गुरुवार, 23 जनवरी 2025

अरे ओ मेघ -- कविता

 अरे ओ रे मेघ,तू इतना क्यों इतराता है,

 कभी आता है,कभी जाता है,कभी छाता है।

क्या तुझको नहीं है बिल्कुल भी खबर,

यहां जो है सूखा तुझे आता नहीं नजर।

बड़ा नटखट है तू , बड़ा चंचल है,

 तू ही जाने शुष्क है या सजल है।

कभी गौर वर्ण है कभी सांवली सूरत है,

 कभी बेढंगा सा कभी ढली हुई मूरत है।

तरस खाकर जो तू थोड़ा पिघल जाए,

 तो निराशा की पीड़ा थोड़ी सहल जाए।

कभी कोई देखता है चातक बनकर,

 दो बूंद तो मिल जाए ऐसी आशा भरकर।

कभी तो तेरा दिल इतना पिघल जाता है,

खूब गरज-गरज कर,खूब बरस जाता है।

न आव देखता है और न ताव देखता है,

बरसते समय अपनी आंखें बंद कर लेता है।

जिस मकान में हवा का बहाव होना चाहिए, 

नहीं ऐसा,जैसा देखा,जल भराव होना चाहिए।

हे इंद्रदेव,अपने पास एक तराजू तो रखो,

ताकि जहां जितना चाहिए, तोल कर बरसो।

तब न कहीं बाढ़ आएगी और न कहीं सूखा होगा, 

तब न कोई ज्यादा खाएगा और न कोई भूखा होगा।


मंगलवार, 21 जनवरी 2025

कूटने का सुकून -- हास्य-व्यंग्य

 कूटने का सिलसिला तो आदिकाल से चला आ रहा है।देवताओं ने दानवों को खूब कूटा , फिर उनके ज़ख्मों के इलाज के लिए वैद्यों ने जड़ी बूटियों को कूटा।अनाज कूटा जाता है, दालों को कूटा जाता है। एक उनको देखो- स्वामी रामदेव टीवी पर जड़ी बूटियां को कूटते हुए कहते हैं कि बिना कूटे प्रभाव कम और कूटने पर प्रभाव ज्यादा होता है। सही कहा। बचपन में मां-बाप कहते थे खाना खा ले , थोड़ी भी देर की तो बस हो गई कुटाई और फिर कुटाई के प्रभाव से खाना शुरू। आजकल‌ की तरह नहीं कि मां-बाप कहते हैं- ले ले, ले ले बेटा और जब तक न खाए खुशामद करते रहेंगे। हम तो घर पर मां-बाप से कुटते थे और स्कूल में मास्टर जी से। कूटने वाला खुश और कुटने वाला बेचारा, क्या बताएं। घर में स्त्रियों को देखते हैं कि धान, दाल चावल, मसालों को कूटती हैं लेकिन कूटने के बाद को कोई सुकून नहीं मिलता,।और तो और, थकी हुई लगती हैं । 

बचपन में कुटते रहने के बाद हमने भी सोच लिया था कि बड़े हो जाएं, थोड़े दम-खम हो जाएं तो बदला जरूर लेंगे। जब हमें लगा कि अब हम 'लायक' हो गए हैं तो फिर मौका ढूंढने लगे और फिर कुटाई का सिलसिला चालू हो गया।

 आपको एक बार का कुटाई का किस्सा सुना देते हैं।हम कहीं जा रहे थे। रास्ते में हमने देखा कि तीन-चार लोग किसी एक को पड़कर झिंझोड़ रहे थे। बस हमने आव देखा न ताव, अंदर घुसे और दे दनादन,दें दनादन।   वहां खड़े सब लोग हमको हैरत से देख‌ रहे थे। जमकर कुटाई करके ऐसा लगा जैसे हमने कोई युद्ध जीत लिया हो। ‌तभी पीछे से उनमें से एक आदमी ने आकर कहा कि तुमने उसको क्यों कूटा ? वह बेचारा तो चलते-चलते गिर गया था, हम उसको उठा रहे थे। खैर हमें उससे क्या और क्या मतलब। हमें तो कुटाई करनी थी और कुटाई करने से थोड़ी ठंडक दिमाग को और और थोड़ी दिल को मिल चुकी थी। जब भी ऐसा मौका मिलता हम अंदर घुस जाते और किसी को भी कूट देते ।

सच में इतना मजा और किसी काम में नहीं ।


Lrks

रविवार, 12 जनवरी 2025

यादें उनकी - कविता

 उनकी यादों से कहो मुझे छोड़कर न जाएं ,

किसी भी हाल में मुख मोड़कर न जाएं।

उनकी यादों का ही तो अब मुझे सहारा है ,

जिनकी यादें साथ हों लगता वही हमारा है।

 क्या बताऊं यादें उनकी होती हैं इतनी खूबसूरत,

आंखें बंद करूं तो नजर आती है उनकी मूरत।

ये ही यादें उनकी, कानों में गीत गुनगुनाती हैं,

 रातें तो बेचैन हों मगर दिन को तो बनाती हैं।

जब भी खो जाता हूं मैं यादों में उनकी,

याद आता है चुलबुलापन बातों में उनकी।

वो यदि आएं तो ठीक और न आयें तो जाने दो,

पर न रोको इनको, यादों की उनकी तो आने दो।


Mssa/ video 

शुक्रवार, 10 जनवरी 2025

यूं ही कट जाएगा सफर -- गीत

 कोई भी बाधा हो,कर देंगे नाकाम 

मंजिल तक जाना है, करेंगे अपना नाम 

आगे कदम बढ़ायेंगे,बस चलते ही जायेंगे 

यूं ही कट जायेगा ---

हौसला हो जब मन में मुश्किल हो आसान,

 काम करेंगे कुछ ऐसा जग में हो जाये नाम 

नहीं किसी से डरना है, नहीं राह में रुकना है 

यूं ही कट जायेगा ---


लेखनी रचना / L c a