बुधवार, 9 अक्टूबर 2024

मेरी हिंदी भाषा -- कविता

 तन हिंद का, मन हिंद का, करेंगे कुछ मनमानी,

 हिंदी को सर्वव्यापी करने की हमने है ठानी।

जन-जन के बोले जाने की भाषा है हिंदी,

हर दिल के भावों की आशा है हिंदी।

हम हिंद के वासी, हमें इस पर अभिमान है,

 भाषा की बात करें तो हिंदी हमारा मान है।

बोलें हिंदी,सोचें हिंदी ,मन में बसी बस हिंदी है,

 ज्यों स्त्री के मस्तक का सौंदर्य उसकी बिंदी है।

यही तो वह भाषा है जो सबसे ज्यादा समृद्ध है,

 यही तो वह भाषा है जो सबसे ज्यादा प्रसिद्ध है।

इस देश के हर कोने में यही तो बोली जाती है,

इस बोली में लगता जैसे मिश्री घोली जाती है। 

देश हो या विदेश हिंदी में अपनत्व झलकता है ,

 कितना भी अनजान हो, हमें अपना समझता है।

अपनी हिंदी भाषा पर मैं क्यों न अभिमान करुं,

पूरे देश की यह भाषा हो, क्यों न यह अभियान करुं।

*स्वरचित एवं मौलिक- सतीश गुप्ता पोरवाल, जयपुर।*

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें