सोनाली अब बहुत कुछ सोच चुकी थी। वह जानती थी कि बिना सोचे समझे कुछ कहने से समस्या का समाधान नहीं होता। ऊपर सासू मां के कमरे तक पहुंचते-पहुंचते, वह संयत हो चुकी थी। अचानक उसके कमरे में पहुंचने से मां- बेटे, देवर-देवरानी, सब चौंक उठे।मांजी को तो लगा कि सोनाली गुस्से में है और जरूर ही अब गर्मा- गर्मी होगी। लेकिन सोनाली ने बड़ी ही शालीनता से कहा 'मांजी पूजा की सामग्री मैं ऑफिस से आते वक़्त ले आयी थी,जिन जिन को बुलाना है, उन सबका मैंने फोन कर दिए हैं। पूजा के दिन मैं लंच के बाद ही छुट्टी लूँगी ,उसके पहले का काम आप लोग संभाल लेना। मेरे आने के पहले सारी तैयारियाँ मेरी प्यारी प्यारी देवरानी करके रखेगी ना ? सोनाली ने सीधा सीधा प्रश्न देवरानी की तरफ उछाल दिया। देवरानी को हाँ में सिर हिलाना ही पड़ा। "तो ठीक है, मेरे आने के बाद हम सब मिलकर सानंद पूजा संपन्न करवा लेंगे।" यह कहते हुए सोनाली नीचे अपने कमरे पर पहुंची
तैयार होकर सोनाली ऑफिस पहुंची तो तुरंत बॉस का बुलावा आ गया। जैसे ही वह बॉस के कैबिन में पहुंची, बॉस ने कहा "सोनाली,एक समस्या आ गई है.."- सोनाली सोचने लगी कि ऐसा क्यों है कि घर हो, सहेलियाँ हों या ऑफिस, सब मुझसे ही समस्या का समाधान चाहते हैं। सोनाली ने सोचा कि उसका नाम सोनाली नहीं बल्कि समाधान होना चाहिए था।
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