बुधवार, 30 नवंबर 2022

धर्म की धारणा एवं आवरण -- आलेख

 *धर्म की धारणा एवं धर्म का आवरण क्या है।*

धर्म के बारे में चर्चा करने के लिए हमें शीर्षक को दो भागों में विभाजित करके चलना चाहिए

1) धर्म की धारणा एवं

 2) धर्म का आवरण।

  हमें यह देखना है कि आखिर धर्म क्या है ? हम क्यों ईश्वर /देवी /देवताओं की पूजा करते हैं? इसलिए नहीं कि हम उनसे कुछ मांगे और वे हमें वह सब दें। हमें उनकी पूजा इसलिए करनी चाहिए कि वे धर्म के रास्ते पर चले अर्थात मानव मात्र के कल्याण के लिए जैसा आचरण करना चाहिए वैसे किया। स्वयं स्वार्थी न बनते हुए, सामने वालों के कल्याण के बारे में सोचा। वे सब हमारे लिए आदर्श हैं और उनको सम्मान देने के लिए हम उनकी पूजा करते हैं, इसी को ही धर्म मान लिया गया।

  दूसरे भाग में हम देखते हैं की लोग धर्म के नाम पर आडंबर करते हैं। अर्थात उन्होंने धर्म का आवरण ओढ़ा हुआ है,वे सिर्फ दिखावा करते हैं। भजन कीर्तन एवं नाना प्रकार के धार्मिक आयोजन /अनुष्ठान करते हैं। ऐसे ही लोगों के व्यक्तिगत व्यवहार को देखा जाए तो मालूम होगा कि परिवार में ही वैमनस्य फैला हुआ है।एक दूसरे से स्पर्धा करते हैं ,नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं। स्वयं आगे बढ़ना चाहते हैं और दूसरे को पीछे रखना चाहते हैं। ऐसे लोग धर्म का आवरण धारण करके रहते हैं।

  यदि हम धार्मिक हैं ,धर्म पर चलना चाहते हैं तो हमें अपने से अधिक अन्य की परवाह करनी चाहिए। हम भी सुखी रहें और अन्य सभी भी सुखी रहें, ऐसे प्रयास करने चाहिए। यही सच्चा धर्म होगा। हम भी वैसा ही व्यवहार करें जैसा हमारे आदर्श ईश्वर या महापुरुष करते रहे हैं।

मंगलवार, 29 नवंबर 2022

टेलीविजन का प्रभाव - कहानी


#विधा : कहानी

सतीश गुप्ता पोरवाल, जयपुर। 


अच्छा भला परिवार था, सब अच्छे से समय गुजार रहे थे। लेकिन मोहित के घर टी वी आने के बाद माहौल बदलता जा रहा था। पत्नी कामिनी को सीरियल देखने का शौक था। लगभग सभी सीरियल में स्त्रियां साजिश करती हुई नजर आती हैं ,और ऐसी ही भावना कामिनी के अंदर घर करने लगी और परिवार का माहौल बिगड़ने लगा। मोहित अक्सर समाचार सुना करता था । सब जानते हैं कि समाचारों को बढ़ा चढ़ा कर बताया जाता है। अतः सरकार के प्रति उसके मन में दुर्भावना आने लगी। जब भी दोस्तों के साथ बैठता, सरकार की कमियां बताता रहता जिससे उसके दोस्त उससे दूर होते चले गए। बच्चे कौन से कम थे , जब-तब कार्टून फिल्में देखते और उनके जैसे ही संवाद करने लगते। टेलीविजन के बहुत पास बैठते । समय के साथ धीरे-धीरे उनकी नेत्र ज्योति कम होने लगी और इतनी कम उम्र में ही उनको चश्मे की आवश्यकता पड़ गई।

  घर का माहौल जिस तरह से बिगड़ता हुआ नजर आ रहा था मोहित का क्रोध टेलीविजन पर बढ़ता ही जा रहा था । वह समझ गया था कि टेलीविजन से निरर्थक सामग्री परोसी जा रही है और यही कारण है कि घर का माहौल कुछ से कुछ हो गया है। एक दिन उसे लगा कि अति हो चुकी है तो उसने टेलीविजन उठाया और जमीन पर दे मारा और घर पर सब को ताकीद कर दिया कि जब तक सब कुछ पहले जैसा नहीं हो जाता वह दोबारा टेलीविजन नहीं लेगा और लेगा तो सब पर कुछ अंकुश तो लगेगा ही।

मतभेद- लघुतम कथा

 सतीश गुप्ता पोरवाल ,जयपुर

#100 शब्दों की कहानी

# मतभेद

महेश के पिताजी के देहांत के बाद उनका खेत, एक सरकारी योजना के अंतर्गत सरकार ने अपने अधीन कर लिया और उसका मुआवजा महेश को दे दिया। महेश ने अपनी दो विवाहित बहिनों को,बंटवारे के अंतर्गत 30-30% हिस्सा दे दिया एवं स्वयं 40% रख लिया।दोनों बहिनों को यह नागवार गुजरा और नाराज रहने लगीं। भाई और बहिनों के बीच मतभेद उभर आए थे। महेश के चाचा ने उन दोनों बहिनों को समझाया कि देखो तुम दोनों बहिनों की शादी में पैसा महेश ने ही लगाया अतः उसका इतना तो हक बनता है। मतभेद दूर हो गये।

टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडियों से गुजरती जिंदगी - कविता

 टेढ़ी मेढी पगडंडियों से गुजरती जिंदगी,

 नाना प्रकार के सबक सिखाती जिंदगी।

 कोई सीधे-सीधे सफर में चला जा रहा है,

 कोई टेढ़े मेढ़े रास्तों से समेट रहा है जिंदगी।


 जब दुनिया में आ गए तो जीना तो है,

 अमृत या विष जो भी हो पीना तो है।

 समझने की कितनी भी कोशिश कर लें,

 पर समझ न आए यह जिंदगी।


 ठहरे भवसागर में नाव जैसी नजर आती है,

सीधे-सीधे चलती जाती है ज़िंदगी।

 कभी-कभी बिना पतवार के डोलती,   

 भंवर में फंसती नजर आती है जिंदगी।


नहीं समझ पाते आखिर क्या है यह जिंदगी,

 किसी को तो लगता है एक पहेली है। 

 समझ बूझ कर यदि समझ लिया तो, 

 सच कहता हूं यह एक सहेली है।


कभी धूप कभी छांव नजर आती है, 

 कभी श्वेत कभी स्याह नजर आती है जिंदगी,

 कोई नहीं जानता जिंदगी में,

 क्या क्या रंग दिखाती है जिंदगी।


किसी को स्याह-रात काली घटा नजर आती है जिंदगी,

 किसी को रंगीन खूबसूरत छटा नजर आती है जिंदगी। 

अब जो भी हो जैसे भी हो कुछ भी हो,

 मुझे ही नहीं सभी को जीनी है यह जिंदगी।

बंद आंख - बड़ा धोखा -- लघु कथा

 रोशन लाल जी मोहल्ले के बड़े आदमी थे । प्रकृति उनकी कुछ ऐसी थी कि जो उन्होंने सोच लिया और कह दिया वही सही है। मोहल्ले के निवासी भी उनकी बड़ी इज्जत करते थे और उनकी बात को आंख मूंद कर मानते थे।

  उन दिनों शहर में एक कॉलोनी में भूखंड बेचे जा रहे थे । रोशन लाल जी ने कॉलोनाइजर से तय किया कि वे अपने मोहल्ले वालों को बहुत सारे भूखंड बिकवा देंगे। कॉलोनाइजर ने उन्हें बदले में अच्छी राशि के भुगतान का वादा किया । जब मोहल्ले के ही एक समझदार निवासी ने तह में जाकर मालूम किया तो मालूम हुआ कि यह जमीन तो सरकार अपने अधीन लेने वाली है। उन्होंने अपने मोहल्ले के निवासियों को बहुत समझाया लेकिन कोई उनकी बात मानने को तैयार नहीं हुआ, उन सबको तो रोशन लाल जी पर पूरा भरोसा था। रोशन लाल जी की नजर उन्हें मिलने वाले धन पर थी , उनकी आंखों पर तो इस धन का चश्मा चढ़ा हुआ था। तो उन्होंने इस बात  पर कुछ ध्यान नहीं दिया। फल स्वरुप मोहल्ले वालों ने बहुत सारे भूखंड खरीद लिये।

 अगले वर्ष सरकार ने वह जमीन अपने अधीन कर ली और उसका मुआवजा किसान को दे दिया। किसान बड़ा धूर्त और स्वार्थी था ।उसने सारा धन अपने पास ही रख लिया और किसी को कुछ नहीं दिया। मोहल्ले के सारे निवासी ठगे जा चुके थे।

  कहते हैं ना किसी के ऊपर आंख बंद करके विश्वास नहीं करना चाहिए, वरना पछताना पड़ सकता है, और हुआ भी यही।

दिल के दर्द आंखों में- कविता


#विषय : दिल के दर्द आंखों में0

# दिनांक 29/11/ 2022

स्वरचित--

 सतीश गुप्ता पोरवाल 


गमों के जख्मों को कैसे नासूर बनने दें,

लगता है दिल की चादर को चूहे कुतर आए हैं।

 कितना ही संभाला हमने अपने आपको,

 लेकिन दिल के दर्द आंखों में उतर आए हैं।

 

