गुरुवार, 24 नवंबर 2022

शब्दों का जाल-- कविता


# शब्दों का जाल उलझा हुआ है।

 स्वरचित --

 सतीश गुप्ता पोरवाल,जयपुर। 


शब्द कोई साधारण नहीं,

 उनकी महिमा न्यारी है।

 कभी कांटों का जाल है ,

  कभी सुंदर फूलों की क्यारी है।

 शब्द बड़े चंचल हैं,शरारती हैं,

कभी मूक हैं तो कभी वाचाल हैं।

 कभी कर देते हैं शांत,

 कभी लाते भूचाल हैं।

 कभी इधर-उधर बिखर जाते हैं,

   इन्हें समेटना इतना आसान नहीं।

 कभी आसानी से वश में आ जाते हैं, 

 अपने ऊपर कोई गुमान नहीं।

  कभी शब्द इतने शरीफ होते हैं, 

 जिसमें  घोलना चाहो घुल जाते हैं। 

जिस सांचे में ढालना चाहो,

 उसी सांचे में ढल जाते हैं।

शब्दों से चाहो तो कहानी बना लो, 

 चाहो तो लेखों की सरिता बहा लो।

और बहुत ही सलीके से प्यार से,

 चाहो तो रसभरी कविता बना लो।

  शब्द बहुत ही सरल यदि समझा हुआ है,

  वरना शब्दों का जाल उलझा हुआ है।

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