गुरुवार, 13 फ़रवरी 2020

नादान हूं , अन्जान हूं

नादान हूं , अन्जान हूं,कहने को मगर यह आया हूं मैं,
दुनिया में आकर जियो ना ऐसे, कुछ शब्द कहने को लाया हूं मैं नादान हूं अन्जान हूं ।
 समंदर के झाग बटोरे हैं, गहरे से मोती ना ला पाए हो तुम, दुनिया का मेला देखा है, गिरेबांं में अपने न झांके हो तुम,
जानी न तुमने दुनिया है क्या,दुनिया ही बताने को आया हूं मैं नादान हूं अन्जान हूं - - -
पुण्य का मतलब न जानो तो तुम पापों से अपने इनको न तोल तन बिकते हैं दुनिया में लेकिन मन का न कोई होता है मोल जीवन की आभा हो जिसमें तस्वीर ऐसी दिखाने लाया हूं मैं नादान हूं अन्जान हूं ।
जो दुख ना होता तो सुख भी ना होता ,
जो पतझड़ ना होता तो सावन ना होता ,
सांसों के तारों से जीवन बंधा है पर ,
घुट घुट के जीना तो जीना ना होता।
दिलों में सबके बनी है जो खाई, वह खाई पटाने को आया हूं मैं नादान हूं अन्जान हूं ।
 राहों में आकर के गुमराह होना आसान है मुश्किल नहीं है,
राहों में जो अड़चन आये टकरा ले इनसे वह बुजदिल नहीं है, दुनिया में आकर जीना जो जाने वह इंसांं बनाने को आया हूं मैं नादान हूं अन्जान हूं ।
 जीवन घुटे ना वह बंगला बना ले,
फिसले न जिन पर वो राहें बना ले,
कांटे हटा ले पैरों के अपने,
अपने गुणों का उपवन खिला ले।
 दुनिया हो कैसी, ख्वाबों की जैसी
वो दुनिया बसाने को आया हूं मैं,
 नादान हूं अन्जान हूं ,कहने को मगर यह आया हूं मैं
 दुनिया में आकर जियो न ऐसे कुछ शब्द कहने को लाया हूं मैं, नादान हूं अन्जान हूं ।

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