बुधवार, 31 मई 2023

पूनम का चांद-- लघुकथा

 यामिनी डाइनिंग टेबल पर बैठी हुई रितेश का इंतजार कर रही थी। 'डिनर' का समय था और रितेश था कि 'ऑफिस' की किसी 'फाइल' में उलझा हुआ था। यामिनी सोच रही थी कि रितेश आए तो 'किचन' से भोजन लेकर आए और 'डिनर' करके , बाकी कार्य निपटा कर सोने की तैयारी करे । सहसा घर की 'लाइट' 'चली' गई लेकिन वहां पूर्ण रूप से अंधेरा नहीं हुआ। ऐसा लग रहा था जैसे वहां कोई 'नाइट लैंप' जल रहा हो । यामिनी ने पीछे मुड़ कर, खिड़की की तरफ देखा तो पूनम का चांद नजर आया। बाहर बगीचे में फूलों के पौधों में विशेष चमक आ रही थी। वह सोचने लगी कि यह चांदनी का ही असर है, चांद की चांदनी कितनी शीतल और सुंदरता प्रदान करने वाली होती है । रितेश अपना काम निपटा कर वहां पहुंचा और यामिनी का चेहरा देखा तो देखता ही रह गया। उसके चेहरे पर चाँदनी की वज़ह से अलग ही चमक आ गई थी । उसने यामिनी को कहा "देखो आज तुम्हारा चेहरा वैसा ही लग रहा है जैसे कुछ वर्षों पूर्व था। मालूम नहीं क्यों तुम्हारे चेहरे की चमक फीकी हो गई। यामिनी ने कहा "घर की जिम्मेदारी और बच्चों की परवरिश ज्यादा जरूरी है ,चेहरे की चमक से ।अब बच्चे बड़े हो चुके हैं , घर की जिम्मेदारी भी धीरे-धीरे कम होती जा रही है तो देखना मेरे चेहरे की चमक तुम्हें ऐसी ही और वैसी ही देखने को मिलेगी जैसे पहले थी।  दोनों के चेहरों पर हल्की सी मुस्कुराहट तैर गई।


MSA (wa)

सोमवार, 29 मई 2023

भोजन दान- लघुकथा

 मोहनलाल जी बहुत ही धार्मिक प्रवृत्ति के थे।अपनी आय में से एक हिस्सा मंदिर में दान किया करते थे। एक दिन जब वे अपनी कार से जा रहे थे तो चौराहे पर थोड़ी देर के लिए गाड़ी रुकी तो एक स्त्री रोती हुई उनके पास आकर कहने लगी कि उनके बच्चे भूखे हैं ,खाने को कुछ भी नहीं है। कुछ पैसा दे दो या फिर खाने के लिए कुछ।  मोहनलाल जी ने कार एक तरफ खड़ी की और उतर कर जा कर देखा तो वास्तव में वहां खाने को कुछ भी नहीं था और बच्चे रो रहे थे ।उन्हें बड़ा तरस आया।  उन्होंने सोचा कि मैं मंदिर में हमेशा दान दिया करता हूं ।मंदिर छोटा हो या बड़ा ,भगवान की मूर्ति छोटी हो या बड़ी ,उससे क्या फर्क पड़ेगा।लेकिन यदि वह  पैसा मानव सेवा में लगाऊंगा तो यह भी पुण्य का कार्य होगा, और यह वक्त की जरूरत भी है। उन्होंने उस परिवार के लिए खाने की व्यवस्था की और फिर एक संस्था बनाकर मंदिर में दान देने वाला पैसा गरीबों के भोजन के लिए लगाना शुरू किया ।वे जानते थे कि किसी भी व्यक्ति की सबसे पहली जरूरत भोजन ही है। कुछ और लोगों से उन्होंने साथ में जोड़ा।  अपने मित्रों को भी अलग-अलग क्षेत्र में ऐसी संस्था बनाकर गरीबों को भोजन उपलब्ध कराने की योजना बनाकर  उस पर अमल करना शुरू कर दिया ।मोहन लाल जी को लगा कि इस कार्य में उन को ज्यादा संतुष्टि मिल रही है। 


