#विषय : दिल के दर्द आंखों में0
# दिनांक 29/11/ 2022
स्वरचित--
सतीश गुप्ता पोरवाल
गमों के जख्मों को कैसे नासूर बनने दें,
लगता है दिल की चादर को चूहे कुतर आए हैं।
कितना ही संभाला हमने अपने आपको,
लेकिन दिल के दर्द आंखों में उतर आए हैं।
तुम्हें देखा तो सपने सुहाने होने लगे थे,
नीरस से जीवन में जीने के बहाने मिले थे।
रुकती हुई सांसों को जैसे जीवनदान मिला,
उजड़े हुए गुलशन में फूल फिर से खिले थे।
देखे थे हमने मिलकर ख्वाब महलों के,
बेरुखी से तेरे अब खण्डहर बने हैं।
जिन पत्थरों को हमने फूल सा समझा था,
वे अब खाने को ठोकर दर-दर बने हैं।
ख्वाबों की जो सरिता कल कल बहने लगी थी,
सोचा था तैरती नय्या से हम उतरेंगे किनारे।
सपने हमारे यूं ही चूर-चूर न होंगे,
चमकेंगे नभ में बनकर के सितारे।
विरह वेदना से दिल तड़प रहा है,
सूरज के गोले सा दिल दहक रहा है।
अब चाहे तो फिर से कर दे प्रणय निवेदन,
दिल का दर्द आंखों में सिसक रहा है।
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