नहीं मानता । बरसों पहले इस बात का बीज मेरे दिमाग में डाला गया था , यही कोई लगभग 45 साल पहले । एक नेकदिल कन्या ने मेरी बहिन को बोला कि तेरा भाई इंसान तो नहीं है । जब मेरी बहिन ने यह बात मुझे बताई तो मैं बड़ी सोच में पड़ गया । मैंने उसको पूछा कि फिर मैं क्या हूं ? तो उसने कहा कि मेरी सहेली् ने फिर आगे कहा था कि तेरा भाई भगवान भी नहीं है । यह लो , और लोचा आ गया । अब तो मैं बड़े पशोपेश में पड़ गया । ना मैं इंसान हूं ना मैं भगवान हूं तो क्या मैं शैतान हूं ? तब मेरी बहन ने मेरी शंका का समाधान किया और कहा कि नहीं भाई साहब ,आप शैतान तो कतई नहीं हो । अब तो मेरे दिमाग का दही जमना शुरू हुआ कि जब मै  इंसान नहीं हूं, भगवान नहीं हूं ,  शैतान भी नहीं हूं तो आखिर हूं क्या ? मुझे लगा कि मैं सिर्फ चूंचूं का मुरब्बा हूं । अब यदि मैं लोगों को कहता हूं कि मैं चूंचूं का मुरब्बा हूं तो कोई इस बात को समझ नहीं पाएगा और इस नई प्रजाति के बारे में तरह तरह की शोध शुरु हो जाएगी । अंततःमैंने सोचा कि मुझे तो इंसान ही बनना चाहिए । इसके लिए बरसों से  प्रयत्न किये जा रहा हूं , बहुत से साधु ,महात्माओं , बुद्धिजीवियों  से संपर्क किया , बहुत से शब्दकोषों मेंं अपना सिर दे मारा लेकिन सही-सही और पूरी परिभाषा या जानकारी मुझे कहीं नहीं मिली । मैं बहुत परेशान हूं , भाई साहब ! मैं वास्तव में , सही से , अपने दिल से , आपको बताना चाहता हूं कि मैं इंसान बनना चाहता हूं , मैं बहुत समय से इंसान बनने के लिए फार्मूला ढूंढ रहा हूं । अब , आप लोग  इंसान है या नहीं यह तो मैं नहीं जानता  लेकिन फिर भी  आप लोगों से मैं निवेदन करता हूं कि यदि आपके पास ऐसा कोई फार्मूला है तो कृपया मुझे जरूर बताएं , क्योंकि एक बार फिर आपको बता दूं कि , मैं इंसान बनना चाहता हूं ।

पोरवाल समाज की पहिचान(2)

*पोरवाल समाज की पहिचान (2)*

 आम धारणा है कि "पोरवाल समाज दर्पण" पत्रिका के सम्मानित सदस्य या तो पत्रिका को देखते नहीं , देखते हैं तो पढ़ते नहीं , पढ़ते हैं तो सोचते नहीं , सोचते हैं तो अपने विचार प्रकट नहीं करते और विचार कर भी लें तो अमल में नहीं लाते । गतांक में पत्रिका में दिए गए इसी शीर्षक से लेख पर कुछ ही प्रबुद्ध पाठकों ने  लेख में प्रकट किए गए विचारों की प्रशंसा करते हुए अपनी सकारात्मक प्रतिक्रिया दी -  भोपाल से श्रीमती साधना गंगराड़े और श्री एम एल गुप्ता इंदौर से श्री सतीश गुप्ता कोटा से श्री प्रमोद गुप्ता , रावतभाटा से हर्षवर्धन गुप्ता एवं जयपुर से श्री विनोद जैन - इन सभी का आभार एवं धन्यवाद । अब आगे - - -
 
  मैं जानता हूं की लगभग सभी स्थानों पर कुछ लोग अपने नाम के साथ पोरवाल लगाते हैं लेकिन यदि इनकी संख्या देखी जाये तो 50 से100 तक सिमट जाएगी ( ऐसे सभी बन्धु प्रशंसा  एवं बधाई के पात्र हैं ) । मैं चाहता हूं कि सभी लोग बोलचाल /पत्राचार में, विजिटिंग कार्ड , फेसबुक, व्हाट्सएप पर अपने नाम में गुप्ता  ,जैन (एवं अन्य) के आगे पोरवाल अवश्य जोड़ें। इसे एक मुहीम / आंदोलन का रूप दें ।