 तुम्हें देखा तो सपने सुहाने होने लगे थे,

 नीरस से जीवन में जीने के बहाने मिले थे।

 रुकती हुई सांसों को जैसे जीवनदान मिला,

 उजड़े हुए गुलशन में फूल फिर से खिले थे।


 देखे थे हमने मिलकर ख्वाब महलों के,

 बेरुखी से तेरे अब खण्डहर बने हैं।

 जिन पत्थरों को हमने फूल सा समझा था,

  वे अब खाने को ठोकर दर-दर बने हैं।


 ख्वाबों की जो सरिता कल कल बहने लगी थी,

 सोचा था तैरती नय्या से हम उतरेंगे किनारे।

 सपने हमारे यूं ही चूर-चूर न होंगे,

 चमकेंगे नभ में बनकर के सितारे।


विरह वेदना से दिल तड़प रहा है,

 सूरज के गोले सा दिल दहक रहा है। 

 अब चाहे तो फिर से कर दे प्रणय निवेदन,

 दिल का दर्द आंखों में सिसक रहा है।

मां की महत्ता -- कविता


#विषय: माँ 

 स्वरचित --

 सतीश गुप्ता पोरवाल , जयपुर।


ममता मयी माँ की महान महत्ता,

 दिल में दया और दर्द की गहनता।

  जान लो जज्बात जन्म जननी के,

  मेरा मन माँ के मन में महकता।


 बताऊं क्या बड़ी बात बेबसी की,

 रात रात भर रोती जो जन्म पर हंसी थी।

  भूल गया बेटा बड़ा बनकर,

 परायो पर प्यार पर माँ के लिये कंजूसी थी।


 मैंने अनजाने में मुट्ठी में माँ की उंगली मांगी,

अनजाने में ही अपनी अंजलि में उंगली थामी।

मेरे लिए इस दुनियां में कोई नहीं ,

  माँ ही मेरा आसमां माँ ही मेरी जमीं।

सोमवार, 28 नवंबर 2022

जन्मदिन -- कविता

 #उड़ान 



स्वरचित--

 सतीश गुप्ता पोरवाल 


होता है जब तुम्हारा जन्मदिन ,

उमड़ पड़ती है मन में भावना।

 सदा खुश रहो अपने जीवन में,  

   हमारी यही है शुभकामना।


गम ना कभी आसपास रहे ,

हमेशा हंसता खिलखिलाता रहे।

 हर खुशी तुम्हारे साथ रहे,

 हमारा अपना कभी न उदास रहे।

चूडियां

 हर स्त्री की चाहत होती है यही,

 कि जिंदगी भर वह सुहागन ही रहे। 

 काल न आ जाए उसके जीवनसाथी पर कभी,

 जब भी मरे सुहागन ही मरे।


मांग में भर लेती है अपने सिंदूर,

 सजाती है भाल पर बिंदिया।

 हथेलियों पर लगाती है मेहंदी,

 और कलाई में पहनती है चूड़ियां।


 रंग बिरंगी चूड़ियां चमकती हैं कलाई  में,

 स्त्री का चेहरा खिल खिल जाता है। 

 सुहागन होने का उसे होता है गर्व,

  सारी दुनिया का सुख जैसे उसे मिल जाता है।

नया शहर बसाते हैं-- कविता

 पहाड़ों से महानता समंदर से गहनता,

  गुफाओं से शांति जंगल से हरियाली चुराते हैं,

 चलो इक नया शहर बसाते हैं।


 मानव में मानवता बच्चों में चपलता,

 बिखरे हुए उसूलों को जमाते हैं,

  चलो इक नया शहर बसाते हैं।


 स्त्रियों का  संवरना पुरुषों का उम्दा  पहनना,

 सभी मनुष्यों को सभ्य बनाते हैं, 

 चलो इक नया शहर बसाते हैं। 


रिश्तो को महत्ता संबंधों में मधुरता, 

 संसार एक ऐसा बसाते हैं।

 चलो इक नया शहर बसाते हैं।


सौहार्द की भावना उन्नति की कामना,

 समानता की भावना जगाते हैं,

  चलो इक नया शहर बसाते हैं।

नया कदम विश्वास के -- कविता

 राह में कांटे बहुत बिछाती है दुनिया,

  इन कांटो से बच कर तू आगे बढ़ना।

  लहू-लुहान न हो जाए कहीं पैर तेरे,

 बहुत सोच समझकर राह पर चलना।


 बाधाएं तो राह में आती ही हैं,

 इन बाधाओं से कभी न डरना।

 कभी जब हौसला होने लगे पस्त,

  तो अपने अंतर्मन की आवाज को सुनना। 


राहें तो अनेक हैं मंजिल पर पहुंचने को, 

पर सोच समझकर ही सही राह  चुनना। 

 मंजिल तो अवश्य ही मिल जाएगी तुझको,

 नये कदम विश्वास के रखकर तू आगे बढ़ना।

रविवार, 27 नवंबर 2022

मौन एक साधना- कविता

 मौन है सुखी जीवन का आधार,

 जग के कोलाहल से वंचित हो, 

 तपस्या जब की जाती है,

 तो शांति का मिलता है उपहार।


 हमारी तो है बस यही कामना, 

 जीवन गुजरे शांति से सबका ।

 यदि हो जाती है बहस कभी,

 तो समझो मौन एक साधना।


  सभी की प्रकृति को एक जैसा नहीं नापना,

 किसी का स्वभाव प्रश्न किसी का जवाब देने का,

 यदि प्रश्न है सही तो सही जवाब के लिए,

 नहीं पड़ेगा किसी का मुंह ताकना।


 निडर होकर करो सभी का सामना,

 स्वयं हावी होने का ना करें प्रयास।

 फिर भी यदि कोई आक्रामक हो,

 तो समझो मौन एक साधना।


सतीश गुप्ता पोरवाल, जयपुर।

इसका मायका-उसका मायका

 * इसका मायका-उसका मायका*

   एक मध्यमवर्गीय परिवार में दो बहूएं थीं।बड़ी बहू एक अच्छे धनी परिवार से थी जबकि छोटी बहू एक साधारण से गरीब परिवार से। परिवार में सभी लोग एक दूसरे से अच्छा व्यवहार करते थे। जैसा कि होता है आज भी  कुछ परिवारों में यह रिवाज है कि  कुछ  त्यौहारों पर उनके मायके से कुछ ना कुछ- मिठाईयां/कपड़े के रूप में- आते हैं।ऐसे ही एक त्यौहार पर छोटी बहू को मालूम हुआ कि बड़ी बहू के मायके से 40 किलो लड्डू आ रहे हैं , तो छोटी बहू ने उत्सुकता वश अपने पिताजी को फोन किया और पूछा कि वे क्या भेज रहे हैं? उसके पिताजी ने कहा कि मैं भी लड्डू ही भेज देता हूं। त्यौहार के दिन छोटी बहू के मायके से सिर्फ 5 किलो ही लड्डू आए। छोटी बहू ने देखा तो उसे बहुत गुस्सा आया उसने पिताजी को फोन करके बोला कि आपने यह क्या किया मेरी इज्जत को मिट्टी में मिला दिया, मेरी जेठानी की तो वाह-वाह होगी और मेरी बुराई , मैं आपसे बहुत नाराज हूं, यह कहकर उसने फोन बंद कर दिया। त्यौहार का दिन आया तो छोटी बहू ने देखा कि सासूजी अपने रिश्तेदारों को दो बराबर के डिब्बे देती जा रही है यह कहते हुए कि एक बड़ी बहू और एक छोटी बहू के यहां से। छोटी बहू को बड़ा आश्चर्य हुआ कि यह बराबर बराबर के डिब्बे कैसे दिए जा रहे हैं? उसने सासूजी को पूछा कि मेरे पिताजी ने तो सिर्फ 5 किलो ही लड्डू भेजे और इस बात पर मैं पिताजी से बहुत नाराज भी हुई। आप  बराबर- बराबर कैसे दिये जा रही हो? तो सासु जी ने कहा कि तुम्हारे मायके की इज्जत हमारी इज्जत है।  मैंने  उन लड्डुओं  में और लड्डू मिला दिए और बराबर से सब कुछ दे रही हूं। बात सीधी है पर तूने समझी नहीं। जिसकी जितनी हैसियत हो, उसे उतना ही करना चाहिए। मैंने यह बात समझी और उसका उपाय करके समाधान निकाल लिया। छोटी बहू को बहुत पश्चाताप हुआ और उसने अपने पिताजी को फोन करके माफी मांगी

शनिवार, 26 नवंबर 2022

सफर पर निकलते हैं मिलकर -- कविता

 ठहरी हुई जिंदगी आखिर कब तक जिएंगे, 

कब तक एक ही घेरे में घिरे रहेंगे।

 जिंदगी ठहरे पानी सी हो गई है।

 चलो अब कहीं बाहर निकलेंगे। 

 अकेलापन बहुत बोझिल सा लगता है,

  चलो इस बोझ को हटा दें।

  दिलों में जो आ गई है मलीनता,

  कुछ ऐसा करें इसे मिटा दें।

  हम ही कहीं बाहर जाएंगे तो रहेगा अकेलापन,

 अपने आप से नहीं लगेगा मन।

 तो चलो इस अकेलेपन को मिटाने को,

 करते हैं कोई नया जतन।

 चलो अब निकलते हैं घर से बाहर,

 नई नई जगह देखते हैं कहीं जाकर। 

 हम भी हैं तुम भी हो वो भी हैं,

  चलो सफर पर निकलते हैं मिलकर।

जा गिरा खाई में--कविता

 वह दूध को पीता रहा ,

 मैं व्यस्त रहा मलाई में।

 दूसरों को सताने में जो मजा है,

 वैसा मजा कहां है भलाई में।


 मैं मलाई को चाटता रहा,

वह व्यस्त रहा दूध पिलाई में।

 पर दूध में वह मजा कहां,

    जो मजा है मलाई में।


 कुछ लोग बोतल में डूब जाते हैं,

 कुछ ढूंढते रहते हैं कुछ ढक्कन में, 

कोई छाछ को ही मुंह में लगाते हैं,

 कोई डुबकियाँ लगाते मक्खन में।


  हमारी तो फितरत ही अलग है,

 नजरें हमारी होती आसमान पर।

 हम भरे हुए थैले को नहीं देखते, 

 हमारी नजर तो होती है सामान पर।

 

