मंगलवार, 8 नवंबर 2022

नया सवेरा-- कहानी



स्वरचित-'

 सतीश गुप्ता पोरवाल ,जयपुर। 


गायत्री का जन्म एक निम्न मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। विवाह योग्य उम्र हो जाने पर,उसका विवाह, ऐसे ही एक परिवार में, उमेश से हो गया था। उमेश एक कंपनी में साधारण सी नौकरी में था।जैसे तैसे परिवार का जीवन यापन हो रहा था। कालांतर में उनके दो बच्चे हो गए थे,जिनको सरकारी स्कूल में पढ़ा रहे थे। गायत्री दिनभर घर का दैनिक कार्य करती और उमेश दिनभर कंपनी की नौकरी करके थका हारा घर पर आता और लगभग आराम ही करता रहता। उमेश को मालूम था कि गायत्री सुबह उसके उठने से पहले ही बिस्तर छोड़ देती थी और दिन भर काम करती हुई रात को बिस्तर पर देरी से ही आती थी। लेकिन वह यही सोचता था कि इसमें मैं क्या कर सकता हूं ।

  एक बार हुआ यह कि अगले दिन 'बासोड़ा' का त्यौहार था जिसमें एक दिन पहले ही खाना बना कर तैयार रखना पड़ता है। उमेश के काम से वापस आने के बाद सब कुछ वैसा नहीं हुआ जैसे हमेशा होता था।रात को 10:00 बजे के बाद भी जब गायत्री शयन कक्ष में सोने के लिए नहीं आई तो उमेश ने सोचा कि थोड़ी देर में आ जाएगी और वह सो गया। एक घंटे बाद उसकी नींद खुली और उसने देखा कि 11:00 बज गए हैं और अभी तक नहीं आई। बिजली जा चुकी थी और घर में अंधेरा हो रहा था, उसे यह देखकर और आश्चर्य हुआ कि गायत्री अभी तक नहीं आई उसने सोचा कि आखिर ऐसे अंधेरे में वह कर क्या रही है।उसने अपने मोबाइल की टॉर्च से रोशनी की और रसोईघर में जाकर देखा कि गायत्री आटा गूंध रही है और चूल्हे पर पतीले में सब्जी बन रही है। वह पतीले में चम्मच चलाने लगा। गायत्री ने उसे देखा और आश्चर्य से कहा ,अरे आप सोए नहीं ? उमेश ने भरे दिल से कहा - मेरी नींद एक घंटे में ही खुल गई , शायद मुझे यह दिखाने के लिये कि तुम सुबह से रात तक कितना काम करती हो ,धन्य हो गायत्री तुम ।मुझे लगता है कि मुझे भी तुम्हारे काम में हाथ बटाना चाहिए। गायत्री को लगा कि उमेश के दिल की रोशनी टॉर्च के माध्यम से उसके पास पहुंच रही है।उसने खिड़की से बाहर देखा -चांद पर से बादल का टुकड़ा हट चुका था और चांदनी पूरे शबाब से रसोई घर में प्रवेश करने लगी थी।

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