शनिवार, 26 नवंबर 2022

जा गिरा खाई में--कविता

 वह दूध को पीता रहा ,

 मैं व्यस्त रहा मलाई में।

 दूसरों को सताने में जो मजा है,

 वैसा मजा कहां है भलाई में।


 मैं मलाई को चाटता रहा,

वह व्यस्त रहा दूध पिलाई में।

 पर दूध में वह मजा कहां,

    जो मजा है मलाई में।


 कुछ लोग बोतल में डूब जाते हैं,

 कुछ ढूंढते रहते हैं कुछ ढक्कन में, 

कोई छाछ को ही मुंह में लगाते हैं,

 कोई डुबकियाँ लगाते मक्खन में।


  हमारी तो फितरत ही अलग है,

 नजरें हमारी होती आसमान पर।

 हम भरे हुए थैले को नहीं देखते, 

 हमारी नजर तो होती है सामान पर।

 

 जब हम पूरे के पूरे साबुत खड़े हैं,

 फिर लोग क्या ढूंढते हैं हमारी परछाई में।

 जब अवगुणों की होती है यहां खूब पूजा,

 फिर क्या रखा है यहां अच्छाई में।


  दूसरों की चिंता हम क्यों करें ,

 हम तो अपने ही ख्वाबों में खोए रहते हैं,

 एक आंख से पापों की ओर देखकर,

 पुण्य की माला जपते रहते हैं।

 

 अब अपनों ने मुझे अकेला छोड़ दिया,

 मैं डूब गया घमंड की गहराई में।

 चलते-चलते खोया रहा तन्हाई में,

 सामने देखा नहीं जा गिरा मैं खाई में।

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