 जब हम पूरे के पूरे साबुत खड़े हैं,

 फिर लोग क्या ढूंढते हैं हमारी परछाई में।

 जब अवगुणों की होती है यहां खूब पूजा,

 फिर क्या रखा है यहां अच्छाई में।


  दूसरों की चिंता हम क्यों करें ,

 हम तो अपने ही ख्वाबों में खोए रहते हैं,

 एक आंख से पापों की ओर देखकर,

 पुण्य की माला जपते रहते हैं।

 

 अब अपनों ने मुझे अकेला छोड़ दिया,

 मैं डूब गया घमंड की गहराई में।

 चलते-चलते खोया रहा तन्हाई में,

 सामने देखा नहीं जा गिरा मैं खाई में।

शुक्रवार, 25 नवंबर 2022

संपत्ति और संस्कार-- कविता


हम दुनिया की तरह भेड़ चाल नहीं चलेंगे,

 दूसरों का रास्ता अलग हम अपने रास्ते चलेंगे।

 चुनेंगे हम उसे नहीं जो धन के पीछे चले,

 हम संपत्ति नहीं संस्कार जिएंगे ।


 इस दुनिया में आने की किसे थी दरकार,

 किसी को यहां बुलाने की किसने की पुकार।

 शायद न दरकार हो और न पुकार, 

  लेकिन हर कोई आ जाता है हर बार।


 जिसे नहीं फ़िक्र परिवार या जमाने की,

 उसे नहीं होती फिक्र इज्जत कमाने की। 

 जो अपनों से ही पेश आये बेअदबी से,

 उसे सजा दी जाए सताने की।

 

 संस्कारहीन लोगों को बढ़ने को मौका थोड़ा है,

 ऐसे लोगों ने अपनों को भी कहां छोड़ा है।

 ऐसे ही लोगों के लिए कहा जा सकता है,

 कि यह तो 'काणा है और खोड़ा'  है।


 राह  चरित्र की तज जो भी चलेंगे,

  उनके संग हम हलाहल नहीं पिएंगे।

 धन का लालच नहीं हमें किंचित भी, 

 हम संपत्ति नहीं संस्कार जिएंगे।

गुरुवार, 24 नवंबर 2022

शब्दों का जाल-- कविता


# शब्दों का जाल उलझा हुआ है।

 स्वरचित --

 सतीश गुप्ता पोरवाल,जयपुर। 


शब्द कोई साधारण नहीं,

 उनकी महिमा न्यारी है।

 कभी कांटों का जाल है ,

  कभी सुंदर फूलों की क्यारी है।

 शब्द बड़े चंचल हैं,शरारती हैं,

कभी मूक हैं तो कभी वाचाल हैं।

 कभी कर देते हैं शांत,

 कभी लाते भूचाल हैं।

 कभी इधर-उधर बिखर जाते हैं,

   इन्हें समेटना इतना आसान नहीं।

 कभी आसानी से वश में आ जाते हैं, 

 अपने ऊपर कोई गुमान नहीं।

  कभी शब्द इतने शरीफ होते हैं, 

 जिसमें  घोलना चाहो घुल जाते हैं। 

जिस सांचे में ढालना चाहो,

 उसी सांचे में ढल जाते हैं।

शब्दों से चाहो तो कहानी बना लो, 

 चाहो तो लेखों की सरिता बहा लो।

और बहुत ही सलीके से प्यार से,

 चाहो तो रसभरी कविता बना लो।

  शब्द बहुत ही सरल यदि समझा हुआ है,

  वरना शब्दों का जाल उलझा हुआ है।

अभिमान-- कविता

 रे मानव काहे करे तू अभिमान,

 जग में क्यों खोता है अपना सम्मान। 

 सोच धरा पर अपनी रख ले,

 कहना मेरा आज तो ले तू मान।


 अभिमानी जब कोई हो जाता है,

 नहीं जानता क्या खो जाता है।

  दूर दूर होते जाते हैं सब,

 बस वही अकेला रह जाता है।


 जग में क्या लेकर तू आया था सामान,

 क्या ले जाएगा इससे नहीं है तू अनजान।

 अभिमान त्याग कर छुटकारा पाले, 

  तभी बनेगी तेरी मानव की पहिचान ।

विवेक-- कविता

 दुनिया में आए हैं तो जीना ही पड़ता है, 

 कई कई समस्याओं से दो-चार होना पड़ता है।

 कभी-कभी इंसान दोराहे पर खड़ा होता है,

 उसे कोई एक रास्ता तो चुनना ही पड़ता है।


 क्या करें क्या ना करें ऐसी स्थिति आती है,

 ऐसे ही स्तिथि सामान्य सोच को डगमगाती है।

 तब फिर मस्तिष्क में उबाल चला आता है,

 और सोच इधर-उधर आती जाती है।


  शांत मन से चित्त स्थिर करके सोचना होगा,

 अशांत होने से कुछ भी परिणाम नहीं होगा।

 इंसान अपने विवेक से काम लेगा तो,

जो भी परिणाम निकलेगा उचित ही होगा।

आसमान और उड़ान -- कविता


स्वरचित--

 सतीश गुप्ता पोरवाल 

  

जिंदगी को बहुत गिला है मुझसे,

  समझ में नहीं आता चाहती क्या है मुझसे।

एक दिन मैं भी आसमान में समा जाऊंगा,

इस दुनिया से हमेशा के लिए चला जाऊंगा। 


जरा ठहरो मुझे सोच तो लेने दो,

इस दुनिया में क्यों आया समझ लेने दो।

सच तो यह है मेरे दोस्तों मैं स्वयं नहीं आया 

मुझे अपनों के द्वारा  लाया गया।


अब जब आ ही गया हूं इस दुनिया में,

मेरे अपनों की इस सुंदर बगिया में।

तो समझ लेने दो दुनिया क्या है ।

वो दर्द-ए-ग़म बयां क्या है।


जिस दिन यह रूह रूठ कर चली जाएगी, 

उस दिन यह जमीं यह कायनात मेरी हो जाएगी।

उस दिन कुछ निशाँ छूटेंगे जरूर मुझसे,

मेँ जमीं पर हूं तब तक आसमान दूर है मुझसे।


 हौसला पस्त ना हो उड़ान पर हो,

  नजर अपने पे नहीं सारे जहान पर हो।

मंजिल दूर नजर आती जरूर है,

 लगता है जैसे यह बहुत ही दूर है।


  लेकिन हौसला हमारा किसी से कम नहीं,

 सोच लो अगर तो फिर कोई गम नहीं।

बुधवार, 23 नवंबर 2022

काश!जिंदगी--कविता

 

काश!जिंदगी

#दिनांक:23/11/2022


 काश!जिंदगी को मैं जी पाता,

जितना चाहा था खुशियां पा जाता।

 अंजली भर खुशियों का मैं क्या करूंगा,

 दामन में न समाए इतनी देता मेरे दाता।


 काश ! मेरी मंजिल का मुझे पता होता,

  तो अब तक वहां पहुंच गया होता।

 किस राह पर चलूं यह भी मालूम नहीं,

  मालूम होता तो यही नहीं खड़ा होता।


   ऐ मेरी जिंदगी मुझे कुछ तो बता,

 क्या मुझसे हो गई है कोई तो खता।

कोशिश बहुत की पर समझ न आया,

  अब तू ही मुझे समझा यदि है पता।


 काश! जिंदगी मेरी जिंदगी हो पाती,

 मेरे बिखरे ख्वाबों को करीने से सजाती।

 खुशी से मैं जिंदगी को अपना बनाता,

  मेरे साथ साथ जिंदगी भी मुस्कुराती।


स्वरचित --

सतीश गुप्ता पोरवाल

मंगलवार, 22 नवंबर 2022

गांव की पाठशाला -- कहानी

 जरूरी नहीं कि विद्यालय पूर्ण रूप से साधन संपन्न हो । जरूरी यह है कि अध्यापक में अध्यापन के प्रति समर्पण हो और बच्चों में पढ़ने और आगे बढ़ने की ललक।

  श्यामपुरा एक छोटा सा गांव । वहां के सरपंच ने जैसे तैसे प्रयत्न करके प्राथमिक विद्यालय के लिए स्वीकृति प्राप्त कर ली।विद्यालय के लिये वहां पर कोई भवन न था।एकमात्र अध्यापक की नियुक्ति गांव से ही की गई और अध्यापक महोदय खुले मैदान में ही हरियाली के बीच , पेड़ों की छांव में बच्चों को पढ़ाने लगे। बच्चे गिनती के ही थे लेकिन शुरुआत के लिए कम नहीं थे।मास्टर जी श्याम पट्ट पर लिखते हुए बच्चों को पढ़ाते और उनसे प्रश्न करके उत्तर प्राप्त करते।

  गांव में कुछ शरारती बच्चे भी थे, जिनको पढ़ने में रुचि नहीं थी। वे वहीं मैदान में फुटबॉल खेलते रहते,हालांकि मास्टर जी ने उनके मां-बाप को बहुत समझाया कि बच्चों को पढ़ने भेजा जाए , लेकिन मां-बाप कहते थे- हमें क्या कमी है, हम खेती कर रहे हैं बच्चे भी खेती कर लेंगे और ठीक से जीवन यापन कर लेंगे।

  बच्चे क्योंकि शरारती थे इसलिए जानबूझकर पास में ही फुटबॉल खेलते थे और फुटबाल पढ़ने वाले बच्चों की तरफ अक्सर आ जाती थी।

    मास्टर जी ने उनको समझाया लेकिन वे नहीं माने।अंततः हुआ यह कि इन पढ़ने वाले बच्चों यानी कि छात्रों ने उन शरारती बच्चों की धुनाई कर दी और फिर उनको समझाया कि तुम पिटाई के ही काबिल हो।यदि तुम्हें वास्तव में काबिल बनना है तो तुम्हें पढ़ना चाहिए। दो-तीन बार पिटाई होने और समझाने के बाद, बच्चों को समझ में आया और फिर उन्होंने भी विद्यालय में प्रवेश ले लिया ,और सभी साथ साथ पढ़ने लगे।