यदि उपरोक्त अनुसार हम अपने  कदम बढ़ा चुके हैं तो बहुत अच्छी बात है लेकिन, यह मात्र आरंभ है, इसे इति ना समझें । समाज की पहिचान बनाने के लिए हमें बहुत कुछ करना होगा हम इतने संपन्न नहीं हैं कि हमारे समाज के स्कूल कॉलेज धर्मशाला मंदिर आदि हो जोकि समाज की पहिचान के लिए मील का पत्थर साबित होते हैं । आइए हम देखें ऐसी कौन सी कमियां है जिनकी वजह से हमारे समाज की पहिचान नहीं बन पा रही है ।
शिक्षा के क्षेत्र में देखें तो हम पाते हैं कि हमारे समाज का कोई स्कूल, कॉलेज या विश्वविद्यालय नहीं है और ना ही कोई राष्ट्रीय स्तर का शिक्षाविद है ।
प्रशासनिक क्षेत्र की बात करें तो एकमात्र जिलाधीश के स्तर पर श्रीमान एल सी गुप्ता साहब रहे। एक लंबे अरसे के बाद दो या तीन व्यक्ति IAS बने , फिर बारां से सागर गुप्ता और पिछले वर्ष सवाई माधोपुर से एक साथ 4 अभ्यर्थियों ने IAS परीक्षा पास की । इस बीच तो लगभग शुन्य ही रहा । और आगे बढ़ें तो हम पाते हैं कि कविता ,गीत, संगीत, गायन, न्रत्य , खेल , फिल्म क्षेत्र में कोई कलाकार , कोई  उद्यमी , व्यवसायी,MLA , या मंत्री -- कोई नजर नहीं आता ।   
जैसा कि पहले जिक्र हुअा कि सवाई माधोपुर क्षेत्र से 4 अभ्यर्थी एक साथ IAS बने , यह मात्र संयोग नहीं है , यह योग है -- अभ्यर्थियों की मेहनत एवं स्थानीय पोरवाल समाज के योगदान का (संसाधन उपलब्ध कराये - कोचिंग व रहने आदि की व्यवस्था करके अपना योगदान दिया ) , परिणाम स्वरूप सफलता मिली । क्या सभी स्थानों के समाज इस तरह की व्यवस्था करते हैं ? कभी किसी क्षेत्र में मार्गदर्शन देने की कोई व्यवस्था की है ?  इसी तरह खेल के क्षेत्र में समाज में देखें तो , इंदौर की सृष्टि गुप्ता बैडमिंटन के खेल में निरंतर सफलता प्राप्त कर कई पुरस्कार बटोर चुकी है , साथ ही  जयपुर की प्रिशा गुप्ता इस ओर अग्रसर है ।ये दोनों ही हैदराबाद एवं.बैंगलोर में बैडमिंटन अकैडमी से कोचिंग प्राप्त कर रही हैं ,अपने परिवार के बलबूते । समाज सहयोग करे तो विभिन्न क्षेत्रों में प्रतिभाओं को तलाश कर उन्हें तराशा जाये तो ये लोग परिवार ही नहीं वरन् समाज का भी नाम रोशन करेंगे  और समाज की पहिचान में योगदान दे पाएंगे ।  व्यक्ति मिलकर समाज बनाते हैं और समाज व्यक्ति को विशेष बनाता है । इस दिशा में बहुत कुछ करने की आवश्यकता है और हमें करना चाहिए । यदि हम चाहते हैं कि हमारे समाज की पहिचान उसी तरह की हो, जिस तरह की  अन्य समाजों की है तो  सभी स्थानों के पोरवाल समाज के पदाधिकारियों एवं अखिल भारतीय पोरवाल समाज के पदाधिकारियों को कार्य योजना बनाकर , ठोस निर्णय लेते हुए, इन योजनाओं पर अमल करने का निश्चय करना चाहिये ।


   

