सोमवार, 29 मई 2023

भोजन दान- लघुकथा

 मोहनलाल जी बहुत ही धार्मिक प्रवृत्ति के थे।अपनी आय में से एक हिस्सा मंदिर में दान किया करते थे। एक दिन जब वे अपनी कार से जा रहे थे तो चौराहे पर थोड़ी देर के लिए गाड़ी रुकी तो एक स्त्री रोती हुई उनके पास आकर कहने लगी कि उनके बच्चे भूखे हैं ,खाने को कुछ भी नहीं है। कुछ पैसा दे दो या फिर खाने के लिए कुछ।  मोहनलाल जी ने कार एक तरफ खड़ी की और उतर कर जा कर देखा तो वास्तव में वहां खाने को कुछ भी नहीं था और बच्चे रो रहे थे ।उन्हें बड़ा तरस आया।  उन्होंने सोचा कि मैं मंदिर में हमेशा दान दिया करता हूं ।मंदिर छोटा हो या बड़ा ,भगवान की मूर्ति छोटी हो या बड़ी ,उससे क्या फर्क पड़ेगा।लेकिन यदि वह  पैसा मानव सेवा में लगाऊंगा तो यह भी पुण्य का कार्य होगा, और यह वक्त की जरूरत भी है। उन्होंने उस परिवार के लिए खाने की व्यवस्था की और फिर एक संस्था बनाकर मंदिर में दान देने वाला पैसा गरीबों के भोजन के लिए लगाना शुरू किया ।वे जानते थे कि किसी भी व्यक्ति की सबसे पहली जरूरत भोजन ही है। कुछ और लोगों से उन्होंने साथ में जोड़ा।  अपने मित्रों को भी अलग-अलग क्षेत्र में ऐसी संस्था बनाकर गरीबों को भोजन उपलब्ध कराने की योजना बनाकर  उस पर अमल करना शुरू कर दिया ।मोहन लाल जी को लगा कि इस कार्य में उन को ज्यादा संतुष्टि मिल रही है। 


Mskm

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