शुक्रवार, 12 अप्रैल 2019

भगतराम.का भविष्य फल

😀भगतराम का भविष्य फल 😀

भगतराम जी कर चुके थे बी ए पास,
 घूम रहे थे नौकरी की दिल में लेकर आस।
 चाह रहे थे होना अफसर पर थी लाचारी ,
किस्मत पर लौट रही थी बेकारी ही बेकारी ।
तभी अचानक एक ज्योतिषी दिख आया,
देख भगतराम ने उसको अपना भाग्य आजमाया ।
पूछा, बोलो होगी कैसे मेरी नैया पार,
 या पड़ा रहूंगा मैं तो यूं ही बेकार।
 देखी चट से ज्योतिषी ने हाथ की रेखाएं ,
बोला तुझे भाग्य से है बड़ी-बड़ी आशाएं ।
आई है क्यों मुख पर तेरे निराशा घोर,
होंगी बस ट्रक औ कारें तेरे चारों ओर ।
 यह सुनकर भगत राम जी अति ही हर्षाये ,
निकाल जेब से रुपए दस भेंट तुरंत कर आये ।
 सोचा उसने, कितना खुश नसीब मैं हो जाऊंगा ,
बस ट्रक औ कारों का मालिक बन जाऊंगा ।
मिली नौकरी भगतराम को खत्म हुई निराशा ,
  पर वह इससे रख सकता था रोटी की ही आशा।
  एक रोज फिर उसे वही ज्योतिषी दिख आया,
 दौड़ तुरंत ही वह उसके पास आया ।
बोला सोचा था मैंने सैर करूंगा कारों पर ,
 पर ट्रैफिक कंट्रोल कर रहा मैं चौराहों पर ।
 ज्योतिषी था तेज बोल उठा जल्दी से,
  तू सोच रहा है बता दिया था तुझे गलती से ।
 सुन चौराहे पर ड्यूटी जब तेरी रहती है ,
तब क्या बस,ट्रक ,कारें चारों ओर नहीं रहती है
😀😀😀😀😀😀😀

बहार

☘बहार ☘

उपवन के विकसित फूलों की खुशबू , 
 महक निराली मेरे दिल को दे जाती है ।
 सावन के झोकों से, पेड़ों के झुरमुट से, 
 वीणा मेरे दिल की बजा वो जाती है ।

 बहारों का साया है उपवन के आंगन में,
 श्रंगार दुल्हन सा कर जाती है ।
 सजाती है जैसे मांग में सिंदूर, 
 अंखियों में काजल लगा जाती है ।

रसपान करते रहे भौंरे फूलों के तन पर, 
 महक और उनकी महकती जाती है ।
 चाहें ना हम महक से कुछ भी,
  फिर भी चाहत बस बहकती जाती है ।

 उपवन से उठकर,झोकों के बल पर,
 बहार मेरे दिल में आ ही गई ।
  न रह मुरझा कर खिल तू जा , 
 बात मेरे दिल को सिखा वह गई ।


प्रलय के राग

प्रस्तुत है , स्वरचित एक कविता जो आज के माहौल में प्रासंगिक है ।
         🔥प्रलय के राग🔥

क्रांति की बेला क्योंकि करने लगी पुकार,
  लेखनी फिर आज मेरी गाने लगी प्रलय के राग।
 याद वो हैं आ रहे आग में जो लौह थे ,
 दुश्मनों की चाल में बन  रहे अवरोध थे ।
 उठी तलवार जो किसी की बन रहे वो ढाल थे,
  टूट पड़े रणभूमि में वो बन कर काल थे।
 नेत्र दृष्टि से उनकी बिखर पड़ी थी आग-आग,
  लेखनी फिर- - -
 पायलों की झनकार सुन ज्यों रोम-रोम फड़क उठे,
 घायलों के घाव यों और भी असर करे ।
आंख चाहे राह ढूंढे बांह चाहे साथ छोड़े ,
 घास की हों चाहे रोटियां पर मान का लिहाफ ओढ़े ।
 हिल उठे थे सुषुप्त मन भी सुनी जब रण की हुंकार,    लेखनी फिर- - -
 मातृभूमि को देखता है कौन गिद्ध दृष्टि से,
 वरद् हस्त मिला हुआ है जिस धरा को सृष्टि से।
 कौन है जो मूर्ख बन स्वप्न में इतरा रहा,
  बार-बार रेत में नादान महल बना रहा ।
 जल रहे हैं इस ह्रदय में देश प्रेम के चिराग,
 लेखनी फिर  - - -
 पर्वतों की श्रंखला और सागरों की मौज में,
 घूमता है मन मेरा आज किसी की खोज में।
आग लगा दे मन में भाव ऐसे मिल सकेंगे ,
 चेतना मिल जाए ऐसी लोग सोते जग सकेंगे ।
 बहार ऐसी लाऊंगा मैं वन बनेंगे बाग-बाग,
 लेखनी फिर- - -
 झंझावात उठ रहे अनगिनत तुम अभी तक सो रहे ,
 मृग-मरीचिका सी दुनिया में उतर कर खो रहे ।
 भुजाएं फड़क न उठी तुम्हारी सुनकर धरा की कराह,
  तुम्हारे इस मौन पर भर सकूंगा मैं मात्र आह ।
  कुंठित सुरों के हर साज के गूंज उठेंगे तार-तार,
  लेखनी फिर- - -
 गदा उठाकर भीम और धनुष उठा अर्जुन बनो,
पर्वतों को तोड़ सको और बिंदु को भी भेद दो।
  ठोकर तुम्हारी जहां पड़े जलधार वहां फूट पड़े,
  क्रोध दृष्टि पड़े जिधर कहर वहां टूट पड़े ।
 नैन मल के सो ना फिर
उठ जवान जाग-जाग,
लेखनी फिर आज मेरी गाने लगी प्रलय के राग ।

रचयिता --
 सतीश कुमार गुप्ता
मानसरोवर , जयपुर ।
9414047338