शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2020

अब दशहरा मनाएं

 राम का इतिहास नहीं दोहरा रहे हैं ,
पर हम दशहरा मना रहे हैं ।
 अत्याचारों को सहा है हमने
अज्ञान बने रहे ज्ञान कैसे आये,
आलस्य तजना तो दूर रहा
पक्षपात भी अब तक तज न पाये।
 बेईमानी तो जीवन का अंग बना है
स्वार्थ में हो गए सब अंधे हैं ,
बेकारी तो बढ़ रही निरंतर
 रिश्वत के चलते खूब धंधे हैं ।
भुखमरी के मारे हैं कुछ लोग
 द्वेष इन बेचारों से क्यों करें,
 इन सब शत्रुओं से अब तक हारे हैं
 पर अब हारों से जमकर लड़ेंं ।
 यदि इन दस शत्रुओं को हम हरा रहे हैं,
तब कहेंं हम,हम दशहरा मना रहे हैं ।

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