गुरुवार, 18 मई 2023

ढलती शाम..-- कविता

 ढलती शाम में क्या सब कुछ ढ़ल जाता है,

मानव का जो स्वभाव है क्या वह बदल जाता है।

 सूरज सवेरे आता है शाम को चला जाता है,

 लेकिन सच है कि वही सूरज अगली सुबह फिर आता है।

माना की उम्र रुकती नहीं बढ़ती ही जाती है,

 कमर परिवार और उम्र के बोझ से झुकती ही जाती है। 

 जीवन में जिंदगी भर हम बहुत कुछ कर जाते हैं,

  करते करते ढलती उम्र में थक भी जाते हैं।

  लेकिन उम्र का यही पड़ाव हमें संदेश देता है,

 आशा का कमल तो हर उम्र में खिल सकता है।

  करना चाहते थे हर कोई बहुत कुछ जिंदगी में, 

 लेकिन उम्र निकल जाती है परिवार की बंदगी में।

 इससे पहले कि जिंदगी हमें दे जाए अंततः धोखा, 

 पकड़ लो इस अवसर को समझकर सुनहरा मौका। 

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