रविवार, 30 जुलाई 2023

कविता

 माटी कहे कुम्हार से, 

 तू ही है सच्चा कलाकार।

 जो भी जैसा चाहता,

 देता मेरे तन को आकर।

 यूं तो कहते हैं दुनियाँ के लोग,

कि माटी का क्या है मोल,

 एक पलड़े में रख दो कुछ भी,

 दूसरे में माटी से न तोल।

  अच्छे- अच्छों की नकली इज़्ज़त, 

  मिट्टी में ही मिल जाती है।

 दम्भ करें कितना भी अपनी काया पर, 

  लेकिन एक दिन मिट्टी में ही दफन हो जाती है। 

सुन ले  ऐ मेरे मालिक 

 मेरी भावनाओं को समझ ।

मुझे विभिन्न रूपों में ढाल दे, 

इस दुनियाँ के फरेबी इंसान को, 

मेरी एक मिसाल दे। 

नदी से मिलने-- कविता

 जो मेरे घर कभी नहीं आएंगे,

मैं उनसे मिलने उनके पास चला जाऊंगा।

नदी जैसे लोगों से मिलने नदी किनारे जाऊंगा,

 एक उफनती नदी कभी नहीं आएगी मेरे घर,

  कुछ तेरूंगा और डूब जाऊंगा।

 मैं तो ठहरा एक ठहरा हुआ पानी,

 नदी के जल को कहां है फुर्सत रुकने की।

 वह तो अविरल बहता ही रहता है,

 कल कल मधुर संगीत सुनाता  रहता है।

 यदि मैं ऐसे ठहरा ही रहा तो,

 जल जैसा मन प्रदूषित हो जाएगा।

 ग़र नदिया से जो जा मिलूंगा, 

  तो मन स्वच्छ पारदर्शी हो जाएगा। 

 एक उफनती नदी को कहां है फुर्सत, 

  कि वह कुछ पल भी ठहर जाए,

 वह तो अविरल चलने की आदी है,

 अपने जल को यहां से वहां पहुंचाती है। 

  अपने मन के भावों को अपने में ही न सिमटा लूं,

 उदार दिलों से मिलकर अपने भावों को विस्तार दिला दूँ। 

वे न आएं मेरे पास तो न आएं, 

मैं तो किंचित भी नहीं सकुचाऊंगा।

मैं उनसे मिलने की खातिर,

 उनके पास चला जाऊंगा।

Ckkk- मासिक 

मंगलवार, 25 जुलाई 2023

ठिकाना-- कविता

 मेरा कोई ठिकाना नहीं तेरे सिवा, 

 दुनियाँ ने तो मेरा वज़ूद ही मिटा दिया।

क्या क्या ख़ाब देखे थे इस दुनियाँ में,

फूलों की तरह महकूँगा इस बगिया में।

 लेकिन सारे ख्वाब सूखे पत्तों की तरह बिखर गये,

 महल जो बनाये थे सपनों के वे सब ढ़ह गये।

 अब हम जाएं तो जाएं कहां,

छोटा पड़ गया मेरे लिए यह जहां।

कभी यहां कभी वहां डोलता रहता हूं,  

असमंजस के झूले में झूलता रहता हूं।

ए दुनियाँ वालों मुझे और न सताओ,

हो ग़र कोई ठिकाना तो मुझे बताओ।

रविवार, 23 जुलाई 2023

https://streamyard.com/p59dyxb84x

 *सभी नए संचालकों का अभिनंदन*

  प्रसन्नता की बात है कि सभी नए मनोनीत संचालकों ने "स्ट्रीमयार्ड"  पर 'लाइव' करना सीख लिया है।

 *लेकिन संचालक बनने के लिए इतना ही काफी नहीं है कि 'स्क्रीन'  पर 'लाइव' आकर बस थोड़ी बहुत बातचीत कर ली। कार्यक्रम का संचालक एक जहाज के कप्तान की तरह होता है जिसे जहाज को,  गंतव्य तक , राह में आई किसी भी तरह की बाधाओं को पार करते हुए / यात्रियों को व्यस्त रखते हुए और सभी की सुविधाओं ख्याल रखते हुए , पहुंचाना होता है।

 *कार्यक्रम के दौरान कभी-कभी प्रतिभागी का 'internet' बाधित हो जाता है , संचालक को चाहिए कि वह इस दौरान प्रतिभागी की कही हुई बातों का विश्लेषण करे , कोई शेर /मुक्तक / कविता सुना दे।साथ ही यही बात प्रतिभागी को भी समझा दें कि वह भी , ऐसे समय में, ऐसा ही करे।

* कार्यक्रम के दौरान संचालक द्वारा सिर्फ इतना कहना ही काफी नहीं है कि आपका स्वागत है /आप कुछ सुनाइए / अपने बारे में कुछ बताइए आदि, बल्कि प्रतिभागी की बात में से बात निकाल कर उसका विश्लेषण करना /अगला संबंधित प्रश्न कर देना चाहिए। 