Mskm

न हों निराश ' कविता

 नर  हो न निराश करो मन को अचल,

करके अचल दे दो अपने मन को अतिशय बल। 

 निराश होने के कारण तो मिल जाएंगे कई,

पर अपने मन में भर लो आशाऐं नई।

माना कि दुनिया में पग-पग पर कांटे हैं,

 लेकिन विधाता ने फूल भी तो बांटे हैं। 

 अपनी ही नहीं सयानों की बात भी सुन लो, 

  समंदर किनारे सीप ही नहीं मोती भी चुन लो।

 ऊपर वाला है हम सभी का खेवनहार, 

  वह नहीं होने देगा किसी की भी हार।


Kalkkj

शनिवार, 27 मई 2023

कवि होना सौभाग्य - कविता

 आत्मा के सौंदर्य का शुद्ध रूप है काव्य,

 मानव होना भाग्य है कवि होना सौभाग्य।

कवि हृदय में भावनाओं का सागर हिलोरे लेता है,

लहर की तरह भाव नाना तरह के संदेश देता है।   

 जैसे सुंदर फूल चुनकर मनभावन माला बनाई जाती है,

 धागों जैसे शब्दों को चुन कर कविता की चुनरी बुनी जाती है।

 कवि हृदय व्यक्ति कभी भावना शून्य नहीं हो सकता,

 वह कभी भावनाओं के जाल से मुक्त नहीं हो सकता।

 कवि समुद्र की गहराई में जाकर मोती चुन कर ला सकता है,

 और पर्वत की ऊंचाइयों पर जाकर  संजीवनी  ला सकता है। 

 हृदय की गहराइयों से ऐसे भाव उत्पन्न होते हैं,

 मां की कोख से जैसे शिशु जन्म लेते हैं। 

शुद्ध काव्य आत्मा के अंतर तल से आकार लेता है 

 श्रोताओं को एक अनोखा, मनभावन उपहार देता है।

असंख्य जीव हैं इस दुनिया में कोई लघु कोई जैष्ठ है,

अंततः यही कि मानव होना बेहतर है पर कवि होना श्रेष्ठ है। 



Ckkk

पत्नि की मार- हास्य कविता

 क्या बताऊं यारो मैं पत्नी की मार सह लेता हूं, 

उसके सामने बिल्ली की तरह म्याऊं कर लेता हूं।

 उसको तो कुछ कहने की हिम्मत ही नहीं है,

 जो कुछ कहना है अपने आप से कह लेता हूं।

 क्या बताऊं कैसी बीबी मेरे पल्ले पड़ी है,

 बात बात पर अपनी ही बात पर अड़ी है। 

  गुस्से में जब कर्कश वाणी में वह जब भी बोले  

 लगता है जैसे मेरी पीठ पर छड़ी पड़ी है।

 मेरी जीवन नैया की वही है खेवनहार,

  दिन में करता हूं उसे प्रणाम बारम्बार।

 हो जाए जो कभी बहस हम दोनों के मध्य,

 तो मैं कहता हूं तुम जीती और मैं गया हार।

 एक बात बताऊं तुमको मेरी सुनते जाओ,

 खुद ही समझो पत्नी को कभी न समझाओ।

  जिंदगी की गाड़ी चलानी हो जो सरपट 

  तो बीवी संग जीवन सरिता में बहते जाओ। 

आज़मा लो-- कविता

 ग़र घर नहीं है काफी तो सारा जहां लो,

यह जमीं ही नहीं, चाहो तो आसमां लो। 

यकीं करो मेरी बातों का ए जानेमन,

 बस एक बार तो मुझे, मौत से पहले आज़मा  लो। 

समंदर की गहराई जितना है मुझे प्यार,

पर्वत की ऊंचाई जितना है मुझे प्यार।

 यह बात समझ कर अपने आप को समझा लो,

बस एक बार तो मुझे मौत से पहले आज़मा लो।

कुछ मैंने कुछ तुमने अपने किस्से सुनाये,

मिलकर हमने प्यार के नगमें गुनगुनाये।

  मेरी नादाननियों को यूं न दिल से लगा लो, 

 बस एक बार तो मुझे मौत से पहले आज़मा लो।

 दिल में बहुत बेचैनियां भरी पड़ी हैं,

 प्यार की राह में रुकावट अड़ी पड़ी हैं।

 उलझी हुई हर पहेली को अब तो सुलझा लो,

 बस एक बार तो मुझे मौत से पहले आज़मा लो।


Mssa

शुक्रवार, 26 मई 2023

कच्चा प्यार- लघुकथा

 कामिनी और बृजेश न केवल पड़ोसी थे बल्कि दोनों एक ही स्कूल और एक ही क्लास में पढ़ते थे।  दोनों साथ जाते और स्कूल से वापस ही साथी आते । शाम को, और बच्चों के साथ कुछ समय  के लिए खेलते । वर्ष बीतते गए और बृजेश के पिताजी का तबादला दूसरे शहर में हो गया।  इस तरह दोनों के कॉलेज बदल गए थे।  कॉलेज की शिक्षा के बाद दोनों की नौकरी एक ही शहर में लग गई और अचानक एक दिन,इन दोनों की मुलाकात हुई । पुरानी निकटता धीरे-धीरे प्यार में बदलती गई। दोनों घंटों बातें करते रहते , यहां वहां घूमते हुए प्यार में डूबते गए। एक दिन अचानक कामिनी का एक्सीडेंट हुआ जिसमें उसका एक पैर बुरी तरह से घायल हो गया और अंत में उसके पैर को काटना ही पड़ा। बृजेश उससे मिलता और अल्प समय में ही वापस चला जाता। धीरे-धीरे बृजेश कामिनी से दूरी बनाने लगा। कामिनी को बुरा लगता था और वह उसे उलाहना देती लेकिन बृजेश था कि दूरी लगातार बढ़ाता रहा ।

 बृजेश को कामिनी से मिले हुए लगभग एक महीना हो गया था।  अचानक एक दिन,एक शोरूम में कामिनी ने देखा कि वहां बृजेश भी मौजूद है। वह बृजेश के पास गई और उसको बोला कि आखिर वह उससे दूर क्यों होता जा रहा है ? क्या मेरे प्यार में कमी आ गई है ? बृजेश कुछ देर चुप रहा फिर बोला कि मेरा संबंध एक अच्छी लड़की से हो गया है और अगले माह उससे शादी की वज़ह से मैं व्यस्त हूं। 

 कामिनी को ऐसी आशा नहीं थी । वह फट पड़ी "मैं समझती हूं जब से मेरा पैर कटा है, तुम मुझसे दूर होते गए। क्या ऐसा ही प्यार किया था तुमने मुझसे ? प्यार वह होता है जो मजबूरी में भी सहारा बने। लेकिन ऐसे समय में , ऐसी स्थिति में तुमने दूर होना ही ठीक समझा।  बृजेश , मैं जान गई हूं तुम्हें मुझसे सच्चा प्यार नहीं था । वास्तव में कच्चा प्यार था। जो इधर से उधर झुक जाए उसे सच्चा प्यार नहीं कहा जा सकता, इसे कच्चा प्यार ही कहा जाएग। ठीक है तुम नहीं मिलोगे तो क्या  , मैं अपना जीवन अपने हिसाब से जी लूंगी। कामिनी दृढ़ निश्चय के साथ वहां से चल दी। 



