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पिताजी को सुबह की फ्लाइट से बंगलुरू जाना था, सामान का वजन देखने के लिये नेहा और रोहन स्टोर से तुला लाने स्टोर की ओर गए। उस समय क्योंकि बिजली नहीं थी , स्टोर से टॉर्च की रोशनी में तुला उठाकर घूमे ही थे कि कोहनी की टक्कर से वहां टेबल पर रखी एक मूर्ति नीचे गिर पड़ी। दरवाजे का ताला लगाते ही उन्हें कराहने की आवाज सुनाई दी। नेहा बोली "सुना तुमने, यह कौन कराह रहा है"? रोहन बोला "अरे,यह आवाज़ तो अंदर से आ रही है। डर के मारे दोनों की घिग्घि बंध गई।
इतने में तेज "म्याऊँ" की तेज आवाज सुनाई दी ,दोनों ने पलट कर टॉर्च की रोशनी में उस ओर देखा तो एक बिल्ली चमकती आंखों से उनकी ओर देख रही थी, उनका डर और बढ़ गया, फिर बिल्ली अपने पंजों के बल बैठकर उठने लगी। ऐसा लगा जैसे वह उन पर कूदेगी।अब तो दोनों की चीख निकल गई और दौड़ कर कमरे की ओर भागे। उन्होंने देखा कि वही बिल्ली दरवाजे उन पर कूदने वाली स्थिति में बैठी है। बिल्ली ने दोनों को घूर कर देखा और जोर से म्याऊँ बोल कर चली गई।
माता-पिता के घर से जाने के बाद उन्होंने सोने की कोशिश की लेकिन नाकामयाब रहे। अगले दिन रात के दूसरे पहर उसी समय फिर कराहने की आवाज आई। रोहन को अब तो रोज ही रात के दूसरे पहर उस दरवाजे के पीछे से कोई आहट सी सुनाई देने लगी तो वह सोचने के लिए मजबूर हो गया,कि पिताजी के आने के बाद किसी तांत्रिक से मिलेंगे।
स्वरचित--सतीश गुप्ता पोरवाल,जयपुर।
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