मंगलवार, 9 मई 2023

परिवार का निर्णय-लघुकथा

 सोनाली जैसे ही ऊपर पहुंची उसने देखा कि वहां हंसी मजाक चल रहा है,उसको देखते ही सब चुप हो गए।  सब इस बात का इंतजार कर रहे थे कि देखें सोनाली क्या बोलती है ।कुछ देर चुप रहने के बाद सोनाली ने चुप्पी तोड़ी।  वह बोली "मैं नौकरी भी करूं, जो तनख्वाह मिले वह परिवार में लगा दूँ , इसके बावजूद भी परिवार में होने वाले आयोजन मेरे ही सिर पर । मेरा तो एक पैर ऑफिस में और एक घर में रहता है । मैं ही जानती हूं कि किस तरह से सामंजस्य बनाकर चल रही हूं।  जब नौकरी करती हूं तो मेरा कर्त्तव्य बनता है कि पूरी तन्मयता से अपने काम को अंजाम दूं और यहां घर में भी मेरा कर्त्तव्य समझ कर पूरी कोशिश करती हूं कि जितना हो सके हर कार्य में योगदान दूँ, लेकिन फिर भी सुनना मुझे ही पड़ता है। आखिर मैं कब तक बर्दाश्त करूं। मैं साथ में खाली काग़ज़ लेकर आई हूं आप लोग उस पर मेरा त्यागपत्र लिख दें, मैं 'साइन' कर दूंगी और फिर पूरा समय घर के काम में ही देती रहूंगी।" 

 सोनाली द्वारा इस तरह के आचरण से सभी हतप्रभ रह गए।  उनको इसी स्थिति में छोड़कर वह वापस नीचे चली गई ।सभी सोच में पड़ गए ,उसकी तनख्वाह का घर के खर्च में बड़ा योगदान था।  यदि उसने नौकरी छोड़ दी तो परिवार का खर्च कैसे चलेगा?सब ने मिलकर निर्णय किया कि सभी साथ चल कर उसको मनाते हैं। उधर सोनाली अपने कमरे में बैठी हुई निर्णय का इंतजार कर रही थी। 

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