नहीं नहीं, तू मेरा गीत नहीं, मैं तेरा साज नहीं ।
अंधियारा था जब बचपन में ,
अरमान मचलते थे जब मन में ,
कोयल जैसी कूक लगाती ,
इठलाती बलखाती सर्पों जैसी लहराती ,
बहार साथ में लाकर के जब
छा जाती थी मेरे मन उपवन में,
धन्य धन्य हो जाता था मैं
पाता था तुझको जब मन आंगन में।
क्या इन सब बातों का हो गया अवसान नहीं ,
नहीं नहीं - - - -
हिमगिरी के उच्च शिखर पर
टिके हुए हैं तेरे आशा के नयन ,
चाहेंं छूना नभ के तारे
अभिलाषाओं से भरा रहे मन,
मैं तो धरा से ही ऊपर
नजरें न उठा सकता हूं,
जा सागर के पूर्ण गर्त में
मोती चुन चुन ला सकता हूं ।
तेरे मेरे भावों से क्या
मानस होता हैरान नहीं ।
नहीं नहीं - - - -
श्मशानों की नीरवता में
सिद्धि शांति की छिपी हुई है,
नभ सी ऊंची आशाओं में
नहीं बादल से घिरी हुई है।
तू चाहे हिमगिरी के शीर्ष मुकुट से
पाना शांति का अमिट वरदान ,
तुषारापात ना हो जाए कहीं
हैंं तेरे उपवन जैसे अरमान ।
श्मशानों से हिमगिरी तक क्या गूंजती यह आवाज नहीं ,
नहीं नहीं - - - -
कंचन सी काया में लिपटी है तू
साया कांटोंं का मैं झेल रहा हूं ,
सुवासित है हर सांस तेरी
रुकती सांसो को मैं देख रहा हूं ।
चांदी की दुनिया दिखती है तुझको
मग्न हो रही प्रति पल प्रति क्षण ,
घुटन हो रही दुनिया में मुझको
सिसक रहा है दिल का कण कण।
मेरे दिल में तेरी यादों का कोई ताज नहीं,
नहीं नहीं - - - -
प्रकृति की इस हरी गोद में
जीवन का सुख मिल जाता है,
वैभव से पूर्ण हो जीवन चाहे
पर वो सुख कहां मिल पाता है ।
लुट गए हैं जो भाव मेरे
उन्हें अब आवाज नहीं दूंगा ,
विरह से व्याकुल हो अब चाहे तू
पर फरियाद मैंं अब नहीं सुनूंगा ।
तेरे वीरह के गीतों को मेरे दिल का साज नहीं ,
नहीं नहीं तू मेरा गीत नहीं मैं तेरा साज नहीं।
अंधियारा था जब बचपन में ,
अरमान मचलते थे जब मन में ,
कोयल जैसी कूक लगाती ,
इठलाती बलखाती सर्पों जैसी लहराती ,
बहार साथ में लाकर के जब
छा जाती थी मेरे मन उपवन में,
धन्य धन्य हो जाता था मैं
पाता था तुझको जब मन आंगन में।
क्या इन सब बातों का हो गया अवसान नहीं ,
नहीं नहीं - - - -
हिमगिरी के उच्च शिखर पर
टिके हुए हैं तेरे आशा के नयन ,
चाहेंं छूना नभ के तारे
अभिलाषाओं से भरा रहे मन,
मैं तो धरा से ही ऊपर
नजरें न उठा सकता हूं,
जा सागर के पूर्ण गर्त में
मोती चुन चुन ला सकता हूं ।
तेरे मेरे भावों से क्या
मानस होता हैरान नहीं ।
नहीं नहीं - - - -
श्मशानों की नीरवता में
सिद्धि शांति की छिपी हुई है,
नभ सी ऊंची आशाओं में
नहीं बादल से घिरी हुई है।
तू चाहे हिमगिरी के शीर्ष मुकुट से
पाना शांति का अमिट वरदान ,
तुषारापात ना हो जाए कहीं
हैंं तेरे उपवन जैसे अरमान ।
श्मशानों से हिमगिरी तक क्या गूंजती यह आवाज नहीं ,
नहीं नहीं - - - -
कंचन सी काया में लिपटी है तू
साया कांटोंं का मैं झेल रहा हूं ,
सुवासित है हर सांस तेरी
रुकती सांसो को मैं देख रहा हूं ।
चांदी की दुनिया दिखती है तुझको
मग्न हो रही प्रति पल प्रति क्षण ,
घुटन हो रही दुनिया में मुझको
सिसक रहा है दिल का कण कण।
मेरे दिल में तेरी यादों का कोई ताज नहीं,
नहीं नहीं - - - -
प्रकृति की इस हरी गोद में
जीवन का सुख मिल जाता है,
वैभव से पूर्ण हो जीवन चाहे
पर वो सुख कहां मिल पाता है ।
लुट गए हैं जो भाव मेरे
उन्हें अब आवाज नहीं दूंगा ,
विरह से व्याकुल हो अब चाहे तू
पर फरियाद मैंं अब नहीं सुनूंगा ।
तेरे वीरह के गीतों को मेरे दिल का साज नहीं ,
नहीं नहीं तू मेरा गीत नहीं मैं तेरा साज नहीं।
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