मंगलवार, 2 मई 2023

त्रिशा (स्वीकार है) - लघुकथा

  त्रिशा बहुत खुश थी , बाहर से ही डिब्बा खोलकर आवाज लगाती हुई अंदर आई-मम्मी,पापा, कहां हो? जैसे ही मम्मी ने आकर दरवाजा खोला, मिठाई का एक टुकड़ा उनके मुंह में डालते हुए,बाहों के घेरे में लेते हुए ड्राइंग रूम तक ले आई। बेशक वहां कुछ लोग और बैठे हुए थे लेकिन वह सीधी पापा के पास गई और एक मिठाई का टुकड़ा उनके भी मुंह में डाल दिया,बोलते हुए कि पापा-पापा मेरा इंक्रीमेंट हो गया और प्रमोशन भी। फिर उसे नजर घुमाई और देखा कि वहां तीन लोग और बैठे हुए थे, एक नौजवान और उसके मम्मी और पापा। 

 वह थोड़ी सकुचाते हुए वहीं पर सोफे पर बैठ गई। संदीप और उसके माता-पिता तीनों की निगाहें त्रिशा पर थीं। त्रिषा के पापा ने बोलना शुरू किया -बेटी तुम्हारे माता-पिता ने सारी बातें बता दी हैं। अब भविष्य के बारे में तुम्हारा क्या विचार है ? त्रिषा ने तुरंत बोला, मेरी तो हां ही है ,तो संदीप के माता-पिता दोनों एक सुर में खुश होते हुए बोले अच्छा है, तुम्हें यह रिश्ता मंजूर है। त्रिशा चौकी और बोली मैं तो अपने ऑफिस के बारे में बोल रही थी ।आज मेरा प्रमोशन हुआ है और इंक्रीमेंट मिला है, हां लेकिन यदि दाम्पत्य जीवन की बात करें तो इस बारे में काफी सोच विचार करना पड़ेगा।  संदीप के पिताजी ने कहा कि हम लोग एक ही शहर में हैं। तुम दोनों की नौकरी एक ही शहर में है, तुम्हारी सरकारी नौकरी है तो समय की परेशानी भी नहीं रहेगी और आगे क्या करना क्या नहीं करना वह भी तुम्हारी मर्जी पर ही निर्भर होगा।  जब सब कुछ त्रिशा पर ही छोड़ा जा रहा था तो वह मना भी करती तो कैसे ?

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