बुधवार, 16 जुलाई 2014

                                           विवाह संस्कार -  - -एक चर्चा
   
      विवाह समारोह किसी के भी जीवन काल का एकमात्र और सबसे बड़ा समारोह होता है।लड़कों के मन में होता है कि --"जब मैं दूल्हा बनूँगा  - - - - ", लड़की के मन में होता है कि --"जब मैं दुल्हन बनूँगी -  - - -",और माता-पिता के मन में होता है कि --"जब हमारा बेटा दूल्हा बनेगा /बेटी दुल्हन बनेगी -  - -",अतः सब  अपनी "हूंस "(मन की गहराई से इच्छा )पूरी करने के लिये, इसे एक यादगार / भव्य समारोह बनाने की चाहत में, बेहद खर्चीला ,आडम्बर युक्त एवं थका देने वाला ("ऋण लेकर घी पीने वाला भी" ) समारोह बना डालते हैं। यह सही है कि इस समारोह कि अवधि घट कर दो दिन हो गई है ,किन्तु क्या इसी अनुपात में होने वाले आयोजनों की संख्या घटी है ?पुराने रीति -रिवाज  / कारण घटे कम हैं और नये बढे ज्यादा हैं. सगाई,भात आदि में मिलने वाले कपड़ों से लोग संतुष्ट कम, असंतुष्ट ज्यादा होते हैं.अपने मोहल्ले /शहर से बाहर शोभा यात्रा के हम, स्वयं ही,दर्शक होते हैं। दुल्हन ब्यूटी -पार्लर में अपनी बारी का इंतजार करती है और दूल्हा "दरवाजे "पर दुल्हन का। भोजन में इतनी "वैरायटी" रहती है कि सब खायें तो पेट ख़राब,न खायें  तो, मन में मलाल।कम समय में अधिक आयोजन होने से "समय -सारिणी "गड़बड़ा जाती है ,हम जाते हैं "अगले "कार्यक्रम के लिये ,मालूम हुआ अभी "पिछला" ही चल रहा है।
       समय के साथ ,यह महसूस किया जा रहा है कि विवाह का एक ऐसा प्रारूप तैयार किया जाये ,जिससे समारोह शालीन / संक्षिप्त हो जाये,व्यय भी सीमित हो  और मन की इच्छा भी कुछ हद तक पूरी हो जाये।इस विषय पर समाज के सभी तबके --वे युवा जो दूल्हा बनने की क़तर में हैं ,उनके माता-पिता ,एवं समाज के सभी प्रबुद्धजन-- सोच -विचार  / चिंतन करें कि, इस सन्दर्भ में क्या परिवर्तन किये जा सकते हैं, एवं आपके सुझाव अवश्य दें। हो सकता है ,इन सुझावों के आधार पर ,विवाह समारोह का एक ऐसा आदर्श प्रारूप ( मॉडल ) तैयार हो जाये ,जिसकी स्वीकार्यता ,अधिकतम हो।  

                                                                                                                      

