शनिवार, 1 फ़रवरी 2020

पोरवाल समाज की पहिचान

🌼पोरवाल समाज की पहिचान🌼
     बड़ी कोफ्त होती है जब , दूसरो़ की बात तो छोड़ें ,वैश्य समुदाय के ही कुछ घटकों के लोग ही यह पूछ बैठते हैं कि ये पोरवाल कौन होते हैं ?
 वैसे तो ऐसा कई अवसरों पर मेरे साथ ऐसा हुआ है लेकिन यहां ,  सिर्फ दो घटनाओं के माध्यम सेे मैं इस बात का उल्लेख करना  चाहता हूं ।
 जयपुर में विगत पोरवाल समाज के कार्यकारणी के चुनाव के समय एक बुजुर्ग महाशय ने मुझसे पूछा कि यह जो बैनर लगा हुआ है इसमें लिखा है पोरवाल समाज , तो यह पोरवाल किस में आते हैं ?प्रत्युत्तर से पूर्व  मैंने उनसे ही प्रश्न पूछा कि आप किस समाज से हैं ? उनका जवाब था कि मैं खंडेलवाल  हूं ,तब मैंने जवाब दिया कि जैसे आप खंडेलवाल हैं , कोई अग्रवाल हैं वैसे ही हम भी वैश्य समाज के घटक पोरवाल हैं । दूसरी घटना है - मैं किसी को कोई मकान दिखाने गया था वे खुद सिंघल थे , उन्होंने पूछा कि आप कौन से गुप्ता हो मैंने कहा पोरवाल तो उन्होंने प्रश्न किया कि यह पोरवाल कौन होते हैं , तब फिर मैंने वही बात दोहराई जो पहले बताई जा चुकी है कि , जैसे आप सिंघल हो यानी अग्रवाल हो वैसे ही हम पोरवाल हैं और हम  भी आपकी ही भांति वैश्य समाज के घटक हैं ।
 आखिर क्यों आवश्यकता होती है हमें यह बताने की कि हम पोरवाल हैं और हम भी वैश्य समाज के ही घटक हैं ।  हमारे समाज की पहिचान हम बना क्यों नहीं पा रहे हैं ? ऐसा नहीं है की पोरवाल समाज , जो मुख्यतः राजस्थान , उत्तर प्रदेश , दिल्ली , मध्य प्रदेश आदि मे फैला हुआ है , वह सम्मिलित रूप से कोई विचार विमर्श /सम्मेलन /बैठकें आदि न करते हों । स्थानीय , क्षैत्रिय व अखिल भारतीय स्तर पर भी बैठकें आयोजित की जाती हैं जिनमें, जहां तक मुझे लगता है यह होता है - पिछली  बैठक में कौनसे प्रस्ताव पास किये गये , फिर , इस बैठक के लिय नये प्रस्ताव प्रस्तुत किये जाते है , एक अनिवार्य सा लगने वाला, कुछ पदाधिकारियों का सम्मान किया जाता है और अन्ततः अगली बैठक के लिये समय व स्थान की घोषणा (हां ,मांगलिक प्रकोष्ठ की स्थापना एक प्रशसनीय कदम है)। इतने वर्षों में इतनी बैठकों के बाद भी पोरवाल समाज की  पहचान न होना आखिर चिन्ता का विषय होना चाहिये । इसके लिए किसे जिम्मेदार माना जाए , आखिर ऐसा क्यों है ? ऐसी कौन सी कमियां हैं जिनकी वजह से हमारी पहिचान नहीं बन पा रही है और हमें ऐसा क्या करना चाहिए कि पूरे वैश्य समाज में हमारे समाज को पहिचान मिले और आगे से कोई ऐसा न पूछे कि यह पोरवाल क्या होते हैं ।
 चलिए, एक महत्वपूर्ण सुझाव  तो मैं अपनी ओर से दे देता हूं और वह यह कि हम अपने नाम के साथ पोरवाल अवश्य जोड़ें । अपने विजिटिंग कार्ड /लेटर हेड/ फेसबुक / व्हाट्सएप आदि पर आप अपने नाम के साथ "पोरवाल" भी जोड़ देंगे तो पोरवाल समाज की पहिचान में यह आपका एक महत्वपूर्ण  योगदान होगा ।
  तो , इस बारे में कौनसे कदम उठाये जाने की आवश्यकता है , विचार करें और अपने सुझाव हमें भेजने का श्रम करें ।
  ( मैंने तो पहला कदम उठा लिया है , अब आपकी बारी है ।)


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