*धर्म की धारणा एवं धर्म का आवरण क्या है।*
धर्म के बारे में चर्चा करने के लिए हमें शीर्षक को दो भागों में विभाजित करके चलना चाहिए
1) धर्म की धारणा एवं
2) धर्म का आवरण।
हमें यह देखना है कि आखिर धर्म क्या है ? हम क्यों ईश्वर /देवी /देवताओं की पूजा करते हैं? इसलिए नहीं कि हम उनसे कुछ मांगे और वे हमें वह सब दें। हमें उनकी पूजा इसलिए करनी चाहिए कि वे धर्म के रास्ते पर चले अर्थात मानव मात्र के कल्याण के लिए जैसा आचरण करना चाहिए वैसे किया। स्वयं स्वार्थी न बनते हुए, सामने वालों के कल्याण के बारे में सोचा। वे सब हमारे लिए आदर्श हैं और उनको सम्मान देने के लिए हम उनकी पूजा करते हैं, इसी को ही धर्म मान लिया गया।
दूसरे भाग में हम देखते हैं की लोग धर्म के नाम पर आडंबर करते हैं। अर्थात उन्होंने धर्म का आवरण ओढ़ा हुआ है,वे सिर्फ दिखावा करते हैं। भजन कीर्तन एवं नाना प्रकार के धार्मिक आयोजन /अनुष्ठान करते हैं। ऐसे ही लोगों के व्यक्तिगत व्यवहार को देखा जाए तो मालूम होगा कि परिवार में ही वैमनस्य फैला हुआ है।एक दूसरे से स्पर्धा करते हैं ,नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं। स्वयं आगे बढ़ना चाहते हैं और दूसरे को पीछे रखना चाहते हैं। ऐसे लोग धर्म का आवरण धारण करके रहते हैं।
यदि हम धार्मिक हैं ,धर्म पर चलना चाहते हैं तो हमें अपने से अधिक अन्य की परवाह करनी चाहिए। हम भी सुखी रहें और अन्य सभी भी सुखी रहें, ऐसे प्रयास करने चाहिए। यही सच्चा धर्म होगा। हम भी वैसा ही व्यवहार करें जैसा हमारे आदर्श ईश्वर या महापुरुष करते रहे हैं।