विवाह संस्कार - - -एक चर्चा
विवाह समारोह किसी के भी जीवन काल का एकमात्र और सबसे बड़ा समारोह होता है।लड़कों के मन में होता है कि --"जब मैं दूल्हा बनूँगा - - - - ", लड़की के मन में होता है कि --"जब मैं दुल्हन बनूँगी - - - -",और माता-पिता के मन में होता है कि --"जब हमारा बेटा दूल्हा बनेगा /बेटी दुल्हन बनेगी - - -",अतः सब अपनी "हूंस "(मन की गहराई से इच्छा )पूरी करने के लिये, इसे एक यादगार / भव्य समारोह बनाने की चाहत में, बेहद खर्चीला ,आडम्बर युक्त एवं थका देने वाला ("ऋण लेकर घी पीने वाला भी" ) समारोह बना डालते हैं। यह सही है कि इस समारोह कि अवधि घट कर दो दिन हो गई है ,किन्तु क्या इसी अनुपात में होने वाले आयोजनों की संख्या घटी है ?पुराने रीति -रिवाज / कारण घटे कम हैं और नये बढे ज्यादा हैं. सगाई,भात आदि में मिलने वाले कपड़ों से लोग संतुष्ट कम, असंतुष्ट ज्यादा होते हैं.अपने मोहल्ले /शहर से बाहर शोभा यात्रा के हम, स्वयं ही,दर्शक होते हैं। दुल्हन ब्यूटी -पार्लर में अपनी बारी का इंतजार करती है और दूल्हा "दरवाजे "पर दुल्हन का। भोजन में इतनी "वैरायटी" रहती है कि सब खायें तो पेट ख़राब,न खायें तो, मन में मलाल।कम समय में अधिक आयोजन होने से "समय -सारिणी "गड़बड़ा जाती है ,हम जाते हैं "अगले "कार्यक्रम के लिये ,मालूम हुआ अभी "पिछला" ही चल रहा है।
समय के साथ ,यह महसूस किया जा रहा है कि विवाह का एक ऐसा प्रारूप तैयार किया जाये ,जिससे समारोह शालीन / संक्षिप्त हो जाये,व्यय भी सीमित हो और मन की इच्छा भी कुछ हद तक पूरी हो जाये।इस विषय पर समाज के सभी तबके --वे युवा जो दूल्हा बनने की क़तर में हैं ,उनके माता-पिता ,एवं समाज के सभी प्रबुद्धजन-- सोच -विचार / चिंतन करें कि, इस सन्दर्भ में क्या परिवर्तन किये जा सकते हैं, एवं आपके सुझाव अवश्य दें। हो सकता है ,इन सुझावों के आधार पर ,विवाह समारोह का एक ऐसा आदर्श प्रारूप ( मॉडल ) तैयार हो जाये ,जिसकी स्वीकार्यता ,अधिकतम हो।
विवाह समारोह किसी के भी जीवन काल का एकमात्र और सबसे बड़ा समारोह होता है।लड़कों के मन में होता है कि --"जब मैं दूल्हा बनूँगा - - - - ", लड़की के मन में होता है कि --"जब मैं दुल्हन बनूँगी - - - -",और माता-पिता के मन में होता है कि --"जब हमारा बेटा दूल्हा बनेगा /बेटी दुल्हन बनेगी - - -",अतः सब अपनी "हूंस "(मन की गहराई से इच्छा )पूरी करने के लिये, इसे एक यादगार / भव्य समारोह बनाने की चाहत में, बेहद खर्चीला ,आडम्बर युक्त एवं थका देने वाला ("ऋण लेकर घी पीने वाला भी" ) समारोह बना डालते हैं। यह सही है कि इस समारोह कि अवधि घट कर दो दिन हो गई है ,किन्तु क्या इसी अनुपात में होने वाले आयोजनों की संख्या घटी है ?पुराने रीति -रिवाज / कारण घटे कम हैं और नये बढे ज्यादा हैं. सगाई,भात आदि में मिलने वाले कपड़ों से लोग संतुष्ट कम, असंतुष्ट ज्यादा होते हैं.अपने मोहल्ले /शहर से बाहर शोभा यात्रा के हम, स्वयं ही,दर्शक होते हैं। दुल्हन ब्यूटी -पार्लर में अपनी बारी का इंतजार करती है और दूल्हा "दरवाजे "पर दुल्हन का। भोजन में इतनी "वैरायटी" रहती है कि सब खायें तो पेट ख़राब,न खायें तो, मन में मलाल।कम समय में अधिक आयोजन होने से "समय -सारिणी "गड़बड़ा जाती है ,हम जाते हैं "अगले "कार्यक्रम के लिये ,मालूम हुआ अभी "पिछला" ही चल रहा है।
समय के साथ ,यह महसूस किया जा रहा है कि विवाह का एक ऐसा प्रारूप तैयार किया जाये ,जिससे समारोह शालीन / संक्षिप्त हो जाये,व्यय भी सीमित हो और मन की इच्छा भी कुछ हद तक पूरी हो जाये।इस विषय पर समाज के सभी तबके --वे युवा जो दूल्हा बनने की क़तर में हैं ,उनके माता-पिता ,एवं समाज के सभी प्रबुद्धजन-- सोच -विचार / चिंतन करें कि, इस सन्दर्भ में क्या परिवर्तन किये जा सकते हैं, एवं आपके सुझाव अवश्य दें। हो सकता है ,इन सुझावों के आधार पर ,विवाह समारोह का एक ऐसा आदर्श प्रारूप ( मॉडल ) तैयार हो जाये ,जिसकी स्वीकार्यता ,अधिकतम हो।