सोमवार, 28 नवंबर 2022

नया शहर बसाते हैं-- कविता

 पहाड़ों से महानता समंदर से गहनता,

  गुफाओं से शांति जंगल से हरियाली चुराते हैं,

 चलो इक नया शहर बसाते हैं।


 मानव में मानवता बच्चों में चपलता,

 बिखरे हुए उसूलों को जमाते हैं,

  चलो इक नया शहर बसाते हैं।


 स्त्रियों का  संवरना पुरुषों का उम्दा  पहनना,

 सभी मनुष्यों को सभ्य बनाते हैं, 

 चलो इक नया शहर बसाते हैं। 


रिश्तो को महत्ता संबंधों में मधुरता, 

 संसार एक ऐसा बसाते हैं।

 चलो इक नया शहर बसाते हैं।


सौहार्द की भावना उन्नति की कामना,

 समानता की भावना जगाते हैं,

  चलो इक नया शहर बसाते हैं।

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