  गांव साक्षरता की ओर कदम बढ़ाने लगा।

जलता हुआ गुलाब -- कविता

 वे भी क्या दिन थे जब हाथ में हाथ डाले चलते थे,

एक दूसरे के दिल की बातें किया करते थे।

 हम एक दूसरे के दिल में समाते थे,

  जनम जनम का साथ निभाने की कसमें खाते थे।

 न देखूँ तुझे तो न आता था मुझे करार,

 तुझे भी नहीं था इस बात से कतई इंकार।

 लेकिन अखिर यह क्या हुआ अचानक,

 ऐसा क्यों हुआ मंजर भयानक।

  तू मुझसे दूर होती चली गई,

 मैं याद करता रहा तू मुझे भूल गई।

  मुझे याद है जब हमारी मोहब्बत शबाब पर थी,

 तेरे हाथों में मेरे लिए डाली गुलाब की थी।

अब जब तूने मुझे सिरे से भुला दिया,

 तो हमने भी वह गुलाब जला ही दिया। 

 अब तू भी देख ले वही जलता हुआ गुलाब,

 अब चाहे तू दे या ना दे मुझको कोई जवाब।

सोमवार, 21 नवंबर 2022

बाहर मैं मुस्कुराता हूं --कविता


 स्वरचित--
  सतीश गुप्ता पोरवाल

बाहर मैं मुस्कुराता हूं,
 अंदर ही अंदर गम के नगमे गुनगुनाता हूं।
 जीवन के सारे दुखड़े,
 दिल में समां कर किसी को ना सुनाता हूं।

 क्या हुआ जो जमाना जालिम है,
 अपने आप को पत्थर सा बनाता हूं। 
 रात बीत गई बात बीत गई,
 दिलों में प्रीत की छवि सजाता हूं।

 हम तो खोना चाहते थे,
 खुशीयों के मेलों में।
 पर अंत में पड़ गए,
 तन्हाई के झमेलों में।

  कटे कटे से रहते हैं लोग,
 बचे बचे से रहते हैं लोग।
 ईश्वर भी न जाने ,
 कहां से लगा इन्हें यह रोग।

 अकेले ही अपने रास्ते पर जाता हूं,
 बाहर मैं हर हाल में मुस्कुराता हूं।

हंसता हुआ चेहरा --कविता

 हंसता हुआ चेहरा जब भी नजर आता है,

लगता है जैसे खुशी की खबर लाता है।

 आतुर रहते हैं सभी उनसे मिलने के लिए,

 मिलकर उनसे खुशी से खिलने के लिए।


 लोग अक्सर गमों के तले दब जाते हैं,

  चेहरे उनके चमकने के बजाय बुझ जाते हैं।

 किसी को भी पसंद नहीं होता ऐसा चेहरा,

 कोई भी नहीं बांधना चाहता उसके सिर पर सेहरा।


 हम तो चाहें किसी के चेहरे पर न चिंता  रहे,

 मरने की इच्छा कभी ना हो जिंदा रहे।

 गम कितने भी आ जाएं जिंदगी में,

 जिंदगी ना कटे उनकी शर्मिंदगी में।


 गमगीन रहकर गम के तराने ना गुनगुनाये,

, झूम झूम कर खुशी के ही नगमे सुनाये।

फिर कोई गम नहीं -- कविता

 जिंदगी को बहुत गिला है मुझसे,

  समझ में नहीं आता चाहती क्या है मुझसे।

एक दिन मैं भी आसमान में समा जाऊंगा,

इस दुनिया से हमेशा के लिए चला जाऊंगा। 


जरा ठहरो मुझे सोच तो लेने दो,

इस दुनिया में क्यों आया समझ लेने दो।

सच तो यह है मेरे दोस्तों मैं स्वयं नहीं आया 

मुझे अपनों के द्वारा लाया गया।


अब जब आ ही गया हूं इस दुनिया में,

मेरे अपनों की इस सुंदर बगिया में।

तो समझ लेने दो दुनिया क्या है ।

वो दर्द-ए-ग़म बयां क्या है।


जिस दिन यह रूह रूठ कर चली जाएगी, 

उस दिन यह जमीं यह कायनात मेरी हो जाएगी।

उस दिन कुछ निशाँ छूटेंगे जरूर मुझसे,

मेँ जमीं पर हूं तब तक आसमान दूर है मुझसे।


 हौसला पस्त ना हो उड़ान पर हो,

  नजर अपने पे नहीं सारे जहान पर हो।

मंजिल दूर नजर आती जरूर है,

 लगता है जैसे यह बहुत ही दूर है।


  लेकिन हौसला हमारा किसी से कम नहीं,

 सोच लो अगर तो फिर कोई गम नहीं।

शनिवार, 19 नवंबर 2022

हर चेहरे की अपनी अपनी पहचान-कविता

 एक चेहरे पर दूसरा चेहरा नजर आता है यहां,

असली चेहरा नजर आता नहीं यहां।

मुझे है असली चेहरे की तलाश, 

असली चेहरा देखने जाऊँ कहां। 


हर शख्स की फितरत अलग अलग है, 

दिलों में भाव अलग अलग है।

सुषुप्त हैं किसी के  भाव,

किसी के मे जगी अलख है।

 

काया अपना भेष बदल लेती है,

माया उसमें रंग भर देती है। 

कितना भी जतन करले इंसान, 

लेकिन आँख भेद खोल देती है।


कोई कितना भी कर ले खींचतान,

सुन ले हर कोई खोल कर कान।

कितना भी चेहरे पर रंग लगा ले, 

हर चेहरे की है अपनी अपनी पहचान।

तुम बिन-- कविता

 बहुत कोशिश की मैंने तुम बिन जीने की,

 जीवन के पलों के चिथड़े सीने की। 

 पर हर कोशिश मेरी नाकाम ही रही,

  अब तो आदत हो गई जहर भी पीने की।


 मौसम आते रहे मौसम जाते रहे,

  गमों के अनेक नगमे गुनगुनाते रहे।

  और हम करते भी क्या तुम बिन,

  हम पर जो अपनों से बीती सुनाते रहे।


 तुम्हारी याद कंपकपाती ठंड सी आती है,

 होले होले से कुछ गुनगुनाती है।

  सुकून का तो एक तिनका भी नहीं मिलता,

हरदम गमों की महफिल सजाती है।


 करूं क्या मैं कुछ समझ ही नहीं आता, 

 तुम्हारे साथ बीता हुआ पल बहुत ही सताता।

 अब जैसे भी हो जीना तो होगा ही,

  इन्हीं गमो से जोड़ लिया है अब नाता।

शुक्रवार, 18 नवंबर 2022

रात भर नींद न आई -- हास्य कविता

 पेट मेरा कितना भी खाली क्यों ना हो,

  खाने को कुछ मिले या ना मिले,

 पर सच बताऊं मेरे यारों,

 चैन तो तभी आए जब नैन मिले।


 नैन मिले नैन मिले नैन मिले यही सोचता रहा,

 जो मुझ में समाये उसे खोजता रहा।

  एक नटखट सी मुझे राह में मिली,

  पर चल हट कह कर चल निकली।


 जब से नैन मिले मेरी चमेली से, 

 नैन-नक्श कमतर थे उसकी सहेली से। 

 फिर भी मैंने उसके दिल से दिल मिला लिया,

 मन ही मन उसे अपना मान लिया।

 

वह भी इसी खोज में थी कि उसे कोई मिले,

 जिसके मीठी मीठी बातों से उसका दिल खिले।

 मिले जो हम दोनों नजरें झुकाए थे,

  दिल के जज्बात हमने छुपाए थे।


जब नजरों से नजरें मिल गईं,

तो दोनों एक साथ खूब खिलखिलाये थे,

अपने दिल के उपवन में,

 तरह तरह के फूल खिलाये थे ।


 पर जब से देखा उसके बाप को,

 बाप रे बाप क्या बताएं आपको।

 डील-डोल और शक्ल से राक्षस लगता था,

 समझ लो कि प्यार का भक्षक लगता था।

 