Mskm

मुलाकात हुई तो- कविता

 सुख और चैन कहीं खो गए थे हमारे,

 खामोशी की चादर ओढ़े बैठे थे नजारे,

 जब उनसे मुलाकात हुई तो, 

  गीत गुनगुनाने लगी बहारें।

 झुकी नजरों से जब उसने देखा हमें,

  क्या हुआ था हमें कैसे कहें, 

 दिल की बगिया में जैसे फूल खिले,

  नदिया की धार में जैसे ग़म बहे।

  घूम रहे थे जैसे भंवरा आवारा,

 किसी फूल पर दिल नहीं आता था हमारा।

 देखा जब पहली ही बार तुम्हें,

  यह दिल तो हो गया बस तुम्हारा।

तुम्हारी नजर हम पर इनायत हो जाए 

 हमारे दिल की कलि फूल बन जाए।

 इंतज़ार न करा हमें इतना,

 अब तो इन्तज़ार सहा न जाए।

रविवार, 21 मई 2023

शाम और तन्हाई-- कविता

 एक शाम तन्हाई भरी, फिर तुम्हारा साथ,

 तराने प्यार के गुनगुनाते हम साथ-साथ।

  ना होगी कोई भी शिकायत इस जमाने से,

 तशरीफ़ रखो,मिला लो मेरे हाथ से हाथ। 


 हर शाम तुम्हारी याद मेरी हमसफर होती है,

 मेरी हर डगर तुम्हारी ही तरफ होती है।

 याद भी ना करूं तुम्हें,ऐसा तो हो नहीं सकता,

 हर शाम मेरे दिल में यादों की ग़ज़ल होती है। 


 कितनी खुशनुमा है यह शाम तेरे आने से, 

 खत्म हुई तन्हाई ,जो थी एक जमाने से।

 बस इतना समझ ले ऐ मेरे दिलबर, 

  तू मेरे लिए कम नहीं किसी खजाने से।


nkkd

शनिवार, 20 मई 2023

ओस और प्यास- कविता

 अपने दिल को हम समझाते रहे, 

उसको देख बस मुस्कुराते रहे।

 मालूम था हमें वह हमारी नहीं,

हम ओस से प्यास बुझाते रहे।

 उसका नजर आना ही सुकून देता था,

 कोरे खत में जैसे मजमून देता था। 

चांद हमें मिले ना मिले,

 पर वह चांदनी जरूर देता था।

 लगता है जैसे तकदीर संवर जाती है,

 देख कर उसको थकान उतर जाती है।

 नासाज हो चाहे कितनी भी 

 तबीयत हमारी सुधर जाती है। 

क्यों करें हम शिकवा किसी से,

शिकायत करें क्यों हर किसी से। 

ग़र हमें जब करनी ही होगी,

तो शिकायत करेंगे बस उसी से। 

शुक्रवार, 19 मई 2023

कुर्सी के चक्कर- हास्य कविता

दैया रे दैया कुर्सी के चक्कर अजब हैं भैया, गजब हैं भैया। 

 कुर्सी के खूब फेरे लगाते , जैसे तैसे कुर्सी हथियाते, बैठ कुर्सी पर शेर बन जाते, जब आ जाते चुनाव - तो बन जाते गैया, दैया रे दैया,कुर्सी के चक्कर अजब हैं भैया गजब हैं भैया। 

  कुर्सी जब मिल जाए, खुद पावरफुल बन जाए, नोटों के बंडल खूब बनाते, हर रोज ही दिवाली मनाते ,जब आ जाते चुनाव-तो खूब बांटते रुपैया, दैया रे दैया,कुर्सी के चक्कर अजब हैं भैया गजब हैं भैया। 

 पढ़-पढ़ कर भाषण देते, खुद अपने भाषण नहीं लिख पाते,  पढ़ने को किसी और से लिखवाते , जब आ जाएं चुनाव - खूब सुनाते कविता ,दोहा ,गीत और सवैया । दैया रे दैया ,कुर्सी के चक्कर अजब हैं भैया, गजब हैं भैया। 

 कोई भी गीत कभी न गाया, कितना भी कहा कभी न सुनाया,  जब आ जाए चुनाव- तो बन जाएं गवैया।  दैया रे दैया,कुर्सी के चक्कर अजब हैं भैया,  गजब हैं भैया। 

नेता बन कर खूब इतराये ,जो न किया वो खूब सुनाये, चमचों को तो खूब नचाये , जब आ जाएं चुनाव- खुद बन जाए नचैया  , दैया रे दैया,  कुर्सी  के चक्कर अजब हैं भैया, गजब हैं भैया। 

रैली कर करके खूब रिझाया,जनता को तो लॉलीपॉप दिखाया, जब मिल जाए कुर्सी,जनता को बंदर बना, बन जाए डमरु बजेय्या ।

दैया रे दैया ,कुर्सी के चक्कर अजब हैं भैया ,गजब हैं भैया। 

कुर्सी ही उनकी दुनियां ,कुर्सी ही उनकी मुनियां, जब मिल जाये कुर्सी तो भाड़ में जाये दुनियाँ। 

कुर्सी पर चढ़कर करते ता ता थय्यां,

 दय्या  रे दय्या  कुर्सी के चक्कर अजब हैं भैया, ग़ज़ब हैं भय्या। 


एक आह- कविता

 रोज एक आह सी उठती है। 


जमाने भर के गम उठाता कब तक फिरूँ, 

शिकायत करूं भी तो आखिर किससे करूं। 

 औरों की तरह मैंने भी खुशी मांगी थी जमाने से,

 लेकिन ज़माना तो बाज नहीं आया मुझे हराने से।

आखिर कब तक लड़ता रहूंगा मैं अपने आप से ही,

 जो कुछ कहना था मुझे वह बात अब तक नहीं कही।

 मेरे सांसों की सरसराहट क्या कभी तुमने सुनी,

 मेरी राह अलग और तुमने अलग राह चुनी।

 अब तो दिल में रोज एक आह सी उठती है, 

 मेरे कानों में चुपके से बस एक बात कहती है। 

 भूल जा जो हुआ,कब तक सीने से लगाए रखेगा,

 नई राह , नया सपना तेरे लिए  नई दुनिया रचेगा।


(MSA)

