दैया रे दैया कुर्सी के चक्कर अजब हैं भैया, गजब हैं भैया।
कुर्सी के खूब फेरे लगाते , जैसे तैसे कुर्सी हथियाते, बैठ कुर्सी पर शेर बन जाते, जब आ जाते चुनाव - तो बन जाते गैया, दैया रे दैया,कुर्सी के चक्कर अजब हैं भैया गजब हैं भैया।
कुर्सी जब मिल जाए, खुद पावरफुल बन जाए, नोटों के बंडल खूब बनाते, हर रोज ही दिवाली मनाते ,जब आ जाते चुनाव-तो खूब बांटते रुपैया, दैया रे दैया,कुर्सी के चक्कर अजब हैं भैया गजब हैं भैया।
पढ़-पढ़ कर भाषण देते, खुद अपने भाषण नहीं लिख पाते, पढ़ने को किसी और से लिखवाते , जब आ जाएं चुनाव - खूब सुनाते कविता ,दोहा ,गीत और सवैया । दैया रे दैया ,कुर्सी के चक्कर अजब हैं भैया, गजब हैं भैया।
कोई भी गीत कभी न गाया, कितना भी कहा कभी न सुनाया, जब आ जाए चुनाव- तो बन जाएं गवैया। दैया रे दैया,कुर्सी के चक्कर अजब हैं भैया, गजब हैं भैया।
नेता बन कर खूब इतराये ,जो न किया वो खूब सुनाये, चमचों को तो खूब नचाये , जब आ जाएं चुनाव- खुद बन जाए नचैया , दैया रे दैया, कुर्सी के चक्कर अजब हैं भैया, गजब हैं भैया।
रैली कर करके खूब रिझाया,जनता को तो लॉलीपॉप दिखाया, जब मिल जाए कुर्सी,जनता को बंदर बना, बन जाए डमरु बजेय्या ।
दैया रे दैया ,कुर्सी के चक्कर अजब हैं भैया ,गजब हैं भैया।
कुर्सी ही उनकी दुनियां ,कुर्सी ही उनकी मुनियां, जब मिल जाये कुर्सी तो भाड़ में जाये दुनियाँ।
कुर्सी पर चढ़कर करते ता ता थय्यां,
दय्या रे दय्या कुर्सी के चक्कर अजब हैं भैया, ग़ज़ब हैं भय्या।
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