 हम दोनों ने  जी भर खूब की दिल्लगी,

 मैं उसे और  वह मुझे चिट्ठी देने लगी।

  लेकिन आज रात भर मुझे नींद ना लगी ,

 जबसे मेरी चिट्ठी उसके बाप के हाथ लगी।

मुस्कुराना सिखाया है -- कविता

 पथराई आंखों में ख्वाब खोजते हैं,

 अश्रुपूरित आंखों के अश्रु  पोंछते हैं।

 हम कितने भी गाफिल रहे जमाने में,

 हर पल तुम्हारे बारे में ही सोचते हैं।


 ना सोचो कि ख्वाब हमारे अधूरे रहेंगे,

  सपने हमारे कभी ना पूरे होंगे।

  उजाले ही भर देंगे हर कहीं ,

  आंखों के सामने न घने अंधेरे होंगे।


हमने अपने सपनों में तुम्हें ही समाया है,

हमारे दिल में जब भी देखा तुम्हें ही पाया है।

 तुम कितने भी संगदिल हो ए सनम,

 हमने तो पत्थरों को भी मुस्कुराना सिखाया है।

जन्मदिन- क्षणिकाएं

 #उड़ान 

#क्षणिका 



स्वरचित--

 सतीश गुप्ता पोरवाल 


होता है जब तुम्हारा जन्मदिन ,

उमड़ पड़ती है मन में भावना।

 सदा खुश रहो अपने जीवन में,  

   हमारी यही है शुभकामना।


गम ना कभी आसपास रहे ,

हमेशा हंसता खिलखिलाता रहे।

 हर खुशी तुम्हारे साथ रहे,

 हमारा अपना कभी न उदास रहे।

गुरुवार, 17 नवंबर 2022

बेबसी-- कविता

 कहना चाहता हूं बहुत कुछ कह नहीं पाता,

सुनना चाहता हूं बहुत कुछ सुन नहीं पाता।

 देखना चाहता हूं बहुत कुछ देख नहीं पाता,

कैसी यह बेबसी है समझ भी नहीं पाता।


लगता है जैसे किसी ने जुबां पर ताला लगा दिया,

किसी ने जैसे कानों में रुई का डाटा लगा दिया।

 आंखों पर यह कैसा चश्मा लगा दिया,

   सभी ने मुझे बेबसी में उलझा दिया।


ऐसे बेबसी से मैं तंग आ गया हूं ,

अब मैं साहस के संग आ गया हूं।

 अब तक सही मैंने असहनीय पीड़ा

  अब उठा लिया मैंने दुस्साहस का बीड़ा।

बुधवार, 16 नवंबर 2022

आसमां दूर है मुझसे-- कविता

 मैं जिंदा हूं तब तक आसमां दूर है मुझसे,

जिंदगी को बहुत गिला है मुझसे।

एक दिन मैं भी आसमां में समा जाऊंगा,

 इस दुनिया से हमेशा के लिए चला जाऊंगा। 


जरा ठहरो मुझे सोच तो लेने दो,

 इस दुनिया में क्यों आया समझ लेने दो।

सच तो यह है मेरे दोस्तों मैं स्वयं नहीं आया 

  मुझे अपनों के द्वारा  लाया गया।


 अब जब आ ही गया हूं इस दुनिया में,

  मेरे अपनों की इस सुंदर बगिया में।

तो समझ लेने दो दुनिया क्या है ।

 वो दर्द-ए-ग़म बयां क्या है।


  जिस दिन यह रूह रूठ कर चली जाएगी, 

 उस दिन यह जमीं यह कायनात मेरी हो जाएगी।

 उस दिन कुछ निशाँ छूटेंगे जरूर मुझसे,

  मेँ जिंदा हूं तब तक आसमां दूर है मुझसे।

मंगलवार, 15 नवंबर 2022

रिश्तों की मर्यादा-- कविता

 मानव मानव के मध्य संबंधों में,

  मधुरता होती कुछ कम कुछ ज्यादा।

 नमन है उन नर-नारी को,

 जो समझे रिश्तो की मर्यादा।


 स्वार्थ लोलुपता भरी हुई है,

 कलुषित मानसिकता से हैं सरोबार।

 नजर आ जाता है सहज ही, 

 उनका स्वार्थ भरा व्यवहार।


  मानव में यदि मानवता नहीं होगी,

  तो समझो मानव में पशुता होगी।

  ऐसी पशुतावादी मानसिकता से,

  कैसे रिश्तो की मर्यादा होगी ।

भाई हो तो ऐसा-- लघु कथा


# दिनांक 15 /11/ 2022

 स्वरचित 

 सतीश गुप्ता पोरवाल 


गोलू का परिवार आर्थिक रूप से अत्यंत पिछड़ा परिवार था।उसके पिता मकान में पुताई का एवं मां घरों में बर्तन साफ करने का कार्य करती थी,जिससे बस गुजारा हो पाता था।वे मकबरे के पास ही एक छोटी सी झोंपड़ी में रहते थे।गुल्लू का पीछा करते हुए,अल्प समय में ही यानी एक बरस में ही उसको एक बहिन भी मिल गई थी।बहिन काफी चंचल थी तो उसका नाम उसकी मां ने गोली रख दिया था। दोनों भाई बहिन आपस में खेलते ,लेकिन गोली का जी नहीं भरता और वह पड़ोस में ,उसकी  मां जहां बर्तन साफ करती थी,उन घरों के बच्चों के साथ खेलने के लिए पहुंच जाती।उन बच्चों को यह अच्छा नहीं लगता था,वे उसको भगा देते थे। गोली रुआँसी होकर वापस घर आ जाती थी। गोलू ने उसे समझाया कि हमारे बचपन और उनके बचपन में अंतर है। वे बड़े लोग हैं,तुझे साथ में नही खिलाएंगे। गोली उदास हो गई और कहा कि हमारे पास तो कोई खिलौने भी नहीं हैं,उनके पास तो ढेरों हैं।तो गोलू ने कहा कि हमारे पास इतने पैसे नहीं हैं कि बाजार से खिलौने खरीदे सकें।लेकिन तू चिंता मत कर, मैं तेरे लिए खिलौने बनाने की कोशिश करता हूं। उसने अपने पिता की छेनी,हथौड़ी,कीलों आदि से लकड़ी के टुकड़े लेकर एक खिलौना बना दिया। गोली बहुत खुशी हो गई।गोलू ने इस तरह कुछ और खिलौने बनाए। वे आपस में इन खिलौनों से खेलने लगे ।उन्हें अब किसी और के खिलौनों की जरूरत नहीं थी।उसे अपने भाई पर गर्व हुआ और उसने गोलू को बोला- सुन भैया--"भाई हो तो ऐसा"। गोलू ने पलट कर जवाब दिया--"चल पगली"।

अपने--कविता

 #मां शारदे काव्य मंच 

#तीन दिवसीय आयोजन 

स्वरचित -'

 सतीश गुप्ता पोरवाल 


अपने क्या अपने होते हैं ,

या फिर सिर्फ सपने होते हैं।

 ढूंढते हैं हम अपनों में अपनापन,

 पर मिलता है कभी परायापन।

खून के रिश्ते बने बनाए होते हैं,

 उनमें कुछ अपने कुछ पराए होते हैं।

 बनाए हुए रिश्ते भी अपने हो जाते हैं,

 लगता है जैसे सपने सच हो जाते हैं।

  हम तो यही कहते हैं कि,

  सब को अपना बना दो। 

कोई भी पराया न हो जग में,

  खुद जियो और सबको जीने दो।

सोमवार, 14 नवंबर 2022

जीवन में सबसे बड़ी खुशी--लेख

 इंसान इस धरा पर आता नहीं,उसे लाया जाता है। जब वह इस धरा पर आता है तो वह नहीं जानता कि खुशी क्या है और दुख क्या है ।लेकिन आने के बाद ही वह , अनजाने में ही, सुख और दुख से रूबरू होने लगता है। लेकिन जब समझने लगता है तब वह ज्यादा से ज्यादा सुख और कम से कम दुख चाहता है क्योंकि वह सोचता है कि सुख ही खुशी है। 

 सुख दो प्रकार के होते हैं एक भौतिक सुख और दूसरा आत्मिक सुख।कुछ लोग भौतिक सुख को ही वास्तविक सुख समझ लेते हैं और धन और दिखावे के पीछे भागते भागते अपने जीवन का अधिकांश समय बिता देते हैं।यह भौतिक सुख उनके चेहरों पर नजर आता है। कुछ लोग आत्मिक सुख को वरीयता देते हुए जीवन में चलते हैं और खुशी उनके चेहरों पर ही नहीं दिल और आत्मा में भी महसूस होती है।तो मैं तो यही कहूंगा कि सबसे बड़ी खुशी आत्मिक सुख से ही मिलती है।कुछ भी करने से हमें दिली खुशी हो,ऐसा तभी संभव लगता है जब लेने की प्रवृत्ति के बजाय किसी जरूरतमंद को देने की प्रवृत्ति हो।कुछ लोग देने में भी दिखावा करते हैं , मंदिर में बड़ा दान देकर अपना नाम लिखवाते हैं। किसी संस्था को दान देकर प्रमाण पत्र प्राप्त करते हैं या आयकर में छूट प्राप्त करने के लिए ऐसा करते हैं। 

 मैंने देखा है कुछ लोग देर रात अपनी गाड़ी में खाने के पैकेट या सर्दियों के मौसम में कंबल लेकर चलते हैं और फुटपाथ पर सोए हुए लोगों को चुपचाप दे आते हैं। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो जरूरत ना होते हुए भी कामगार को काम देते रहते हैं ताकि वह अतिरिक्त धन का उपार्जन कर सके और परिवार का ठीक से पेट भर सके। मैंने स्वयं जरूरतमंदों को सहायता करके यह आत्मिक सुख महसूस किया है और मैं मानता हूं कि देने का सुख ही सबसे बड़ा सुख है।