गुरुवार, 18 मई 2023

ढलती शाम..-- कविता

 ढलती शाम में क्या सब कुछ ढ़ल जाता है,

मानव का जो स्वभाव है क्या वह बदल जाता है।

 सूरज सवेरे आता है शाम को चला जाता है,

 लेकिन सच है कि वही सूरज अगली सुबह फिर आता है।

माना की उम्र रुकती नहीं बढ़ती ही जाती है,

 कमर परिवार और उम्र के बोझ से झुकती ही जाती है। 

 जीवन में जिंदगी भर हम बहुत कुछ कर जाते हैं,

  करते करते ढलती उम्र में थक भी जाते हैं।

  लेकिन उम्र का यही पड़ाव हमें संदेश देता है,

 आशा का कमल तो हर उम्र में खिल सकता है।

  करना चाहते थे हर कोई बहुत कुछ जिंदगी में, 

 लेकिन उम्र निकल जाती है परिवार की बंदगी में।

 इससे पहले कि जिंदगी हमें दे जाए अंततः धोखा, 

 पकड़ लो इस अवसर को समझकर सुनहरा मौका। 

बुधवार, 17 मई 2023

आख़िरी खत- कविता

 वह आखिरी खत जो मैंने तुम्हें लिखना चाहा,

 पर क्या बताऊं सच तो यह है कि मैं लिख नहीं पाया। 

 बहुत कोशिश की मैंने कि आखिर कुछ तो लिखूं, 

लेकिन फिर सच तो यह है की भाव ही नहीं जगा पाया। 

 जानता हूं कि  खत का ज़माना बहुत पुराना है,

 इस जमाने में आखिर खत कौन लिखता है।

 लेकिन मैंने तुम्हें इस ज़माने में भी  लिखे,

 क्योंकि खत में मेरा प्रेम शब्दों के जाल बुनता है। 

 मेरे जीवन में बहार बन कर  जब से तू आई थी,

 मेरा जीवन  एक उपवन सा खिल गया था।

एक अरसे से सुषुप्त से पड़े हुए मेरे मन को, 

 अचानक से जैसे जीवनदान मिल गया था। 

  बहुत सपने देखे थे हम दोनों ने मिलकर, 

 सोचा था आखिरी खत मे उन्हें उकेर दूंगा। 

 प्रणय निवेदन अब फिर करने का कोई भाव नहीं,

 उस आखिरी खत को बड़े जतन से कहीं सुरक्षित रख दूंगा


मंगलवार, 16 मई 2023

जुदा मत होना- कविता

 एक पल को भी तू मुझसे जुदा मत होना,

 खुदा कसम तू मुझसे कभी खफा मत होना। 

 दिल की गहराइयों से चाहा है हमने तुम्हें,

 बड़ी मुद्दतों के बाद पाया है हमने तुम्हें।

 तुम्हारे आने  भर से दिल की बगिया खिल जाती थी,

 जैसे दुनिया भर की खुशियां हमको मिल जाती थी। 

  अब क्या हमारी जानम हमसे रूठ गई,

  प्यार की कड़ी जो जोड़ी थी वह टूट गई।

   हम तो दिल के घर से बेघर हो गये थे,

   अपने आप से ही बेखबर हो गये थे।  

  जुदा मत होना तू कि मैं टूट जाऊंगा,

   अपने आप ही से मैं रूठ जाऊंगा।

  मेरे ख्यालों के समंदर में तेरी ही कश्ती है,

   मुझे तो बस तू , बस तू ही जचती है।

सोमवार, 15 मई 2023

मूर्ति की कराह -कहानी (संशोधित/संक्षेप)

 #चेतना किस्से कहानियां कविताएं 

#पाक्षिक कहानी लेखन

#हॉरर 

पिताजी को सुबह की फ्लाइट से बंगलुरू जाना था, सामान का वजन देखने के लिये नेहा और रोहन स्टोर से तुला लाने स्टोर की ओर गए। उस समय क्योंकि बिजली नहीं थी , स्टोर से टॉर्च की रोशनी में  तुला उठाकर घूमे ही थे कि कोहनी की टक्कर से वहां टेबल पर रखी एक मूर्ति नीचे गिर पड़ी। दरवाजे का ताला लगाते ही उन्हें कराहने की आवाज सुनाई दी। नेहा बोली "सुना तुमने, यह कौन कराह रहा है"? रोहन  बोला "अरे,यह आवाज़ तो अंदर से आ रही है। डर के मारे दोनों की घिग्घि बंध गई।


 इतने में तेज "म्याऊँ" की तेज आवाज सुनाई दी ,दोनों ने पलट कर टॉर्च की रोशनी में उस ओर देखा तो एक बिल्ली चमकती आंखों से उनकी ओर देख रही थी, उनका डर और बढ़ गया, फिर बिल्ली अपने पंजों के बल बैठकर उठने लगी। ऐसा लगा जैसे वह उन पर  कूदेगी।अब तो दोनों की चीख निकल गई और दौड़ कर कमरे की ओर भागे। उन्होंने देखा कि वही बिल्ली दरवाजे उन पर कूदने वाली स्थिति में बैठी है। बिल्ली ने दोनों को घूर कर देखा और जोर से म्याऊँ बोल कर चली गई। 

माता-पिता के घर से जाने के बाद उन्होंने सोने की कोशिश की लेकिन नाकामयाब रहे। अगले दिन  रात के दूसरे पहर उसी समय फिर कराहने की आवाज आई। रोहन को अब तो रोज ही रात के दूसरे पहर उस दरवाजे के पीछे से कोई आहट सी सुनाई देने लगी तो वह सोचने के लिए मजबूर हो गया,कि पिताजी के आने के बाद किसी तांत्रिक से मिलेंगे। 


स्वरचित--सतीश गुप्ता पोरवाल,जयपुर।

रविवार, 14 मई 2023

मूर्ति की कराह - कहानी

 रोहन और नेहा ने माताजी और पिताजी का सारा सामन पैक करवा दिया था। वे अल सुबह 5:00 बजे की फ्लाइट से बेंगलुरु जाने वाले थे,  तो सुबह 3:00 बजे ही घर से निकलना था।  सामान पैक करने के बाद उन्हें तौलना भी जरूरी था ताकि  वजन निर्धारित सीमा से ज्यादा न हो।  

ऐसे सामान जो यदा-कदा ही काम आते थे वे दालान के एक कोने में एक छोटे से कमरे में डाल दिए थे, जिसे स्टोर का नाम दिया गया था। रोहन और नेहा स्टोर से तुला लाने स्टोर की ओर गए। उस समय क्योंकि बिजली नहीं थी ,टॉर्च की रोशनी में वहां पहुंचे, ताला खोला और अंदर से तुला उठाकर घूमे ही थे कि कोहनी की टक्कर से वहां टेबल पर रखी एक मूर्ति नीचे गिर पड़ी। दोनों  ने पलट कर देखा तो उसकी एक टांग टूट चुकी थी लेकिन जल्दी में वे तुरंत निकले।  दरवाजा का ताला लगाते ही उन्हें कराहने की आवाज सुनाई दी।  दोनों ने एक दूसरे की ओर देखा ओर नेहा बोली "सुना तुमने, यह कौन कराह रहा है"? रोहन ने इधर-उधर देखा और अंत में दरवाजे पर कान लगाकर कर बोलो "अरे,यह आवाज़ तो अंदर से आ रही है। डर के मारे दोनों की घिग्घि बंध गई।

 इतने में तेज "म्याऊँ" की तेज आवाज सुनाई दी ,दोनों ने पलट कर टॉर्च की रोशनी में उस ओर देखा तो एक बिल्ली चमकती आंखों से उनकी ओर देख रही थी, उनका डर और बढ़ गया, फिर बिल्ली अपने पंजों के बल बैठकर उठने लगी। ऐसा लगा जैसे वह उन पर  कूदेगी।अब तो दोनों की चीख निकल गई और दौड़ कर कमरे की ओर भागे। उन्होंने देखा कि वही बिल्ली दरवाजे उन पर कूदने वाली स्थिति में बैठी है। बिल्ली ने दोनों को घूर कर देखा और जोर से म्याऊँ बोल कर चली गई। 

