मंगलवार, 21 जनवरी 2025

कूटने का सुकून -- हास्य-व्यंग्य

 कूटने का सिलसिला तो आदिकाल से चला आ रहा है।देवताओं ने दानवों को खूब कूटा , फिर उनके ज़ख्मों के इलाज के लिए वैद्यों ने जड़ी बूटियों को कूटा।अनाज कूटा जाता है, दालों को कूटा जाता है। एक उनको देखो- स्वामी रामदेव टीवी पर जड़ी बूटियां को कूटते हुए कहते हैं कि बिना कूटे प्रभाव कम और कूटने पर प्रभाव ज्यादा होता है। सही कहा। बचपन में मां-बाप कहते थे खाना खा ले , थोड़ी भी देर की तो बस हो गई कुटाई और फिर कुटाई के प्रभाव से खाना शुरू। आजकल‌ की तरह नहीं कि मां-बाप कहते हैं- ले ले, ले ले बेटा और जब तक न खाए खुशामद करते रहेंगे। हम तो घर पर मां-बाप से कुटते थे और स्कूल में मास्टर जी से। कूटने वाला खुश और कुटने वाला बेचारा, क्या बताएं। घर में स्त्रियों को देखते हैं कि धान, दाल चावल, मसालों को कूटती हैं लेकिन कूटने के बाद को कोई सुकून नहीं मिलता,।और तो और, थकी हुई लगती हैं । 

बचपन में कुटते रहने के बाद हमने भी सोच लिया था कि बड़े हो जाएं, थोड़े दम-खम हो जाएं तो बदला जरूर लेंगे। जब हमें लगा कि अब हम 'लायक' हो गए हैं तो फिर मौका ढूंढने लगे और फिर कुटाई का सिलसिला चालू हो गया।

 आपको एक बार का कुटाई का किस्सा सुना देते हैं।हम कहीं जा रहे थे। रास्ते में हमने देखा कि तीन-चार लोग किसी एक को पड़कर झिंझोड़ रहे थे। बस हमने आव देखा न ताव, अंदर घुसे और दे दनादन,दें दनादन।   वहां खड़े सब लोग हमको हैरत से देख‌ रहे थे। जमकर कुटाई करके ऐसा लगा जैसे हमने कोई युद्ध जीत लिया हो। ‌तभी पीछे से उनमें से एक आदमी ने आकर कहा कि तुमने उसको क्यों कूटा ? वह बेचारा तो चलते-चलते गिर गया था, हम उसको उठा रहे थे। खैर हमें उससे क्या और क्या मतलब। हमें तो कुटाई करनी थी और कुटाई करने से थोड़ी ठंडक दिमाग को और और थोड़ी दिल को मिल चुकी थी। जब भी ऐसा मौका मिलता हम अंदर घुस जाते और किसी को भी कूट देते ।

सच में इतना मजा और किसी काम में नहीं ।


Lrks

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