अतीत के दायरे से निकल,
वर्तमान की कठोर धरती पर,
जब मैं विचरण करता हूं,
तो सोचता हूं कि आदमी,
आदम से आदमी हो गया है ।
पर जब वर्तमान की कठोर धरती से उठ,
भविष्य की कल्पना में उड़ान भरता हूं,
तो सोचता हूं कि कहीं आदमी,
आदमी से आदम न हो जाये।
वर्तमान की कठोर धरती पर,
जब मैं विचरण करता हूं,
तो सोचता हूं कि आदमी,
आदम से आदमी हो गया है ।
पर जब वर्तमान की कठोर धरती से उठ,
भविष्य की कल्पना में उड़ान भरता हूं,
तो सोचता हूं कि कहीं आदमी,
आदमी से आदम न हो जाये।
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