माता-पिता के घर से जाने के बाद उन्होंने सोने की कोशिश की लेकिन नाकामयाब रहे। अगले दिन  रात के दूसरे पहर उसी समय फिर कराहने की आवाज आई। 

 दोनों ने थोड़ी हिम्मत की और बाहर आए, उन्होंने देखा कि यह आवाज़ तो स्टोर रूम से ही आ रही है,  दोनों डर कर वापस आए तो देखा कमरे के दरवाजे पर बिल्ली बैठी है, वे और डर गये। बिल्ली के जाने के बाद उन्होंने सोने की कोशिश की लेकिन कामयाब नहीं हुए। तीन दिन के बाद पिताजी वापस आ गए, तब उनको सारी बात बताई तो उन्होंने कहा कि निश्चित रूप से वह आवाज मूर्ति की ही है,  वह मूर्ति एक तांत्रिक ने उनको दी थी लेकिन उन्होंने बेकार समझते हुए स्टोर रूम में रख दी थी। सारा वाकया सुनने के बाद उन्होंने निश्चय किया कि उसी तांत्रिक से मिलकर इस समस्या का निराकरण कराया जाएगा। 

शनिवार, 13 मई 2023

मधुशाला-- कविता

 गमों के बोझ तले दबकर जीवन बोझिल कर डाला 

 इधर-उधर कहां भटक रहा,राह जोहती मधुशाला।

 दुनिया में सुख और दुख दोनों ही मिलते हैं,

  किसी को कांटे तो किसी को फूल मिलते हैं। 

 जज्बातों की आंधी ले जाती है कहीं उड़ा कर,

  खुद हंसती है तुम्हें दोराहे पर खड़ा कर। 

  घुप्प अंधेरे से बाहर निकल फैल रहा उजाला, 

  इधर-उधर कहां भटक रहा,राह जोहती मधुशाला।

भ्रमजाल-- कविता

 दिग्भ्रमित मनुष्य कहां जा रहा है,

 नजर कुछ आता नहीं, बस चला जा रहा है।

 नजर नजर का फेर है, दुनिया जानती है,

 पर भ्रष्ट बुद्धि यह कहां मानती है।

 दृढ़ निश्चय हो फिर चिंतन मनन भी हो,

 कुछ अच्छा करने को फिर मन भी हो। 

आधुनिकता को ही जिसने मन में ओढ़ लिया,

 संस्कारों को तो उसने झकझोर दिया।

 वह क्या जाने क्या होती है दुनियादारी,

 वह तो निभा भी नहीं पाता अपनों से रिश्तेदारी। 

अब तो समझ जा,भ्रमजाल को तोड़ दे,

 जिस गलत राह पर जा रहा, उसे मोड़ दे।

शुक्रवार, 12 मई 2023

मेरी खाऊ रानी- पेरोडी

 मेरी खाऊ रानी कितना खाएगी तू ,

 कब तक प्लेट सजाएगी तू ,

 ये तो बता कब ब्रेक लगायेगी तू ,

 रुक जा तू रुक जा । रुक जा तू रुक जा ।


 चाऊमीन खाके , चाट पकौड़ी खूब दबाके ,

 गोलगप्पे तो 10-20 डकारे ,

ये तो बता सांस कब लेगी तू ,

 मेरी खाऊ रानी कितना खाएगी तू, 

कब तक प्लेट सजाएगी तू ,

ये तो बता कब ब्रेक  लगाएगी तू  ,रुक जा  तू रुक जा । 


काजू कतली  , प्लेट में भर ली,

 नजर  इनायत हलवे पे कर ली

 दंगल मे कूद कर, , रोटी  भर ली  

अब तो बता  कब थक जाएगी तू ,

मेरी खाऊ - -, 


गुरुवार, 11 मई 2023

यादों का कर्ज - कविता

 समंदर की लहरों का कारवां कभी रुकता नहीं ,

पर्वत श्रृंखला का मस्तक कभी झुकता नहीं।

 यादों का कर्ज तो ऐसा कर्ज है, 

 कितना भी चुकाओ कभी चुकता नहीं।

 जिंदगी में कुछ लम्हे ऐसे आते ही हैं 

 दिल कितना भी संगदिल हो रुला ही जाते हैं।

 यादों के ऐसे ही कितने ही लम्हे, 

 रह रह कर दिल पर कहर ढाते हैं।

  पास आने की गुजारिश की पर नहीं आए तुम, 

   भुलाने की कोशिश की पर भुला न पाये हम। 

  प्यार की इबारत लिखी तुमने खतों में 

  उन खतों से दर्द की स्याही मिटा न पाये हम। 

इश्क की रूहानियत -मुक्तक

  इश्क की रुहानियत की वे बात करते हैं ,

  बिन बादल ही वे बरसात करते हैं। 

 अश्क जिनकी आंखों में करते हैं बसर, 

 उनसे वह मुस्कुराने की बात करते हैं।

राह से गुजर गये एक नजर देखा नहीं,

जरिये खतों के के ही मुलाकात करते हैं। 

 दिल में जिसके प्यार की एक बूंद तक नहीं,

  हमसे दिल लगाने की बात करते हैं।

शादी के लड्डू- हास्य कविता

 सुन भाई मुन्ना, बबलू और गुड्डू,

 क्या तुमने भी खाये शादी के लड्डू।

 मैंने तो सुना है कि 

  ये लड्डू जिसने भी खाये,

  वे अपने जीवन में जरूर पछताये।  

  और जिसने नहीं खाये वे भी पछताये।

   यदि अभी तक नहीं खाया तो,

   मेरी बात मानकर सावधान हो जाओ 

  और यदि खा लिया है तो  

  पत्नी के सामने नादान हो जाओ।

नहीं पड़े जो तुम जो शादी के जतन में, 

पंछी बन उड़ते फिरो मस्त गगन में।

 शादी कर ली तो होती रहेगी बीबी से खटपट 

 बच्चे भी दिन प्रतिदिन पैदा करते रहेंगे  झंझट।

   हमसे तो रहा नहीं गया और खा लिया,

 इस लड्डू ने तो बड़ी मुसीबत में डाल दिया।

 या तो आजादी से जीवन जीने की करो कामना,

या फिर शादी का लड्डू खाकर करो मुसीबतों से सामना।

 बीबी तुम्हारी कभी कपड़े धुलवायेगी,

और कभी-कभी बर्तन भी साफ करवाएगी।

 कभी सिर्फ खिचड़ी और दूध दलिया खिलाएगी

 लेकिन हां कभी-कभी तो हलवा भी खिलाएगी

शॉपिंग खूब करके तुम्हारी जेब हल्की करेगी,

 लेकिन कभी बीमार पड़े तो तुम्हारी सेवा भी करेगी।

 मर्जी तुम्हारी है शादी का लड्डू खाओ ना खाओ भैया,

 क्या बताएं हमने तो खा लिया दैया रे दैया।

 

