शनिवार, 13 मई 2023

भ्रमजाल-- कविता

 दिग्भ्रमित मनुष्य कहां जा रहा है,

 नजर कुछ आता नहीं, बस चला जा रहा है।

 नजर नजर का फेर है, दुनिया जानती है,

 पर भ्रष्ट बुद्धि यह कहां मानती है।

 दृढ़ निश्चय हो फिर चिंतन मनन भी हो,

 कुछ अच्छा करने को फिर मन भी हो। 

आधुनिकता को ही जिसने मन में ओढ़ लिया,

 संस्कारों को तो उसने झकझोर दिया।

 वह क्या जाने क्या होती है दुनियादारी,

 वह तो निभा भी नहीं पाता अपनों से रिश्तेदारी। 

अब तो समझ जा,भ्रमजाल को तोड़ दे,

 जिस गलत राह पर जा रहा, उसे मोड़ दे।

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