कितने कितने नाम गिनाऊं ,
किस-किस के किस्से तुम्हें सुनाऊं।
दांतो तले उंगली दबा ही लोगे,
कारनामे उनके जब तुम्हें बताऊं।
सत्य तराजू पर उन्हें बैठाऊं,
असत्य के माप पर उन्हें तुलाऊं।
दूर-दूर बैठे हैं छुप कर,
पास उन्हें मैं अपने बुलाऊं।
हम करें क्या तुम्हें अपनी हालत बयां,
हमने हर एक दर्द दबाया कहां-कहां।
मिल नहीं रहा मुकाम न जाने कहाँ खो गया ।
कोई तो है जो आकर राह में काँटे बो गया।
कब से हूं प्रयासरत मुकाम पा जाने को।
लेकिन लगता है जैसे भाग्य ही मेरा सो गया।
स्वरचित- सतीश गुप्ता'पोरवाल',जयपुर।
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