रोज एक आह सी उठती है।
जमाने भर के गम उठाता कब तक फिरूँ,
शिकायत करूं भी तो आखिर किससे करूं।
औरों की तरह मैंने भी खुशी मांगी थी जमाने से,
लेकिन ज़माना तो बाज नहीं आया मुझे हराने से।
आखिर कब तक लड़ता रहूंगा मैं अपने आप से ही,
जो कुछ कहना था मुझे वह बात अब तक नहीं कही।
मेरे सांसों की सरसराहट क्या कभी तुमने सुनी,
मेरी राह अलग और तुमने अलग राह चुनी।
अब तो दिल में रोज एक आह सी उठती है,
मेरे कानों में चुपके से बस एक बात कहती है।
भूल जा जो हुआ,कब तक सीने से लगाए रखेगा,
नई राह , नया सपना तेरे लिए नई दुनिया रचेगा।
(MSA)
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