बुधवार, 23 अक्टूबर 2024

दुल्हन सी भोर - कविता

 नई नवेली दुल्हन सी भोर जब धरा पर उतर आती है,

 पीत‌ चुनर ओढ़ आती जब ,बहुत मन को भाती है।

नया उल्लास नई कामना जगाती धरा की सखियों में,

 लगता है जैसे सुरमा लगा जती है हमारी अंखियों में।

क्यों न करें हम स्वागत ऐसी नई नवेली दुल्हन का,

 जो सदा ही करे नाश हमारी कल की उलझन का।

 यूं ही नहीं हमें यह भोर सुहानी लगती है,

 हर दिन यही तो एक नई कहानी गढ़ती है।

Vhssm 

शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2024

हर शब्द में सूरत तेरी नज़र आये - कविता

 जिधर देखता हूं बस तू ही नजर आए,

 इस जहां से और कहीं से कोई खबर ना आए। 

तेरी उलझी जुल्फें जब संवर संवर जाए, 

 तेरा खुला मस्त मस्तक ही नजर आए।

देखूं जब तेरी बालियों को लगे ध्वनि यंत्र,

लगता है जैसे फूंक दिया हो वशीकरण मंत्र।

यह जो पहना है सुंदर सा हार मन को लुभाये,

 लेकिन मुझे तो तेरी सुराही सी गर्दन ही भाये।

और जो पहिना है हरी चूड़ियों संग स्वर्णिम कंगन,

लगता है इन्हीं हाथों से करोगी मेरा आलिंगन।

तू अपने होठों से मेरा नाम ले या गीत गुनगुनाए,

मुझे तो बस हर शब्द में सूरत तेरी नज़र आए।


Mssa


बुधवार, 16 अक्टूबर 2024

धरती और आसमान - कविता

 धरती की गहराई को मैं नाप नहीं सकता,

 आसमान की ऊंचाई को मैं भांप नहीं सकता।

 चाहता तो बहुत हूं लेकिन क्या करूं,

  समंदर की चौड़ाई को में लांघ नहीं सकता।

 बन करके भंवरा यहां से वहां डोलता हूं मैं,

 कभी इस कली को कभी उस कली को चूमता हूं मै।

 सच तो यह है कि नहीं मिलता कोई भी ठिकाना,

 यहां से वहां तक बस अपनी पसंद को ढूंढता हूं मैं।

न मिलता किसी जंगल में किसी मकान में,

 ढूंढता फिर रहा मैं उसे सारे जहान में। 

 थक गया हूं इस धरा पर उसे ढूंढते हुए,

 पाने को उसे दिल चाहे उड़ना‌ आसमान में।

बुधवार, 9 अक्टूबर 2024

मेरी हिंदी भाषा -- कविता

 तन हिंद का, मन हिंद का, करेंगे कुछ मनमानी,

 हिंदी को सर्वव्यापी करने की हमने है ठानी।

जन-जन के बोले जाने की भाषा है हिंदी,

हर दिल के भावों की आशा है हिंदी।

हम हिंद के वासी, हमें इस पर अभिमान है,

 भाषा की बात करें तो हिंदी हमारा मान है।

बोलें हिंदी,सोचें हिंदी ,मन में बसी बस हिंदी है,

 ज्यों स्त्री के मस्तक का सौंदर्य उसकी बिंदी है।

यही तो वह भाषा है जो सबसे ज्यादा समृद्ध है,

 यही तो वह भाषा है जो सबसे ज्यादा प्रसिद्ध है।

इस देश के हर कोने में यही तो बोली जाती है,

इस बोली में लगता जैसे मिश्री घोली जाती है। 

देश हो या विदेश हिंदी में अपनत्व झलकता है ,

 कितना भी अनजान हो, हमें अपना समझता है।

अपनी हिंदी भाषा पर मैं क्यों न अभिमान करुं,

पूरे देश की यह भाषा हो, क्यों न यह अभियान करुं।

*स्वरचित एवं मौलिक- सतीश गुप्ता पोरवाल, जयपुर।*