सोमवार, 30 जून 2014

प्याज - - - -प्याज - - - -प्याज - - --

प्याज  - - - -प्याज  - - - -प्याज  - - --
  प्याज ,प्याज ना हुआ ,कोई बड़ा आतंकवादी हो गया।सारे देश में प्याज का आतंक फैला हुआ है। जनता त्रस्त है ,सरकारें पस्त हैं ,प्याज कारोबारी मस्त है और मीडिया व्यस्त  है। बड़े -बड़े मंत्री ,सारे राजनीतिक दलों के नेता प्याज के बढ़ते दामों से चिंतित हैं। इतनी चिंता तो हमने इनके चेहरों पर कभी नहीं देखी। नक्सली समस्या ,इराक से भारतीयों को सुरक्षित निकाल लाना,रेल दुर्घटना में कमी लाना ,बाढ़ से होते नुकसान को रोकना ,बांध से लापरवाही से पानी छोड़ने से रोक कर जान-माल की हानि रोकना,जनता को शुद्ध हवा पानी और भोजन कैसे मिले ,इसकी व्यवस्था करना  ,छात्रों को नए सत्र में कोई परेशानी न हो-यह सुनिश्चित करना ,आदि --आदि --आदि ;  ये समस्याएं तो कोई समस्या नहीं है -जब चाहेंगे चुटकी में सुलझा लेंगे ,लेकिन अभी तो भरी भरकम "प्याज"की समस्या से निपटना है।
    भारत की जनता भी बेचारी क्या करे --यदि एक सप्ताह भी प्याज नहीं खाया तो ,बहुत बड़ा अनर्थ हो जावेगा। उनकी मान -मर्यादा मिट्टी में मिल जाएगी ,पाचन -शक्ति बिगड़ जाएगी ,शरीर दुबला -पतला हो जायेगा,कई बीमारियां घर कर जाएँगी। संक्षिप्त में कहें तो यह -की यदि एक सप्ताह भी प्याज नहीं खाया तो 'भूचाल आ जायेगा।         देखिये तो सही ,प्याज को एक बार अपने हाल पर छोड़ कर ,देखिये तो सही। 

रविवार, 15 जून 2014

काश मैं भी "सेलिब्रेटी" होता

 १) काश मैं भी "सेलिब्रेटी" होता(पुरुष ) - - - -- -
 यदि ऐसा होता तो ,मेरा भी नंबर कुछ तो होता --इंडिया के पापा नंबर १ ,२ ,३,४ ------९९ ,१०० -- -। सर्वे कम्पनीज(शादी.कॉम )  की निगाह में तो सेलिब्रेटीज ही सब कुछ होते हैं।इसीलिए तो इंडिया के,  शाहरुख़ खान -पापा नंबर १ ,सचिन तेंदुलकर-पापा नंबर २ और अमिताभ बच्चन -पापा नंबर ३
२) काश मैं भी "सेलिब्रेटी" होता (स्त्री ) -  - - --
 यदि ऐसा होता तो, मुझे कभी भी प्रेमी बदलने की छूट होती,यदि नहीं भी बदलता तो बरसों तक एक ही प्रेमी से आँखें  मिलाता रहता ,और यदि कभी वह आँखें दिखाता, तो तुरंत थाने में रपट दर्ज करवा देता।पुलिस भी सक्रिय हो जाती और महिला आयोग भी। मीडिया में भी छा जाता। 

सोमवार, 9 जून 2014

मेरा कसूर क्या है

मैं तो गया था ,आंध्रा से ,हिमाचल के खूबसूरत नज़ारे देखने ,अपने मित्रों के साथ। मुझे नहीं मालूम था कि इन खूबसूरत नजारों को केमरे में उतारने का समय ही मेरा आखिरी समय हो जावेगा।
    ऐसा पहली बार नहीं हुआ है ,अनेकों बार हो चुका है।कभी पुल पार करते समय ,कभी नदी के पेटे में पिकनिक मनाते समय अचानक पानी का सैलाब आया ,और कई  उसके साथ बह कर ,काल में समा गए ।
यदि बरसात की वजह से बाढ़ आ जाये ,तो इसे ईश्वरीय प्रकोप मान  कर स्वीकार किया जा सकता है ,किन्तु यदि मानवीय कारण से ऐसा होता है ,तो इसे माफ़ नहीं किया जा सकता। मालूम नहीं अब तक ऐसा क्यों होता आया है। ऐसी क्या मजबूरी थी, कि बांध से ६ से ७ फुट पानी एक साथ छोड़ा गया।क्या कोई आफत आ गई थी या गिन्नीज़ बुक में नाम दर्ज करवाना था। इस कंप्यूटर युग में क्या ऐसा नहीं हो सकता कि १ -१ फुट पानी १ या २ घंटे के अंतराल में छोड़ा जाये। क्या मंत्री से लेकर इंजीनियर तक ,किसी के पास ऐसा कोई हल नहीं है।
इंजीनियर बनते बनते मैं आत्मा हो गया हूँ।  इस आत्मा की आवाज क्या कोई सुनेगा।