पोरवाल समाज की पहिचान

🌼पोरवाल समाज की पहिचान🌼
     बड़ी कोफ्त होती है जब , दूसरो़ की बात तो छोड़ें ,वैश्य समुदाय के ही कुछ घटकों के लोग ही यह पूछ बैठते हैं कि ये पोरवाल कौन होते हैं ?
 वैसे तो ऐसा कई अवसरों पर मेरे साथ ऐसा हुआ है लेकिन यहां ,  सिर्फ दो घटनाओं के माध्यम सेे मैं इस बात का उल्लेख करना  चाहता हूं ।
 जयपुर में विगत पोरवाल समाज के कार्यकारणी के चुनाव के समय एक बुजुर्ग महाशय ने मुझसे पूछा कि यह जो बैनर लगा हुआ है इसमें लिखा है पोरवाल समाज , तो यह पोरवाल किस में आते हैं ?प्रत्युत्तर से पूर्व  मैंने उनसे ही प्रश्न पूछा कि आप किस समाज से हैं ? उनका जवाब था कि मैं खंडेलवाल  हूं ,तब मैंने जवाब दिया कि जैसे आप खंडेलवाल हैं , कोई अग्रवाल हैं वैसे ही हम भी वैश्य समाज के घटक पोरवाल हैं । दूसरी घटना है - मैं किसी को कोई मकान दिखाने गया था वे खुद सिंघल थे , उन्होंने पूछा कि आप कौन से गुप्ता हो मैंने कहा पोरवाल तो उन्होंने प्रश्न किया कि यह पोरवाल कौन होते हैं , तब फिर मैंने वही बात दोहराई जो पहले बताई जा चुकी है कि , जैसे आप सिंघल हो यानी अग्रवाल हो वैसे ही हम पोरवाल हैं और हम  भी आपकी ही भांति वैश्य समाज के घटक हैं ।
 आखिर क्यों आवश्यकता होती है हमें यह बताने की कि हम पोरवाल हैं और हम भी वैश्य समाज के ही घटक हैं ।  हमारे समाज की पहिचान हम बना क्यों नहीं पा रहे हैं ? ऐसा नहीं है की पोरवाल समाज , जो मुख्यतः राजस्थान , उत्तर प्रदेश , दिल्ली , मध्य प्रदेश आदि मे फैला हुआ है , वह सम्मिलित रूप से कोई विचार विमर्श /सम्मेलन /बैठकें आदि न करते हों । स्थानीय , क्षैत्रिय व अखिल भारतीय स्तर पर भी बैठकें आयोजित की जाती हैं जिनमें, जहां तक मुझे लगता है यह होता है - पिछली  बैठक में कौनसे प्रस्ताव पास किये गये , फिर , इस बैठक के लिय नये प्रस्ताव प्रस्तुत किये जाते है , एक अनिवार्य सा लगने वाला, कुछ पदाधिकारियों का सम्मान किया जाता है और अन्ततः अगली बैठक के लिये समय व स्थान की घोषणा (हां ,मांगलिक प्रकोष्ठ की स्थापना एक प्रशसनीय कदम है)। इतने वर्षों में इतनी बैठकों के बाद भी पोरवाल समाज की  पहचान न होना आखिर चिन्ता का विषय होना चाहिये । इसके लिए किसे जिम्मेदार माना जाए , आखिर ऐसा क्यों है ? ऐसी कौन सी कमियां हैं जिनकी वजह से हमारी पहिचान नहीं बन पा रही है और हमें ऐसा क्या करना चाहिए कि पूरे वैश्य समाज में हमारे समाज को पहिचान मिले और आगे से कोई ऐसा न पूछे कि यह पोरवाल क्या होते हैं ।
 चलिए, एक महत्वपूर्ण सुझाव  तो मैं अपनी ओर से दे देता हूं और वह यह कि हम अपने नाम के साथ पोरवाल अवश्य जोड़ें । अपने विजिटिंग कार्ड /लेटर हेड/ फेसबुक / व्हाट्सएप आदि पर आप अपने नाम के साथ "पोरवाल" भी जोड़ देंगे तो पोरवाल समाज की पहिचान में यह आपका एक महत्वपूर्ण  योगदान होगा ।
  तो , इस बारे में कौनसे कदम उठाये जाने की आवश्यकता है , विचार करें और अपने सुझाव हमें भेजने का श्रम करें ।
  ( मैंने तो पहला कदम उठा लिया है , अब आपकी बारी है ।)


शुक्रवार, 31 जनवरी 2020

चेतना दे दो

 अचेतन है मन मानव का
 समय की दौड़ में ,
 कोई छू रहा गगन को
 कोई जा रहा गर्त को ।
 नित नवनिर्मित आशाएं और
 मन की सरल भी उत्कंठा,
 पूर्ण हुई क्या सबकी
  केवल भ्रांति रही मन की ।
 अचेतन है मन मानव का
 ढूंढता है चेतना वह ,
 ज्ञान का एक दिया लिए
गगन में औ धरा में
ढूंढ सकेगा क्या मानव इसको
 अब है ईश्वर अधिक न तरसा ,
 मानव के इस अचेतन मन को
 चेतना दे दो ।

इस दुनिया में मैं क्यों आया

  इस दुनिया में मैं क्यों आया,
  क्यों दिल पर एक कोहरा सा छाया।
  दिल में क्यों हूक सी उठती है हरदम,
 क्यों होती है दुनिया में चिंता और तड़पन।
  खयालों के अंधड़ क्या हमसे कह जाते,
  सपनों के आंसू क्यों हमको तड़पाते ।
 अंधियारे में चमक जुगनू की क्या हमसे कह जाती,
  क्या इस चमक में दिख जाती आशा की चिंगारी।
  पतंगे खुशी से क्यों दियों में जल जाते,
  क्या अपने अरमानों को ऐसे पूरा करते।
  क्या होती है दुनिया में दुनियादरी,
 होती है क्या सच्चाई और ईमानदारी।
 ऐसे प्रश्नों की आंधी ले जाती मुझे उड़ाकर
  छोड़ेगी न जाने मुझे कहां ले जाकर
 क्या दुनिया में ही ंंइनके भाव पा जाऊंगा
  या दुनिया से बाहर ही समझ मैं इनको पाऊंगा