धनवान को ढूंढने निकला था इस जग में,
हर इंसान पर बेहिसाब कर्ज निकला।
किसी इंसान में इंसानियत नजर नहीं आई,
हर इंसान यहां खुदगर्ज निकला।(1)
नजाकत इतनी भरी पड़ी है,
कि कोमल कली को भी शरम आ जाए।
ज़रा जो झुके चरण स्पर्श को,
तो नाजुक कमर में लचक आ जाए।(2)
मिलता तो जरूर है चाहे आज या कल,
बहुत ही मीठा होता है मेरे भाई नेकी का फल।
करता जा इस जग में सभी का भला,
तभी तो होगा जग में तेरा जीवन सफल।(3)
इंसान ही कर सकता है ऐसी हरकत,
अलग-अलग होती है उसकी जरूरत।
गिरगिट को ही क्यों बदनाम किया जाए,
देख ली हमने इंसान की बदलती फितरत।(4)
कभी मन में भाव आते हैं कटी पतंग की तरह,
कविता बन आ जाते है नई उमंग की तरह ।
बस इतना ही काफी होता है,
कविता कागज पर उतर जाती है तरंग की तरह।(5)
होता है कभी-कभी आखिर इंसान ही तो है,
किसी छोटी सी बात से डर ही जाता है ।
यही डर उसको हिम्मत दिलाता है तो,
आगे बढ़कर डर से जीत जाता है।(6)
सर्द मौसम पिया घर तो आओ अभी ,
झूठे वादे करके न तड़पाओ कभी।
अभी नहीं तो आओ जब फुर्सत मिले तभी ,
कुछ बातें बतानी हैं जो हैं दिल में दबी।(7)
दो जून रोटी की खातिर सदा सफर में रहा,
इस तरह सदा ऊँचा अपनों की नजर में रहा।(8)
समय भी किस तरह ढा कहर रहा,
कब से भटकता मैं दर बदर रहा।(9)
प्यार के अफ़साने तो पुराने हुए,
लोग अब नफ़रतों के दीवाने हुए।
आ जाओ ना यार अब तो,
किसी से गले मिले ज़माने हुए।(10)
यह कागज की कश्ती कहीं तो जाकर रुकेगी,
या तो भंवर में फंसेगी या कहीं जाकर डूबेगी।
कितना भी इतरा ले इंसान इस जमाने में
एक दिन तो उसकी राख जमीं को चूमेगी। (11)
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