☘बहार ☘
उपवन के विकसित फूलों की खुशबू ,
उपवन के विकसित फूलों की खुशबू ,
महक निराली मेरे दिल को दे जाती है ।
सावन के झोकों से, पेड़ों के झुरमुट से,
सावन के झोकों से, पेड़ों के झुरमुट से,
वीणा मेरे दिल की बजा वो जाती है ।
बहारों का साया है उपवन के आंगन में,
बहारों का साया है उपवन के आंगन में,
श्रंगार दुल्हन सा कर जाती है ।
सजाती है जैसे मांग में सिंदूर,
सजाती है जैसे मांग में सिंदूर,
अंखियों में काजल लगा जाती है ।
रसपान करते रहे भौंरे फूलों के तन पर,
रसपान करते रहे भौंरे फूलों के तन पर,
महक और उनकी महकती जाती है ।
चाहें ना हम महक से कुछ भी,
चाहें ना हम महक से कुछ भी,
फिर भी चाहत बस बहकती जाती है ।
उपवन से उठकर,झोकों के बल पर,
उपवन से उठकर,झोकों के बल पर,
बहार मेरे दिल में आ ही गई ।
न रह मुरझा कर खिल तू जा ,
बात मेरे दिल को सिखा वह गई ।
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