स्वरचित --
सतीश गुप्ता 'पोरवाल'
चलते चलते थक गए हो ,
चलो थोड़ा सुस्ता लिया जाए ।
राहों में रुकावट आती हैं तो आएं,
दृढ़ निश्चय से इन्हें पार किया जाए।
आसमान पर नजर टिकाना ठीक नहीं,
नजर को जमीन पर उतार लिया जाए।
क्यों खिंचे-खिंचे रहते हो एक दूसरे से,
एक दूसरे के दिल में समा लिया जाए।
जमाने में जो भी लगे हमें अच्छा,
क्यूं ना उन्हें अपना लिया जाए।
यूं अनजान बनकर किसी भी राह पर चल दिए,
पहले मंजिल को समझ लिया जाए।
गम के फसाने बहुत सुन लिए,
चलो खुशी का तराना गुनगुनाया जाए।
गम तो साथ है ही,
क्यों न थोड़ा मुस्कुरा कर जिया जाए।
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