मंगलवार, 9 मई 2023

परिवार का निर्णय-लघुकथा

 सोनाली जैसे ही ऊपर पहुंची उसने देखा कि वहां हंसी मजाक चल रहा है,उसको देखते ही सब चुप हो गए।  सब इस बात का इंतजार कर रहे थे कि देखें सोनाली क्या बोलती है ।कुछ देर चुप रहने के बाद सोनाली ने चुप्पी तोड़ी।  वह बोली "मैं नौकरी भी करूं, जो तनख्वाह मिले वह परिवार में लगा दूँ , इसके बावजूद भी परिवार में होने वाले आयोजन मेरे ही सिर पर । मेरा तो एक पैर ऑफिस में और एक घर में रहता है । मैं ही जानती हूं कि किस तरह से सामंजस्य बनाकर चल रही हूं।  जब नौकरी करती हूं तो मेरा कर्त्तव्य बनता है कि पूरी तन्मयता से अपने काम को अंजाम दूं और यहां घर में भी मेरा कर्त्तव्य समझ कर पूरी कोशिश करती हूं कि जितना हो सके हर कार्य में योगदान दूँ, लेकिन फिर भी सुनना मुझे ही पड़ता है। आखिर मैं कब तक बर्दाश्त करूं। मैं साथ में खाली काग़ज़ लेकर आई हूं आप लोग उस पर मेरा त्यागपत्र लिख दें, मैं 'साइन' कर दूंगी और फिर पूरा समय घर के काम में ही देती रहूंगी।" 

 सोनाली द्वारा इस तरह के आचरण से सभी हतप्रभ रह गए।  उनको इसी स्थिति में छोड़कर वह वापस नीचे चली गई ।सभी सोच में पड़ गए ,उसकी तनख्वाह का घर के खर्च में बड़ा योगदान था।  यदि उसने नौकरी छोड़ दी तो परिवार का खर्च कैसे चलेगा?सब ने मिलकर निर्णय किया कि सभी साथ चल कर उसको मनाते हैं। उधर सोनाली अपने कमरे में बैठी हुई निर्णय का इंतजार कर रही थी। 

सोमवार, 8 मई 2023

समाधान--लघुकथा

 सोनाली अब बहुत कुछ सोच चुकी थी।  वह जानती थी कि बिना सोचे समझे कुछ कहने से समस्या का समाधान नहीं होता।  ऊपर सासू मां के कमरे तक पहुंचते-पहुंचते, वह संयत हो चुकी थी।  अचानक उसके कमरे में पहुंचने से मां- बेटे, देवर-देवरानी, सब चौंक उठे।मांजी को तो लगा कि सोनाली गुस्से में है और जरूर ही अब गर्मा- गर्मी होगी। लेकिन सोनाली ने बड़ी ही शालीनता से कहा 'मांजी पूजा की  सामग्री मैं ऑफिस से आते वक़्त ले आयी थी,जिन जिन को बुलाना है, उन सबका मैंने फोन कर दिए हैं। पूजा के दिन मैं लंच के बाद ही छुट्टी लूँगी ,उसके पहले का काम आप लोग संभाल लेना। मेरे आने के पहले सारी तैयारियाँ मेरी प्यारी प्यारी देवरानी करके रखेगी ना ? सोनाली ने सीधा सीधा प्रश्न देवरानी की तरफ उछाल दिया। देवरानी को हाँ में सिर हिलाना ही पड़ा। "तो ठीक है, मेरे आने के बाद हम सब मिलकर सानंद पूजा संपन्न करवा लेंगे।" यह कहते हुए सोनाली  नीचे अपने कमरे पर पहुंची 

 तैयार होकर सोनाली ऑफिस पहुंची तो तुरंत बॉस का बुलावा आ गया। जैसे ही वह बॉस के कैबिन में पहुंची, बॉस ने कहा "सोनाली,एक समस्या आ गई है.."- सोनाली सोचने लगी कि ऐसा क्यों है कि घर हो, सहेलियाँ हों या ऑफिस, सब मुझसे ही समस्या का समाधान चाहते हैं। सोनाली ने सोचा कि उसका नाम सोनाली नहीं बल्कि समाधान होना चाहिए था।

नकाब -' कविता

 जमाने में आज कैसे-कैसे चलन चलते हैं, 

 प्रवृत्ति रहती वही चेहरे के भाव बदलते हैं। 

दिल के अंदर क्या छुपा हुआ है जाने ना कोई,

 हर पल चेहरा वही सिर्फ नकाब बदलते हैं।

 सरल स्वभाव रखने में आखिर क्या है मुश्किल,

 क्या जैसे हैं वैसे रहने से नहीं मिलती मंजिल।

 हमने तो देखे हैं ऐसे ऐसे कई चेहरे ,

 जो पहुंचे हैं या पहुंचेंगे मंजिल तक आज नहीं तो कल। 

श्वेत वस्त्र धारण करते हैं दिल तो काला रहता, 

 मन में घनघोर अंधेरा बाहर चाहे उजाला रहता।

 मुंह में राम बगल में छुरी वाले रहते हैं लोग,

 नहीं आते इनके झांसे में यदि अपने को संभाला होता


रविवार, 7 मई 2023

करुण नयन - कविता

 करूण नयन से करबद्ध निवेदन करते, 

 दुःख दर्द मिले जो हमको नयनों में भरते।

  हर पल हिय में अग्नि सी प्रज्वलित होती रहती,

  हवन कुंड में हवन सामग्री ज्यों डलती रहती।

 पल पल निहार रहे थे सुख के ही क्षण मिल जायें,

 चाहा था हर कली यहां की फूल बनकर खिल जाये।

 गमों का निशाँ न रहे खुशियां ही खुशियां मिल जाएं,

  सागर की गोद से ज्यों सीपों  में मोती मिल जाये।

   अखियां थक जाती है पंथ निहार निहार 

   सूखे जीवन में आ नहीं पाती कोई बहार ।

  ना जाने दुनियाँ में कैसे जी लेते हैं लोग,

  वे तो कर भी नहीं पाते सुखों का उपभोग।

 करुणा से भर जाता है दिल देख कर आंखें पथराई,

  गौर से देखें तो आंखों में दिखती कितनी गहराई ।

देखकर उनके करूण नयन दिल करुणा से भर जाता,

 दया दृष्टि से दिल से दिल का नाता जुड़ जाता।

 

