स्वरचित--
सतीश गुप्ता पोरवाल
बाहर मैं मुस्कुराता हूं,
अंदर ही अंदर गम के नगमे गुनगुनाता हूं।
जीवन के सारे दुखड़े,
दिल में समां कर किसी को ना सुनाता हूं।
क्या हुआ जो जमाना जालिम है,
अपने आप को पत्थर सा बनाता हूं।
रात बीत गई बात बीत गई,
दिलों में प्रीत की छवि सजाता हूं।
हम तो खोना चाहते थे,
खुशीयों के मेलों में।
पर अंत में पड़ गए,
तन्हाई के झमेलों में।
कटे कटे से रहते हैं लोग,
बचे बचे से रहते हैं लोग।
ईश्वर भी न जाने ,
कहां से लगा इन्हें यह रोग।
अकेले ही अपने रास्ते पर जाता हूं,
बाहर मैं हर हाल में मुस्कुराता हूं।
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