 यही सबसे बड़ा सुख ही जीवन की सबसे बड़ी सच्ची खुशी है।

देखो बिना टिकट का खेल-बाल कविता

 देखो बिना टिकट का खेल। 

 आओ बच्चों चलें चौपाटी पर 

वहां खाएंगे भेल।

भांति भांति के लोग यहां पर 

 देखो बिना टिकट का खेल ।


 मम्मी ने भेजा मुझको घी लेने को,

 घर घर आकर खोला पैकेट तो,

 जमा मिला था तेल ।

 देखो बिना टिकट का खेल।


 अदालत में देखा एक अजूबा,

  झूठा था जो वह बच निकला,

 सच्चे को हो गई जेल।

 देखो बिना टिकट का खेल।


 अच्छा हुआ पटरी से दूर खड़े थे,

  अपनी ही धुन में मगन खड़े थे,

 धड़धड़ाता निकला फ्रंटियर मेल,

 देखो बिना टिकट का खेल।


जब हो जाए झगड़ा दो में,

 कोई वकील तो अलग कराए,

 और कोई कराए मेल।

  देखो बिना टिकट का खेल।

रविवार, 13 नवंबर 2022

मन रे तू काहे न धीर धरे--कविता

 मन रे तू काहे न धीर धरे ।

 ह्रदय तुम्हारा निर्मल जल सा,

 दुनिया निर्मोही दिल में पीर भरे। 

मन रे तू काहे न धीर धरे।

मन तेरा कितना है दया भरा,

  दुनिया घाव गंभीर करे।

  मन रे तू काहे न धीर धरे।

  जग में तू धैर्यवान कहलाए,

  दुनिया तुझे अधीर करे।

  मन रे तू काहे न धीर धरे।

 तू पर घावों पर मरहम लगाए,

 दुनिया घाव गंभीर करे।

  मन रे तू काहे न धीर धरे।

    तेरी गरीबी का कोई उपहास उड़ाए,

   पर तू दुनिया को अमीर करे। 

 मन रे तू काहे न धीर धरे।

जाऊं मैं किस ओर--कविता

 रसिक पिया तू ही बता,

 जाऊं मैं किस  ओर ।

 मैं इधर जाऊं या उधर जाऊं,

 मिला ना अब तक कोई छोर ।

 रसिक पिया तू ही बता,

 जाऊं मैं किस ओर। 

 रात रात भर जाग रहा,

 नींद न आई हो गई भोर।

 रसिक पिया तू ही बता

 जाऊं मैं किस ओर।

  दिल मेरा पतंग बन डोल रहा,

 मिली न कोई डोर।

 रसिक पिया तू ही बता,

 जाऊं मैं किस ओर। 

नाहक ही समझाया दिल को,

  दिल पर चले ना कोई जोर।

 रसिक पिया तू ही बता,

  जाऊं मैं किस ओर।

गुरुवार, 10 नवंबर 2022

गुमनाम को नाम- कविता

 गुमनाम है कोई नामदार है कोई, 

 नासमझ है कोई समझदार है कोई।

 बुरा करके भी नाम कमाता है कोई, 

 और भला करके भी बदनाम है कोई।

कुछ करने की इच्छा होना जरूरी है,

 लक्ष्य तय करके रवाना होना जरूरी है।

 लेकिन लक्ष्य तक पहुंचने से पहले,

  दृढ़ निश्चय का होना जरूरी है। 

 इंसान न तो आसमां को छू सकता है,

 और न ही समुद्र की पूर्ण गहराई तक पहुंच सकता है।

 माना कि हौसला हो बहुत हो,

 लक्ष्य वही निर्धारित हो जो पा सकता है। 

इच्छा हो तो बलवती हो,

फिर निश्चय के साथ मंजिल पा सकता है। 

 ऐसे ही सभी गुणों का इंसान यदि धारण करता है,

तो यही धारण गुमनाम को नाम और पहचान देता है।

सोच के हिसाब से जीना --कविता

 इतना आसान कहां है इस दुनिया में, 

 अपनी सोच के हिसाब से जीना।

 और यदि जीना है अपनी ही सोच से,

  तो गरल तो पड़ेगा ही पीना।

 

  शिक्षा हो नौकरी या पहनावा, 

 आसान नहीं है यह सब पा जाना, 

 कदम कदम पर मिलेगी  रोक, 

 और अनेकानेक तुमको मारेंगे ताना।


  जब सोच ही लिया है आजादी से जीना,

 तो समझो तीखी धार पर चलना ही होगा,

दृढ़ निश्चय के साथ आगे बढ़ कर, 

अपना लक्ष्य प्राप्त करना ही होगा।



 अपना लक्ष्य प्राप्त करना ही होगा।

अपनी अपनी सोच -- कविता

 इंसान जब नजरें उठाकर ऊपर देखता है,

 किसी को कौवा,कबूतर या कोयल दिखती है।

 किसी की नजर बादलों में अटक जाती है,

 और किसी की आसमान तक पहुंचती है।


 किसी गिलास में आधी ऊंचाई तक पानी हो,

 किसी को आधा भरा किसी को खाली दिखता है।

  गुणवत्ता वाला माल धरा ही रहता है, 

  घटिया हाथों हाथ बिक जाता है।


  किसी के ख्याल उम्दा तो किसी के  में खोट है,

किसी को घर में किसी को बाहर का शौक है।

 जीवन जीने का नुस्खा ही सही खोज है, 

 सुन ले भैया अपनी-अपनी सोच है।


 सुन लो भैया अपनी-अपनी सोच है।

बुधवार, 9 नवंबर 2022

कितने कितने नाम -- मुक्तक

 कितने कितने नाम गिनाऊं , 

 किस-किस के किस्से तुम्हें सुनाऊं।

  दांतो तले उंगली दबा ही लोगे,

 कारनामे उनके जब तुम्हें बताऊं।


  सत्य तराजू पर उन्हें बैठाऊं,

  असत्य के माप पर उन्हें तुलाऊं।

  दूर-दूर बैठे हैं छुप कर,

   पास उन्हें मैं अपने बुलाऊं। 


हम करें क्या तुम्हें अपनी हालत बयां,

 हमने हर एक दर्द दबाया कहां-कहां।


मिल नहीं रहा मुकाम न जाने कहाँ खो गया ।

कोई तो है जो आकर राह में काँटे बो गया।

कब से हूं प्रयासरत मुकाम पा जाने को।

 लेकिन लगता है जैसे भाग्य ही मेरा सो गया।


स्वरचित- सतीश गुप्ता'पोरवाल',जयपुर।

मुक्तक -- उसे देखिए


पंक्ति : आज जो ना हुआ कल उसे देखिए 


 आज जो ना हुआ कल उसे देखिए।

 छुपकर वार करता हो छुपकर उसे देखिए।।

 उसकी हर बात पर हां में हां मिलाईये।

 फिर अपनी उंगलियों पर नचा कर उसे देखिए।।


अपनी धुन पर मगन होता उसे देखिए ।

जमाने से बेफिक्र होता उसे देखिए।।

 उसकी हर बात से नासाज होकर ।

  पागल होता हुआ उसे देखिए।।


निगाहें अब तलक तुझे ढूंढती हैं ,

 लापता का अब पता पूछती हैं।


 जिंदा कर दिया मुझे तेरी दुआ ने,

 वरना इंतकाल हो गया था मेरी जिंदगी का।


 खड़े-खड़े बस सोचते रहे ,

न इन्कार कर सके न इजहार कर सके। 

 दिलों के बीच आ गई थी ऐसी दरार,

 हम वह दरार न भर सके।


किसी का दामन छोड़ दें , हम वो नहीं,

 बीच राह में छोड़ दें , हम वो नही।

 जिंदगी भर साथ निभाने का था वादा,

  वह वादा तोड़ दें , हम वो नहीं।


संस्कार की ही तो बात है ,

 इंसान करता वही जो ज्ञात है।

 संस्कार विहीन इंसान के साथ ,

 कभी न कभी होता घात है ।


समय का चक्र चला जब घड़ी की दिशा में,

 बिछड़े साथी सब संग हुए ।

 फिर समय का चक्र चला विपरीत दिशा में,

  तो सारे रिश्ते नाते पल में भंग हुए।


कैसा भी हो परायों का खौफ,

 इंसान को अक्सर सहन होता है। 

  जीवन दाव पर लगा देता है,

  अपनों का खौफ इतना गहन होता है।


सुनकर खनक चूड़ियों की और झनकार पायल की,

  कोई न जाने  हालत  मेरे दिल घायल की ।

  पर क्या करूं दिल भी मानता ही नहीं ,

   न ही सुने  वह कोई भी बात  इस पागल की।




मंगलवार, 8 नवंबर 2022

आसमां की तलाश में हूं-- कविता

 जमीं खो चुका हूं आसमां की तलाश में हूं।

इस बार हार गया तो क्या फिर जीत की आस में हूं।।

 मन में रखता हूं विश्वास और लड़ने का माद्दा।

 इसीलिए समझता हूं कि मैं विजय के आस-पास हूं।।


 फिसलता हूं कभी-कभी राहों में।

 यह फिसलन मुझे कभी रोक नहीं पाएगी।

गिरकर उठने पर मिलती है नई ताकत।

 अब नहीं हार में फिर जीत की प्यास में हूं।।  


अनेक बार हार कर भी अब जीत की प्रयास में हूं।

जमीं खो चुका हूं आसमां की तलाश में हूं।।

नया सवेरा-- कहानी



स्वरचित-'

 सतीश गुप्ता पोरवाल ,जयपुर। 


गायत्री का जन्म एक निम्न मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। विवाह योग्य उम्र हो जाने पर,उसका विवाह, ऐसे ही एक परिवार में, उमेश से हो गया था। उमेश एक कंपनी में साधारण सी नौकरी में था।जैसे तैसे परिवार का जीवन यापन हो रहा था। कालांतर में उनके दो बच्चे हो गए थे,जिनको सरकारी स्कूल में पढ़ा रहे थे। गायत्री दिनभर घर का दैनिक कार्य करती और उमेश दिनभर कंपनी की नौकरी करके थका हारा घर पर आता और लगभग आराम ही करता रहता। उमेश को मालूम था कि गायत्री सुबह उसके उठने से पहले ही बिस्तर छोड़ देती थी और दिन भर काम करती हुई रात को बिस्तर पर देरी से ही आती थी। लेकिन वह यही सोचता था कि इसमें मैं क्या कर सकता हूं ।

  एक बार हुआ यह कि अगले दिन 'बासोड़ा' का त्यौहार था जिसमें एक दिन पहले ही खाना बना कर तैयार रखना पड़ता है। उमेश के काम से वापस आने के बाद सब कुछ वैसा नहीं हुआ जैसे हमेशा होता था।रात को 10:00 बजे के बाद भी जब गायत्री शयन कक्ष में सोने के लिए नहीं आई तो उमेश ने सोचा कि थोड़ी देर में आ जाएगी और वह सो गया। एक घंटे बाद उसकी नींद खुली और उसने देखा कि 11:00 बज गए हैं और अभी तक नहीं आई। बिजली जा चुकी थी और घर में अंधेरा हो रहा था, उसे यह देखकर और आश्चर्य हुआ कि गायत्री अभी तक नहीं आई उसने सोचा कि आखिर ऐसे अंधेरे में वह कर क्या रही है।उसने अपने मोबाइल की टॉर्च से रोशनी की और रसोईघर में जाकर देखा कि गायत्री आटा गूंध रही है और चूल्हे पर पतीले में सब्जी बन रही है। वह पतीले में चम्मच चलाने लगा। गायत्री ने उसे देखा और आश्चर्य से कहा ,अरे आप सोए नहीं ? उमेश ने भरे दिल से कहा - मेरी नींद एक घंटे में ही खुल गई , शायद मुझे यह दिखाने के लिये कि तुम सुबह से रात तक कितना काम करती हो ,धन्य हो गायत्री तुम ।मुझे लगता है कि मुझे भी तुम्हारे काम में हाथ बटाना चाहिए। गायत्री को लगा कि उमेश के दिल की रोशनी टॉर्च के माध्यम से उसके पास पहुंच रही है।उसने खिड़की से बाहर देखा -चांद पर से बादल का टुकड़ा हट चुका था और चांदनी पूरे शबाब से रसोई घर में प्रवेश करने लगी थी।

