किसी भी माता-पिता के लिए संसार का सबसे सुखदाई पल होता है अपने बच्चों को सोते हुए या खेलते हुई अवस्था में निहारना। बच्चों के सौम्य और शांत चेहरे को देखकर उनकी आत्मा को तृप्ति प्राप्त होती है।
गुरुकुल से शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात, राजा दशरथ, राम को निद्रा अवस्था में निहारने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहे थे। इतने में वहां आती हैं और और दशरथ जी को पूछती हैं कि क्या हुआ?
दशरथ जी अचकचा जाते हैं और कहते हैं कि नींद नहीं आ रही थी, राम का चेहरे देखे बिना सो नहीं पा रहा था तो उसे देखने आ गया। ऐसा था दशरथ जी का पुत्र प्रेम।
उधर ऋषि विश्वामित्र द्वारा यज्ञ कराया जा रहा था। रावण ने राक्षसों को कहा कि इन राजाओं को असली शक्ति इन यज्ञों द्वारा ही मिलती है। अतः बेहतर होगा कि इनके यज्ञ में विघ्न डाल कर यज्ञ को असफल कर दिया जाए। इस हेतु दो राक्षस आकाश मार्ग से यज्ञ स्थल पर आए और यज्ञ वेदी में पहले हड्डियां डाली और fi6रक्त भी डाल दिया। इस तरह से बार बार विघ्न डालकर यज्ञ को असफ़ल करके वहां से अंतर्ध्यान हो गए राजा दशरथ जी का दरबार लगा हुआ है मंत्री जी कर रहे हैं कि गुरु आश्रम से लौटने के बाद अब जबकि आपके चारों पुत्र योग्य हो गए हैं जंत जनता की नजरें उनका रूप उनके ऊपर है और जनता चाहती है की दशरथ जी कहते हैं कि महर्षि विश्वामित्र जी हैं इनको शिक्षा दीक्षा दी है अतः देहि इनकी योग्यता का निर्धारण करके बता सकते हैं कि किसको क्या कार्यभार समझाया जाए और उनको उनकी योग्यता के हिसाब से कार्यभार समझा दिया जाए। इतने में ही एक हर कराकर सूचना देता है किम ऋषि विश्वामित्र जी पधार रहे हैं एकाएक आया जानकर जिस वजह से होते हैं दशरथ जी चूक जाते हैं भी गुरु वशिष्ट जी को पूछते हैं कि अचानक उनका आना कैसे हो सकता है तो गुरु वशिष्ट जी कहते हैं कि ज्ञान-विज्ञान के ज्ञाता जब इस तरह से अचानक आते हैं तो जरूर कोई विशेष बात है उनका आगे बढ़ कर स्वागत किया जाना चाहिए लेकिन तुरंत उनको आदर सहित वहां लाने के लिए जाते हैं, राजा दशरथ करते हैं की मुरली पर आपका स्वागत है पधारिए आपके पधारने से अयोध्या नगरी धन्य हो गई है उन्हें आदर सहित लाकर उनके श्रद्धा से पैर पखारते हैं। इतने आदर सत्कार से प्रसन्न होकर विश्वामित्र जी कहते हैं कि हे सूर्यवंशी के राजा दशरथ तुम्हारे साम्राज्य में सब कुशल मंगल तो है ना तुम्हारी राजनीति ऋषि मुनियों की धर्म और सत्संग बराबर निर्विघ्न रूप से चल रहे होंगे। तब राजा दशरथ ने पूछा कि किस प्रयोजन से आपका यहां आना हुआ तब ऋषि परशुराम जी कहते हैं कि हम जिस प्रयोजन के लिए आए हैं, आपसे आशा है कि वह प्रयोजन आप पूरा करेंगे। दशरथ जी ने कहा कि आप बताइए मैं क्या कर सकता हूं तब विश्वामित्र जी ने कहा कि रावण ने कुछ राक्षसों को हमारे यज्ञ को असफ़ल करने के लिए लगा रखा है,विशेष तौर पर सुबोह और ताड़का पुत्र मरीच को। रावण को लगता है कि हमारी यज्ञ से राज्य का राजा और ताकतवर हो जाएगा और रावण नहीं चाहते कि ऐसा हो। इसलिए उन राक्षसों का वध करने के लिए मैं राम को लेने आया हूं यह सुनकर दशरथ जी एकदम से टूट जाते हैं और कहते हैं कि राम तो अभी बच्चा जैसा है और राक्षसों से कैसे मुकाबला कर पाएगा। विश्वामित्र जी कहते हैं कि क्योंकि मैं खुद यज्ञ करवा रहा हूं इसलिए मैं क्रोध नहीं कर सकता ,लेकिन रामजी में वह शक्ति है , इसलिए मैं उनको लेने आया हूं यह सुनकर दशरथ जी और टूट जाते हैं और विनती करने लगते हैं कि कृपया करके रामजी को न ले जाएं वह राक्षसों का मुकाबला कहां कर पाएगा। यह सुनकर विश्वामित्र जी आग बबूला हो जाते हैं और कहते हैं कि यदि आपको अपना वादा पूरा नहीं करना है तो ठीक है, ऐसे ही चला जाऊंगा फिर वे गुरु वशिष्ट जी को समझाने के लिए कहते हैं। वशिष्ठ जी दशरथ जी को समझाते हैं कि राम में राक्षसों का वध करने की सामर्थ्य है। वैसे तो विश्वामित्र जी भी ऐसा कर सकते हैं लेकिन वे यह गौरव रामजी को दिलाना चाहते हैं।दशरथ जी राम जी को उनके साथ भेजने के लिए तैयार हो जाते हैं लेकिन वे कहते हैं कि अकेले नहीं जाएंगे, लक्ष्मण भी साथ जाएगा। राम और लक्ष्मण की जोड़ी को विश्वामित्र जी के साथ भेजने को तैयार हो जाते हैं।
आगे आगे विश्वामित्र जी और उनके पीछे राम और लक्ष्मण । कोई साधन नहीं घने जंगलों में पैदल ही चले जा रहे हैं। विश्वामित्र जी के आश्रम सिद्धाश्रम में पहुंचने में 4 दिन लगते हैं लगभग डेढ़ योजन चलने के बाद सरयू नदी के किनारे पहुंचते हैं। विश्वामित्र जी राम और लक्ष्मण को कुछ पानी सरयू नदी से पीने को कहते हैं । इसके बाद कुछ मंत्रों का ज्ञान देते हैं जिनसे भूख और प्यास से निजात मिलती है और निडरता मन में भर जाती है। रात नदी के किनारे बिताकर फिर वे आगे चलते हैं। अगली दिन सरयू और गंगा के संगम के पास अंगदेश नामक आश्रम में पहुंचते हैं फिर अगली सुबह को वे नाव के द्वारा नदी को पार करते हैं। राम पूछते हैं कि पानी इतना शोर क्यों कर रहा है तो विश्वामित्र जी कहते हैं कि दो नदियों का पानी यहां मिलता है इसलिए इतनी आवाज हो रही है। नदी पार करके वे घने जंगल में पहुंचते हैं जहां विचित्र जानवरों व पक्षियों की आवाजें आ रही थी। जंगल में एक राक्षसी ताड़का का राज चलता था। वह बहुत ही क्रूर प्रकृति की थी,इंसान को मार देती थी उनके घरों को उजाड़ देती थी। विश्वामित्र जी ने राम को उसे मारने के लिए कहा। राम ने अपना धनुष संभाला और तीर चला कर ताड़का को मार डाला।
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