शुक्रवार, 31 जनवरी 2020

चेतना दे दो

 अचेतन है मन मानव का
 समय की दौड़ में ,
 कोई छू रहा गगन को
 कोई जा रहा गर्त को ।
 नित नवनिर्मित आशाएं और
 मन की सरल भी उत्कंठा,
 पूर्ण हुई क्या सबकी
  केवल भ्रांति रही मन की ।
 अचेतन है मन मानव का
 ढूंढता है चेतना वह ,
 ज्ञान का एक दिया लिए
गगन में औ धरा में
ढूंढ सकेगा क्या मानव इसको
 अब है ईश्वर अधिक न तरसा ,
 मानव के इस अचेतन मन को
 चेतना दे दो ।

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