*निर्बाध रूप से, बिना अटके हुए, बोलने का अभ्यास होना चाहिए।  अपने घर पर ही यह मानकर कि आपके सामने एक दो या तीन प्रतिभागी ,अदृश्य रूप से , बैठे हुए हैं ,सवाल जवाब करते रहें । 

* पूरी तरह अभ्यास हो जाने के उपरांत , फिर से 'स्ट्रीमयार्ड' पर 'लाइव' आकर अपने आपको निपुण संचालक  सिद्ध कर दें। 

(अभी बस इतना ही)https://streamyard.com/p59dyxb84x

बुधवार, 19 जुलाई 2023

परेशान निगाहें-- कविता

 परेशान निगाहें आखिर ढूंढ रही किसको,

अंतर्मन से दिल ने चाहा बस उसी को।

 प्यार मोहब्बत सिर्फ जुमला ही नहीं है,

 बात सच ही कही है जिसने भी कही है।

देखा था उसको हमने बस एक नजर ही तो,

बेताब हैं दीदार को उसके उसे खबर कर दो। 

इतनी भी क्यों बेरुखी हमसे हमें बता दो,

 सजा दे दो हमको गर हमारी कोई खता हो।

तमन्ना तो यही कि उसकी बाहों में आसरा मिल जाए,

 फिर तो बस डूबते को तिनके का सहारा मिल जाए। 

सुनकर फरियाद हमारी गर जवाब आ जाए,

तो इस उजड़े गुलशन में फिर से बहार आ जाए। 

मन मयूरा -- कविता

 राह निहारे थक गई अखियां

 बात बनावे सखी सहेलियां

मेरा आंगन सूना लागे,

 कुछ भी अब तो नहीं सुहावे।

 जो तू लिख दे बस इक पाती,

 चांदनी मन मा भर भर जाती।

 चांद को जैसे देखे चकोरा,

  मन मोरा नाचे जैसे मयूरा।



Kalkkj

सोमवार, 10 जुलाई 2023

सुख के सब साथी -- कविता

 यह भी एक अजब पहेली है,

 सुख आता नहीं दुख जाता नहीं।

 जो चाहते हैं वह मिलता नहीं,

जो मिलता है  वह भाता नहीं। 

 जो ना हो सके रूहानी है, 

जो न बन सके वह कहानी है। 

जिंदगी है कभी कष्टों भरा  सफर,

 और कभी जिंदगी सुहानी है। 

सुख-दुख के इस सफर में,

सुख के सब साथी हुए।

 दुख में चलता चले अकेला,

 सुख में सब बाराती हुए। 

जिंदगी सुनसान सा सफर नहीं, 

   समझो जिंदगी एक मेला है। 

 इस मेले में कोई मौत का कुआं,

  तो कोई बन गया झूला है।

मंगलवार, 4 जुलाई 2023

दो लफ़्ज़ों में-' कविता

 ऐसे कैसे "दो लफ्जों" में बयां कर दे कोई अपनी कहानी, 

 जबकि झंझावातों गुजरते  गुजारी हो अपनी जवानी। 

 वह गुजारिश करता रहा कहता  रहा तुम्हारी राह निहारूंगा,

 उसने बस दो लफ्जो में दो टूक कह दिया "नहीं आऊंगा"। 

  बहुत कहा कि तुम ऐसा करो नहीं तो मैं मर जाऊँगा,

    बड़ा ही निष्ठुर था कह दिया कि "नहीं करूंगा"। 

  बड़ी शिद्दत से समझाया ऐसा करो न हो मगरूर,

  बड़ा ही शरीफ था दो लफ्जो में कह दिया "जी जरूर"। 

सच्चे आशिक ने प्यार का इजहार किया और पूछा "एंड यू"

 उसका प्यार भी सच्चा था और कह दिया "आइ टू"। 


Mssa/ dainik

शनिवार, 1 जुलाई 2023

राज ए मोहब्बत-- कविता

 राज ए मोहब्बत को राज ही रहने दो,

 दुनिया चाहे कुछ भी कहे, कहने दो।

दिल कुछ कहे ना कहे , छोड़ो भी ,

मोहब्बत आंखों से ही कर लेने दो।

 क्या होती है मोहब्बत हमें तो पता नहीं,

 कहां मिलती है यह उसका पता नहीं ।

कब होती है ,कैसे होती है यह भी पता नहीं।

 किसे होती है किसे नहीं यह भी पता नहीं। 

  कहते हैं कि मोहब्बत खुद चली आती है,

  इसे कोई करता नहीं, बस हो जाती है।

  किसी से बेशर्म होकर लिपट जाती है 

  लेकिन  किसी से कुछ-कुछ शर्माती है।

  हम तो बड़े बेपरवाह हैं इस जमाने में ,

 हमें तो नहीं उलझना किसी भी फसाने में।

 हम जैसे संगदिल भी हैं यहां पर, 

मोहब्बत को मजा आएगा इन्हें हराने में।