सोमवार, 7 नवंबर 2022

सुनो मनमीत/मधुमीत कविता (संशोधित)

 जीवन की दौड़,जैसे घुड़दौड़।

कोई रहा जोड़ ,कोई रहा तोड़।।

कोई है पुण्यात्मा,कोई पापी।

एक अकड़ रहा,दूजा मांगे माफी।।


गये हम जीत,सुनो मधुमीत।

मैं हूं गीत, तुम संगीत।।

लगाकर ध्यान, सुने सब गान।

 नहीं अज्ञान , सभी संज्ञान।।


पहले तोल , फिर बोल ।

जो हो सही,वही हो कही।।

बजाकर ढोल , न खोल पोल।

मीठे बोल , मिश्री घोल ।।


 किसी पहर , होगी सहर ।

तुम्हारी नजर , करेगी असर।।

  रख ले धैर्य,न हो अधीर।

 तुम्हारी जिंदगी,बनेगी नजीर।।

रविवार, 6 नवंबर 2022

बारिश की बूंदों ने - कविता

 घनघोर सी बरसती बारिश की बूंदों ने, 

 आज  यह कैसा कहर ढाया है।

 बाट जोहती मेरी इन आंखों को,

 वह अभी तक नजर नहीं आया है। 


 बादलों के जमघट ने शोर मचाया है,

   सूरज ने घबराकर अपना मुख छुपाया है।

 आज उससे शायद मिलन ना हो पाए,

   यही सोचकर दिल घबराया है। 


  ऐ घटाओं यदि वह राह में कहीं पर है ,

  तो जमकर बरसो बारिश रुक ना पाए।

 वह जहां पर हो वहीं पर रहे ,

 वापस वहां से से जा ना पाए।


 मैं छाता लेकर जाऊंगी उनसे मिलने,  

  उधर मौसम मेघ मल्हार गाएगा।

 इधर छाते के नीचे मेरा दिल,

  अपना प्यार पा जाएगा।

मुक्तक-3

 धनवान को ढूंढने निकला था इस जग में,

 हर इंसान पर बेहिसाब कर्ज निकला। 

 किसी इंसान में इंसानियत नजर नहीं आई,

 हर इंसान यहां खुदगर्ज निकला।(1)

नजाकत इतनी भरी पड़ी है,

 कि कोमल कली को भी शरम आ जाए।

 ज़रा जो झुके चरण स्पर्श को,

  तो नाजुक कमर में लचक आ जाए।(2)

मिलता तो जरूर है चाहे आज या कल,

बहुत ही मीठा होता है मेरे भाई नेकी का फल। 

करता जा इस जग में सभी का भला,

 तभी तो होगा जग में तेरा जीवन सफल।(3)

 इंसान ही कर सकता है ऐसी हरकत,

 अलग-अलग होती है उसकी जरूरत।

 गिरगिट को ही क्यों बदनाम किया जाए,

 देख ली हमने इंसान की बदलती फितरत।(4)

कभी मन में भाव आते हैं कटी पतंग की तरह,

 कविता बन आ जाते है नई उमंग की तरह ।

 बस इतना ही काफी होता है,

  कविता कागज पर उतर जाती है तरंग की तरह।(5)

होता है कभी-कभी आखिर इंसान ही तो है,

किसी छोटी सी बात से डर ही जाता है ।

यही डर उसको हिम्मत दिलाता है तो,

आगे बढ़कर डर से जीत जाता है।(6)

सर्द मौसम पिया घर तो आओ अभी ,

 झूठे वादे करके न तड़पाओ कभी।

 अभी नहीं तो आओ जब फुर्सत मिले तभी ,

 कुछ बातें बतानी हैं जो हैं दिल में दबी।(7)

 दो जून रोटी की खातिर सदा सफर में रहा,

इस तरह सदा ऊँचा अपनों की नजर में रहा।(8)

 समय भी किस तरह ढा कहर रहा,

 कब से भटकता मैं दर बदर रहा।(9) 

 प्यार के अफ़साने तो पुराने हुए,

 लोग अब नफ़रतों के दीवाने हुए।

 आ जाओ ना यार अब तो,

  किसी से गले मिले ज़माने हुए।(10)

 यह कागज की कश्ती कहीं तो जाकर रुकेगी,

 या तो भंवर में फंसेगी या कहीं जाकर डूबेगी।

 कितना भी इतरा ले इंसान इस जमाने में 

 एक दिन तो उसकी राख जमीं को चूमेगी। (11)




सहारा

 कुछ लोग गुजारते हैं जीवन को ऐसे,

  मुफ्त में ही मिल गया हो उनको जीवन जैसे।

 वे नहीं जानते कितना बहुमूल्य है, 

 यह जीवन फिर दोबारा नहीं मिलता।


डूब जाती है किसी की कश्ती मझधार  में ही,

उस बदनसीब को किनारा नहीं मिलता।

  जब सितारे हों किसी के गर्दिश में,

 तो डूबते को तिनके का सहारा नहीं मिलता।

बुधवार, 2 नवंबर 2022

थोड़ा मुस्कुरा कर जिया जाए


स्वरचित --

 सतीश गुप्ता 'पोरवाल'


 चलते चलते थक गए हो ,

चलो थोड़ा सुस्ता लिया जाए ।

  राहों में रुकावट आती हैं तो  आएं,

   दृढ़ निश्चय से इन्हें पार किया जाए। 


 आसमान पर नजर  टिकाना ठीक नहीं,

 नजर को जमीन पर उतार लिया जाए।

 क्यों खिंचे-खिंचे रहते हो एक दूसरे से,

एक दूसरे के दिल में समा लिया जाए। 


 जमाने में जो भी लगे हमें अच्छा,

 क्यूं ना उन्हें अपना लिया जाए।

  यूं अनजान बनकर किसी भी राह पर चल दिए,

 पहले मंजिल को समझ लिया जाए।


 गम के फसाने बहुत सुन लिए,

चलो खुशी का तराना गुनगुनाया जाए।

 गम तो साथ है ही,

 क्यों न थोड़ा मुस्कुरा कर जिया जाए।

लूट पर लूट का चलन देखिए-- कविता


#पंक्ति :: लूट पर लूट का अब चलन देखिए

 स्वरचित -

 सतीश गुप्ता 'पोरवाल', जयपुर।


किसी का बेतरतीब तन न देखिए।

 देखना है तो उसका मन देखिए।। 

 हालात पर उसके तरस खाइए।

 उसका उजड़ा हुआ चमन देखिए।।


रोज-रोज मर्यादाओं का हनन देखिए। 

  कुत्सित विचारों का खनन देखिए।।

 हालात तो यह है जमाने की।

 सच पर झूठ का कफन देखिए।।


करते हैं कैसे झूठ को नमन देखिए।

  जो करते नहीं वह कथन देखिए।।

किस किस पर यकीन करें आखिर।

 लूट पर लूट का अब चलन देखिए।।



मंगलवार, 1 नवंबर 2022

सुन मेरे भाई- कविता

 जिंदगी के हर कदम पर हर मोड़ पर मुस्कुराए जा,

 सुन मेरे भाई जीवन की माला में खुशियों के मोती पिरोए जा।

 दुनिया यह जाल है उलझ न जाऊंगा,

 सामने पहाड़ है टकरा न जाऊंगा।

  ऐसा न सोच यह तो बातों का जाल है,

 सामने तो तिल है पर लगता पहाड़ है। 

 अरे सपनों से न डर सपने तो अपने हैं, 

 तू व्याकुल से दिल में सपनों की महफिल सजाए जा।

  सुन मेरे भाई- - - -

  पीड़ा का द्वार आए उसे न बंद कर, 

 बाहों में बल है उससे तू द्वंद कर।

 पीड़ा हट जाएगी रास्ता दिख जाएगा,

 सपनों की मंजिल को तब ही तू पाएगा।

 मुसीबतें तो बहुत हैं जीवन की राहों में,

 रुकना न भूलकर उनसे तू टकराए जा।

 सुन मेरे भाई- - - 

  दुनिया की बातों से क्यों तू डर रहा,

  अमृत के प्याले को समझ क्यों जहर रहा।

 रास्ते अनेक हैं दुनिया के मेले में,

  फिर क्यों तू पड़ रहा एक ही झमेले में।

 साज़ों के ढेर हैं इन्हें ना देख तू,

 अपने ही दिल का साज तू बजाए जा।

 सुन मेरे भाई- - - - 

  समय तेरे साथ है उससे तू प्यार कर, 

 राह तुझे दिखाएगा उससे न तकरार कर।

 बढ़ता ही जा मंजिल को पा जाएगा, 

 पीछे न देख वरना पिछड़ तू जाएगा।

  बढ़ गया है आगे तू राहों को पार कर, 

 पर पिछड़े हैं जो उन्हें भी गले से लगाए जा।

  सुन मेरे भाई- - - 

 कंचन की दुनिया में व्याकुल हो तू खड़ा,

 जान रहा हूं किस  मोह में है तू पड़ा।

 निर्मोही हो कितने ही पापों कि यह जड़ है,

 मानव की राहों में यही तो एक अड़चन है।

 निगाहें हटा ले चाहत न इसकी कर, 

 माया का भाव आये उसे तू ठुकराए जा।

 सुन मेरे भाई - - - - 

 बातों के जाल से हवाई किले न बना 

  बातों से होता क्या यह मुझे न सुना। 

  कर्म कर मर्म इसका जान ही ले,

 जो अब तक खोया उसे अब पा ही ले।

 बहुत कुछ खोया चोट दिल पर आई होगी,

 गम न कर चोटिल दिल को होले होले सहलाए जा।

  सुन मेरे भाई- - - -, 

  दुनिया है यह समझ न इसको पाएगा,

 सोचेगा जितना उतना ही उलझ तू जाएगा।

दुनिया चाहेगा जैसी बन जाएगी,

 तेरे ख्वाबों की झोली खुशियों से भर जाएगी।

गम जो आए अगर गमगीन न हो,

मेरी तरह तराने झूम के सुनाए जा।

सुन मेरे भाई जीवन की माला में, खुशियों के मोती पिरोए जा।

रिश्ते जीवन के आधार --लेख

 किसी भी चीज के टिके रहने के लिए आधार जरूरी है। आधार जितना मजबूत होगा तो वह चीज उतनी ही स्थिरता, सुगमता से और अधिक से अधिक समय के लिए टिकी रहेगी। 

