अचेतन है मन मानव का
समय की दौड़ में ,
कोई छू रहा गगन को
कोई जा रहा गर्त को ।
नित नवनिर्मित आशाएं और
मन की सरल भी उत्कंठा,
पूर्ण हुई क्या सबकी
केवल भ्रांति रही मन की ।
अचेतन है मन मानव का
ढूंढता है चेतना वह ,
ज्ञान का एक दिया लिए
गगन में औ धरा में
ढूंढ सकेगा क्या मानव इसको
अब है ईश्वर अधिक न तरसा ,
मानव के इस अचेतन मन को
चेतना दे दो ।
समय की दौड़ में ,
कोई छू रहा गगन को
कोई जा रहा गर्त को ।
नित नवनिर्मित आशाएं और
मन की सरल भी उत्कंठा,
पूर्ण हुई क्या सबकी
केवल भ्रांति रही मन की ।
अचेतन है मन मानव का
ढूंढता है चेतना वह ,
ज्ञान का एक दिया लिए
गगन में औ धरा में
ढूंढ सकेगा क्या मानव इसको
अब है ईश्वर अधिक न तरसा ,
मानव के इस अचेतन मन को
चेतना दे दो ।