#मां शारदे काव्य मंच
#तीन दिवसीय आयोजन
स्वरचित -'
सतीश गुप्ता पोरवाल
अपने क्या अपने होते हैं ,
या फिर सिर्फ सपने होते हैं।
ढूंढते हैं हम अपनों में अपनापन,
पर मिलता है कभी परायापन।
खून के रिश्ते बने बनाए होते हैं,
उनमें कुछ अपने कुछ पराए होते हैं।
बनाए हुए रिश्ते भी अपने हो जाते हैं,
लगता है जैसे सपने सच हो जाते हैं।
हम तो यही कहते हैं कि,
सब को अपना बना दो।
कोई भी पराया न हो जग में,
खुद जियो और सबको जीने दो।
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