 आइए इस चीज को रिश्ता समझ कर , इसी संदर्भ में हम आगे बात करते हैं ।

 हम देखते हैं कि रिश्ते कुछ तो होते हैं  और कुछ बनाए जाते हैं । रिश्ते जो होते हैं वे हमारे जन्म के साथ जुड़े हुए  होते हैं और जो बनाए जाते हैं उनका जन्म के बाद सृजन होता है । सभी  रिश्तो में मिठास की  अत्यंतआवश्यकता होती है। लेकिन आज के परिवेश में हम देखते हैं कि रिश्ता कोई सा भी हो,कभी न कभी किन्ही के बीच दरार आने लगती है। और अति होते टूट भी जाते हैं। आखिर क्यों होता है ऐसा?

 निस्वार्थ भाव से,बिना किसी दंभ 

 के,दूसरे को सम्मान देते हुए, धैर्य धारण करते हुए , हम चलते चलें तो ये रिश्ते अटूट हो जाते हैं। लेकिन देखा जाता है कि किसी न किसी में , किसी न किसी प्रकार की कमी आ जाती है और और रिश्ते दरकने शुरू हो जाते हैं। 

  आवश्यकता इस बात की है कि सभी रिश्तो को संभाल कर रखें और किसी भी तरह से न दरकने लगें और टूटन तक न पहुंचे । 

रिश्तो में हिमालय सी ऊंचाई और सागर सी गहराई है।

 सही में रिश्ते,  हमारे जीवन के आधार हैं।

लफ्जों के बरतने का सलीका जरूरी है--लघुकथा

 यूं तो कमल जेंटलमैन दिखाई देता था, पढ़ा लिखा था, नौकरी भी अच्छी थी लेकिन उसका लालन-पालन अच्छे परिवेश में नहीं हुआ था। अतः संस्कार भी उसी प्रकार के मिले थे।

 उसका बात करने का लहजा किसी को पसंद नहीं आता था।ऑफिस में भी अपने मातहत से "क्यों रे क्या कर रहा था" इस  लहजे में बात करता था। अपनी पत्नी को "तुम्हारे अंदर दिमाग भी है कि नहीं , मैंने तुमसे कहा था कि   ऐसे करना है और तुमने कैसे कर दिया, सारा गुड़ गोबर करके रख दिया, थोड़ा दिमाग का उपयोग किया करो"। बच्चों को भी इस कदर डांट लगाता था "खबरदार जो फिर से ऐसा किया , थप्पड़ मार-मार कर गाल लाल कर दूंगा"। उसके इस तरह से बात करने के सलीके से सभी परेशान थे,और यह तथ्य सही है कि परेशान व्यक्ति को वह सम्मान नहीं मिल सकता जो वह चाहता है।सभी कमल से   कन्नी काटते थे ।

  एक दिन मोहल्ले में एक आयोजन था।वहां पर कमल पहुंचा लेकिन किसी ने उसकी ओर ध्यान नहीं दिया, सभी ने उसको नजरअंदाज किया। कमल का मित्र रवि भी वहां मौजूद था। रवि उसके पास आया और उसको लेकर अन्य लोगों की तरफ गया।सबने रवि से तो बात की लेकिन कमल की ओर किसी ने ध्यान नहीं दिया , सबने उसे नजरअंदाज किया। रवि इस बात को भांप गया और कमल से कहा कि तुम्हें कुछ अजीब नहीं लग रहा,कोई भी तुमसे बात नहीं कर रहा है। तो कमल ने कहा कि हां मैं भी देख रहा हूं। मैं चाहता हूं कि लोग मुझसे बात करें लेकिन हर कोई मुझसे दूर होता जा रहा है।तब रवि ने उसको समझाया कि तुम नाम के ही नहीं वैसे भी कमल हो लेकिन तुम कीचड़ में फंसे हुए हो,इससे बाहर निकलोगे तो लोग तुम्हें पसंद करेंगे। जब कमल ने पूछा कि वह कैसे ? तो रवि ने समझाया कि तुम्हारे बात करने का सलीका बहुत गलत है। तुम यह सोचो कि इसी तरह सामने वाला तुमसे बात करेगा तो तुम्हें कैसा लगेगा। यदि तुम यह समझ लोगे तो तुम्हारे व्यवहार में परिवर्तन आ जाएगा।तुम सब से सम्मान से और इस तरह से बात करोगे कि सामने वाले को ठेस ना लगे तो तुम्हें भी सम्मान प्राप्त होगा और कोई भी नजरअंदाज नहीं करेगा।

 यह बात याद रखो कमल कि "लफ्जों के बरतने का सलीका जरूरी है।"

कमल को यह बात समझ में आ गई, और रवि को उसमें परिवर्तन के संकेत नजर आने लगे ।

मिट्टी का शहंशाह -लघु कथा

 हरसू गांव का एकलौता कुम्हार था। आस-पास के गांव में और कोई कुम्हार नहीं था,अतः इस के बनाए हुए मिट्टी के घड़े, दीपक आदि खूब बिकते थे।उसका परिवार हंसी-खुशी अपना जीवन यापन कर रहा था।पर यह हंसी-खुशी संपूर्ण नहीं थी।एक कमी थी जो उनको और उसकी पत्नी को बहुत खल रही थी। शादी को 10 वर्ष हो जाने के बावजूद भी उनको कोई औलाद नसीब नहीं हुई थी। बहुत हकीमों के चक्कर लगाए , मंदिरों में मन्नतें मांगी। आखिरकार सफलता मिली और उन्हें एक बच्चे की सौगात मिली। परिवार मैं खुशी का माहौल हो गया था।बच्चे का नाम मनकु रखा गया। उसे बहुत लाड-प्यार से पाला जा रहा था।धीरे-धीरे बच्चा बड़ा होता गया ,उसको उसके पिताजी के मटके, दिए बनाते देख बड़ा आश्चर्य होता था और वह भी उनके साथ काम करने का प्रयत्न करता।उसके कपड़े मिट्टी में सन जाते तो उसकी मां उसे बहुत डांटती , उसने मनकू ने सोचा कि कपड़े नहीं पहनूँगा तो डांट भी नहीं पड़ेगी और वह,वैसे ही,इसी अवस्था में पिता के काम में आनंद लेने लगा। वह अपने दोस्तों के साथ ऐसे ही,इसी अवस्था में, खेलने लगा । उसके दोस्त उसका मजाक करने लगे तो उसका स्वाभिमान जाग उठा और वह अपने दोस्तों को ललकारने लगा। दोस्त भी कम नहीं थे वे कहते तू क्या है हमारे सामने, चुप रह। तो उसने वहीं पास के मंदिर की सीढ़ियों पर कुछ ईटें जमाई और इस तरह से बैठ गया जैसे बादशाह हो। दोस्त हंसने लगे और पूछा ,अरे भैया तू है क्या यह तो बता ? तो उसने कहा कि रिश्ते में तो हम तुम्हारे बाप लगते हैं और- - ,बीच में ही बच्चे बोल उठे बस,बस रहने दे ज्यादा डायलॉग मत सुना। मनकु ने फ़िर कहा कि मैं ही बादशाह हूं और तुम्हारी फरियाद सुनना चाहता हूं। उसके आत्मविश्वास के सामने उसके दोस्तों को चुप होना पड़ा और वह खिल खिलाकर हंस पड़ा ,और बार-बार कहने लगा हम बादशाह हैं , हम बादशाह हैं । सच है कि किसी व्यक्ति के जीवन में आत्मविश्वास हो तो वह सफलता की ओर अग्रसर होगा ही होगा।

किताब चाय और अलाव --कविता

 जब जब भी मैं किताब पढ़ता हूं,

 साथ में चाय की प्याली मुझे बहुत भाती है।

 जब भी ऐसा होता है तब मैं किताब पढ़ता हूं, 

 और कभी किताब मुझे पढ़ाती हैं।


   लगातार जब मैं किताब पढ़ता हूं,

  तो बहुत जल्दी ऊब जाता हूं।

  उसी तरह लगातार चाय पीने से भी,

   पीता-पीता ऊब जाता हूं ।


 लेकिन जब दोनों का साथ मिल जाए,

   तो सोने में सुहागा हो जाता है।

   पढ़ने में मन भी लगता है,

 और याद भी होता जाता है। 


  कभी-कभी सर्दी के समय,

  अलाव का इंतजाम हो जाए।

 इन तीनों का साथ जब भी हो जाए,  

 तो समझो पढ़ने का मजा कैसा हो जाए।