शुक्रवार, 12 अप्रैल 2019

बहार

☘बहार ☘

उपवन के विकसित फूलों की खुशबू , 
 महक निराली मेरे दिल को दे जाती है ।
 सावन के झोकों से, पेड़ों के झुरमुट से, 
 वीणा मेरे दिल की बजा वो जाती है ।

 बहारों का साया है उपवन के आंगन में,
 श्रंगार दुल्हन सा कर जाती है ।
 सजाती है जैसे मांग में सिंदूर, 
 अंखियों में काजल लगा जाती है ।

रसपान करते रहे भौंरे फूलों के तन पर, 
 महक और उनकी महकती जाती है ।
 चाहें ना हम महक से कुछ भी,
  फिर भी चाहत बस बहकती जाती है ।

 उपवन से उठकर,झोकों के बल पर,
 बहार मेरे दिल में आ ही गई ।
  न रह मुरझा कर खिल तू जा , 
 बात मेरे दिल को सिखा वह गई ।


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