माटी कहे कुम्हार से,
तू ही है सच्चा कलाकार।
जो भी जैसा चाहता,
देता मेरे तन को आकर।
यूं तो कहते हैं दुनियाँ के लोग,
कि माटी का क्या है मोल,
एक पलड़े में रख दो कुछ भी,
दूसरे में माटी से न तोल।
अच्छे- अच्छों की नकली इज़्ज़त,
मिट्टी में ही मिल जाती है।
दम्भ करें कितना भी अपनी काया पर,
लेकिन एक दिन मिट्टी में ही दफन हो जाती है।
सुन ले ऐ मेरे मालिक
मेरी भावनाओं को समझ ।
मुझे विभिन्न रूपों में ढाल दे,
इस दुनियाँ के फरेबी इंसान को,
मेरी एक मिसाल दे।