जरूरी नहीं कि विद्यालय पूर्ण रूप से साधन संपन्न हो । जरूरी यह है कि अध्यापक में अध्यापन के प्रति समर्पण हो और बच्चों में पढ़ने और आगे बढ़ने की ललक।
श्यामपुरा एक छोटा सा गांव । वहां के सरपंच ने जैसे तैसे प्रयत्न करके प्राथमिक विद्यालय के लिए स्वीकृति प्राप्त कर ली।विद्यालय के लिये वहां पर कोई भवन न था।एकमात्र अध्यापक की नियुक्ति गांव से ही की गई और अध्यापक महोदय खुले मैदान में ही हरियाली के बीच , पेड़ों की छांव में बच्चों को पढ़ाने लगे। बच्चे गिनती के ही थे लेकिन शुरुआत के लिए कम नहीं थे।मास्टर जी श्याम पट्ट पर लिखते हुए बच्चों को पढ़ाते और उनसे प्रश्न करके उत्तर प्राप्त करते।
गांव में कुछ शरारती बच्चे भी थे, जिनको पढ़ने में रुचि नहीं थी। वे वहीं मैदान में फुटबॉल खेलते रहते,हालांकि मास्टर जी ने उनके मां-बाप को बहुत समझाया कि बच्चों को पढ़ने भेजा जाए , लेकिन मां-बाप कहते थे- हमें क्या कमी है, हम खेती कर रहे हैं बच्चे भी खेती कर लेंगे और ठीक से जीवन यापन कर लेंगे।
बच्चे क्योंकि शरारती थे इसलिए जानबूझकर पास में ही फुटबॉल खेलते थे और फुटबाल पढ़ने वाले बच्चों की तरफ अक्सर आ जाती थी।
मास्टर जी ने उनको समझाया लेकिन वे नहीं माने।अंततः हुआ यह कि इन पढ़ने वाले बच्चों यानी कि छात्रों ने उन शरारती बच्चों की धुनाई कर दी और फिर उनको समझाया कि तुम पिटाई के ही काबिल हो।यदि तुम्हें वास्तव में काबिल बनना है तो तुम्हें पढ़ना चाहिए। दो-तीन बार पिटाई होने और समझाने के बाद, बच्चों को समझ में आया और फिर उन्होंने भी विद्यालय में प्रवेश ले लिया ,और सभी साथ साथ पढ़ने लगे।
गांव साक्षरता की ओर कदम बढ़ाने लगा।
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