शनिवार, 6 मई 2023

महाराणा प्रताप-- कविता

 महाराणा प्रताप  के आगे हम अपना सर झुकाते हैं, 

उस प्रतापी राजा की कहानी तुम्हें सुनाते हैं। 

परदेेश में भी जिसके नाम का डंका बजता था, 

आगे जिसके अच्छे-अच्छों का सर झुकता था।

 नाम के जिससे थर-थर कांपे दुश्मन हर दिशा में, 

चैन न आए दिन में नींद न आए निशा में। 

वीरों की धरती की गाथा हर एक की जुबानी,  

 कह रही महाराणा की वीरता की कहानी। 

 जिस दुश्मन ने भी देखा वो प्रतापी भाला, 

 उसके गले में अटका निवाला। 

याद है हमें वह युद्ध हल्दीघाटी का,

आभारी जिसका कण-कण इस देश की माटी का। 

सुख-दुःख- कविता

 किस-किस पर भरोसा करें जनाब ,

देखिए ग्रीष्म ऋतु का बदला मिजाज।

 क्या बताएं इस मौसम की तो क्या बात है,

 कभी गर्मी ,कभी सर्दी, कभी बरसात है।

 जीवन में कभी सुख और कभी दुख आ ही जाता है,

 न सुख में हंसो न दुख में डरो यह पाठ पढ़ा जाता है। 

 हौसला रखकर इंसान पग पग आगे बढ़ता है, 

इसी हौसले से दुख घट और सुख बढ़ जाता है।

 हर इंसान करता है सुखों की ही कामना, 

 पर करना ही पड़ता है दुखों से भी सामना।

 मौसम का तो चाहे कितना ही बदल जाए मिजाज,

 पर इंसान चाहे तो  रख सकता है सुखों का हिसाब। 

गुरुवार, 4 मई 2023

पीहर का अंगना- गीत

  छूटा - छूटा  रे पीहर का अंगना, 

  मेरे बाबुल मुझे तू न भूलना।

 छूटा -छूटा रे पीहर का अंगना,

  मेरे बाबुल मुझे तू न भूलना।

चाहे संग हो गए मेरे सजना,

 मेरे बाबुल मुझे तू न भूलना। 

कैसे कैसे पढ़ी कैसे कैसे लिखी,

प्यारी-प्यारी सहेलियों से मिली।

 याद आये वो सावन में झूलना,

  मेरे बाबुल मुझे तू न भूलना। 

छूटा छूटा रे ‌--

मां की ममता मैं यणकैसे भुला दूं,

 पिता का प्यार कैसे भुला दूं।

 याद आए वो आंगन  बुहारना, 

मेरे बाबुल मुझे तू न भूलना।


बुधवार, 3 मई 2023

विश्वामित्र का यज्ञ

 किसी भी माता-पिता के लिए संसार का सबसे सुखदाई पल होता है अपने बच्चों को सोते हुए या खेलते हुई अवस्था में निहारना।  बच्चों के सौम्य और शांत चेहरे को देखकर उनकी आत्मा को तृप्ति प्राप्त होती है। 

  गुरुकुल से शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात, राजा दशरथ, राम को निद्रा अवस्था में निहारने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहे थे। इतने में वहां आती हैं और और दशरथ जी को पूछती हैं कि क्या हुआ?

 दशरथ जी अचकचा जाते हैं  और कहते हैं कि नींद नहीं आ रही थी,  राम का चेहरे देखे बिना सो नहीं पा रहा था तो उसे देखने आ गया। ऐसा था दशरथ जी का पुत्र प्रेम।

 उधर  ऋषि विश्वामित्र द्वारा यज्ञ कराया जा रहा था। रावण ने राक्षसों को कहा कि इन राजाओं को असली शक्ति इन यज्ञों द्वारा ही मिलती है। अतः बेहतर होगा कि इनके यज्ञ में विघ्न डाल कर यज्ञ को असफल कर दिया जाए।  इस हेतु दो राक्षस आकाश मार्ग  से यज्ञ स्थल पर आए और यज्ञ वेदी में     पहले हड्डियां डाली और fi6रक्त भी डाल दिया।  इस तरह से बार बार विघ्न डालकर यज्ञ को असफ़ल करके वहां से अंतर्ध्यान हो गए राजा दशरथ जी का दरबार लगा हुआ है मंत्री जी कर रहे हैं कि गुरु आश्रम से लौटने के बाद अब जबकि आपके चारों पुत्र योग्य हो गए हैं जंत जनता की नजरें उनका रूप उनके ऊपर है और जनता चाहती है की दशरथ जी कहते हैं कि महर्षि विश्वामित्र जी हैं इनको शिक्षा दीक्षा दी है अतः देहि इनकी योग्यता का निर्धारण करके बता सकते हैं कि किसको क्या कार्यभार समझाया जाए और उनको उनकी योग्यता के हिसाब से कार्यभार समझा दिया जाए। इतने में ही एक हर कराकर सूचना देता है किम ऋषि विश्वामित्र जी पधार रहे हैं एकाएक आया जानकर जिस वजह से होते हैं दशरथ जी चूक जाते हैं भी गुरु वशिष्ट जी को पूछते हैं कि अचानक उनका आना कैसे हो सकता है तो गुरु वशिष्ट जी कहते हैं कि ज्ञान-विज्ञान के ज्ञाता जब इस तरह से अचानक आते हैं तो जरूर कोई विशेष बात है उनका आगे बढ़ कर स्वागत किया जाना चाहिए लेकिन तुरंत उनको आदर सहित वहां लाने के लिए जाते हैं, राजा दशरथ करते हैं की मुरली पर आपका स्वागत है पधारिए आपके पधारने से अयोध्या नगरी धन्य हो गई है उन्हें आदर सहित लाकर उनके श्रद्धा से पैर पखारते हैं। इतने आदर सत्कार से प्रसन्न होकर विश्वामित्र जी कहते हैं कि हे सूर्यवंशी के राजा दशरथ तुम्हारे साम्राज्य में सब कुशल मंगल तो है ना तुम्हारी राजनीति ऋषि मुनियों की धर्म और सत्संग बराबर निर्विघ्न रूप से चल रहे   होंगे। तब राजा दशरथ ने पूछा कि किस प्रयोजन से आपका यहां आना हुआ तब ऋषि परशुराम जी कहते हैं कि हम जिस प्रयोजन के लिए आए हैं, आपसे आशा है कि वह प्रयोजन आप पूरा करेंगे। दशरथ जी ने कहा कि आप बताइए मैं क्या कर सकता हूं तब विश्वामित्र जी  ने कहा कि रावण ने कुछ राक्षसों को हमारे यज्ञ को असफ़ल करने के लिए लगा रखा है,विशेष तौर पर सुबोह और ताड़का पुत्र मरीच को। रावण को लगता है कि हमारी यज्ञ से राज्य का राजा और ताकतवर हो जाएगा और रावण नहीं चाहते कि ऐसा हो। इसलिए उन राक्षसों का वध करने के लिए मैं राम को लेने आया हूं यह सुनकर दशरथ जी एकदम से टूट जाते हैं और कहते हैं कि राम तो अभी बच्चा जैसा है और राक्षसों से कैसे मुकाबला कर पाएगा।  विश्वामित्र जी कहते हैं कि क्योंकि मैं खुद यज्ञ करवा रहा हूं इसलिए मैं क्रोध नहीं कर सकता ,लेकिन रामजी में वह शक्ति है , इसलिए मैं उनको लेने आया हूं यह सुनकर दशरथ जी और टूट जाते हैं और विनती करने लगते हैं कि कृपया करके रामजी को न ले जाएं वह राक्षसों का मुकाबला कहां कर पाएगा।  यह सुनकर विश्वामित्र जी आग बबूला हो जाते हैं और कहते हैं कि यदि आपको अपना वादा पूरा नहीं करना है तो ठीक है, ऐसे ही चला जाऊंगा फिर  वे गुरु वशिष्ट जी को समझाने के लिए कहते हैं। वशिष्ठ जी दशरथ जी को समझाते हैं कि राम में राक्षसों का वध करने  की सामर्थ्य है।  वैसे तो विश्वामित्र जी भी ऐसा कर सकते हैं लेकिन वे यह गौरव रामजी को दिलाना चाहते हैं।दशरथ जी राम जी को उनके साथ भेजने के लिए तैयार हो जाते हैं लेकिन वे कहते हैं कि अकेले नहीं जाएंगे, लक्ष्मण भी साथ जाएगा। राम और लक्ष्मण की जोड़ी को विश्वामित्र जी के साथ भेजने को तैयार हो जाते हैं। 


आगे आगे विश्वामित्र जी और उनके पीछे राम और लक्ष्मण । कोई साधन नहीं घने जंगलों में पैदल ही चले जा रहे हैं। विश्वामित्र जी के आश्रम सिद्धाश्रम में पहुंचने में 4 दिन लगते हैं लगभग डेढ़ योजन चलने के बाद सरयू नदी के किनारे पहुंचते हैं। विश्वामित्र जी राम और लक्ष्मण को कुछ पानी सरयू नदी से पीने को कहते हैं । इसके बाद कुछ मंत्रों का ज्ञान देते हैं जिनसे भूख और प्यास से निजात मिलती है और निडरता मन में भर जाती है।  रात नदी के किनारे बिताकर फिर वे आगे चलते हैं। अगली दिन सरयू और गंगा के संगम के पास अंगदेश नामक आश्रम में पहुंचते हैं फिर अगली सुबह को वे नाव के द्वारा नदी को पार करते हैं। राम पूछते हैं कि पानी इतना शोर क्यों कर रहा है तो विश्वामित्र जी कहते हैं कि दो नदियों का पानी यहां मिलता है इसलिए इतनी आवाज हो रही है। नदी पार करके वे घने जंगल में पहुंचते हैं जहां विचित्र जानवरों व पक्षियों की आवाजें  आ रही थी। जंगल में एक राक्षसी ताड़का का राज चलता था। वह बहुत ही क्रूर प्रकृति की थी,इंसान को मार देती थी उनके घरों को उजाड़ देती थी। विश्वामित्र जी ने राम को उसे मारने के लिए कहा। राम ने अपना धनुष संभाला और तीर चला कर ताड़का को मार डाला।

मंगलवार, 2 मई 2023

त्रिशा (स्वीकार है) - लघुकथा

  त्रिशा बहुत खुश थी , बाहर से ही डिब्बा खोलकर आवाज लगाती हुई अंदर आई-मम्मी,पापा, कहां हो? जैसे ही मम्मी ने आकर दरवाजा खोला, मिठाई का एक टुकड़ा उनके मुंह में डालते हुए,बाहों के घेरे में लेते हुए ड्राइंग रूम तक ले आई। बेशक वहां कुछ लोग और बैठे हुए थे लेकिन वह सीधी पापा के पास गई और एक मिठाई का टुकड़ा उनके भी मुंह में डाल दिया,बोलते हुए कि पापा-पापा मेरा इंक्रीमेंट हो गया और प्रमोशन भी। फिर उसे नजर घुमाई और देखा कि वहां तीन लोग और बैठे हुए थे, एक नौजवान और उसके मम्मी और पापा। 

 वह थोड़ी सकुचाते हुए वहीं पर सोफे पर बैठ गई। संदीप और उसके माता-पिता तीनों की निगाहें त्रिशा पर थीं। त्रिषा के पापा ने बोलना शुरू किया -बेटी तुम्हारे माता-पिता ने सारी बातें बता दी हैं। अब भविष्य के बारे में तुम्हारा क्या विचार है ? त्रिषा ने तुरंत बोला, मेरी तो हां ही है ,तो संदीप के माता-पिता दोनों एक सुर में खुश होते हुए बोले अच्छा है, तुम्हें यह रिश्ता मंजूर है। त्रिशा चौकी और बोली मैं तो अपने ऑफिस के बारे में बोल रही थी ।आज मेरा प्रमोशन हुआ है और इंक्रीमेंट मिला है, हां लेकिन यदि दाम्पत्य जीवन की बात करें तो इस बारे में काफी सोच विचार करना पड़ेगा।  संदीप के पिताजी ने कहा कि हम लोग एक ही शहर में हैं। तुम दोनों की नौकरी एक ही शहर में है, तुम्हारी सरकारी नौकरी है तो समय की परेशानी भी नहीं रहेगी और आगे क्या करना क्या नहीं करना वह भी तुम्हारी मर्जी पर ही निर्भर होगा।  जब सब कुछ त्रिशा पर ही छोड़ा जा रहा था तो वह मना भी करती तो कैसे ?