शनिवार, 2 नवंबर 2013

दीप जले

 कोटि -कोटि जन के मन में प्रीत पले ,
सबसे सुंदर,यही दीप जले।
     निशा क्षितिज पर ले आई दिनकर को
     कम हुई चंदा से अब दूरी ,
     नन्हे तन पर,विशाल हृदय के दीपों से
     छा गई नई रौनक सिंदूरी।
अंधियारा बैचेनी से नयन मले,
                               दीप जले।
     गगन मण्डल के विशाल वक्ष पर
     जगमग -जगमग चमके तारे,
     धरती की इस हरी गोद के,
     आज हुए तारे ये नन्हे दीपक सारे।
तारे क्यों दीपक से मन ही मन जले,
                                        दीप जले।
     कुण्ठा और भ्रम मन से सभी त्याग
     लेलें प्रेम और सदभाव का गुण ,
     दिए से दिल में हो तेल सा दया का सागर
     प्रेम की बाती हो मन रहे ना रुग्ण।
अवचेतन से उठ चेतन की ओर चले,
                                       दीप जले।
      अंधियारा हो तल में चाहे
      जग को उजियारा दे दें ,
      लौ प्रेम की उठे प्रेम की बाती से
      ग़म लें सबके और  खुशियां दे दें।
प्रेमी सुर में गम के गीत ढले ,
                             दीप जले।
      
 
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मंगलवार, 10 सितंबर 2013

A Promise

papa---hold my hand
I am new to this world,
don't know
how to talk
how to walk
you will teach me
from begining to end.
Papa hold my hand.
when I grow up
you will understand me,and
I shall understand you 
we shall have hand in hand.
Papa hold my hand.

I promise you papa
when time will come
You will become weak,
And I strong, then
I shall hold your hand.
Papa hold my hand.

गुरुवार, 29 अगस्त 2013

बेपरवाह


लोग कहते हैं
मैं परवाह नहीं करता ,
दर्द तो मुझे भी होता है यारों
पर मैं आह नहीं भरता।
 चोटिल तो मुझे भी करते हैं लोग
मलहम लगता हूँ मैं ,
चोट पर नश्तर घुमाने से
 घाव  नहीं भरता। 

मंगलवार, 20 अगस्त 2013

* प्रतिशोध*

       * प्रतिशोध*
नभ की उंचाईयों को लांघ
आसमां के सितारे को छू लूं ,
जकड़ लूं मुट्ठी में ,कभी न छोडूं
दिल के पाटों के बीच मसल दूं।
 उतारता हूं मैं इसी पर
क्रोध सारा का सारा ,
क्योंकि बन न सका यह
मेरी किस्मत का सितारा।

* दायरा *

          * दायरा *

अतीत के दायरे से निकल
वर्तमान की कठोर धरती पर
जब मैं विचरण करता हूँ
तो सोचता हूँ ,कि आदमी
आदम से आदमी हो गया है।
पर जब वर्तमान की कठोरधरती से उठ
भविष्य की कल्पना में उड़ान भरता हूँ
तो सोचता हूँ ,कहीं आदमी
आदमी से आदम न हो जाय। 

सोमवार, 19 अगस्त 2013

*** पवित्र धागा और वादा***

 *** पवित्र  धागा  और  वादा***

त्यौहार आते हैं ,
चले जाते हैं
पर इनका महत्त्व है इतना,
इन्सां के सोये दायित्व को
दे जाते हैं ,ये
एक नई चेतना।
 मिला मुझे और ग्रहण किया
तुम्हारे स्नेह में भीगा
भ्राता  व भगिनी  के बीच
अटूट प्रेम को दृढ बनाने ,
भ्राता  को सर्व -संपन्न करने ,और
चतुर्मुखी उन्नति की कामना लिए
तुम्हारा पवित्र धागा।
मेरे दायित्व को
नई चेतना मिली ,
मैने जानी कच्चे धागे की मजबूती ,
भगिनी , मैं भी करता हूँ
हृदय की गहराईयों से
तुम्हारे प्रति अपना दायित्व,
निभाने का वादा।

शुक्रवार, 16 अगस्त 2013

फिर पंद्रह अगस्त मनाओ-कविता

फिर पन्द्रह अगस्त मनाओ

लो फिर आया  स्वतंत्रता का एहसास दिलाने 
अगस्त का पन्द्रहवा दिवस 
पर मानव मन मेरा पुलकित हुआ नहीं 
कुछ उफनती सी कुछ अनदेखी सी 
उभरती रही सिसक। 
आकांशाये सब मर मिटी 
स्वपन सब फूल से झर गए 
पंछी का मुक्त आकाश में 
विचरण करना अब संभव नहीं 
क्योंकि अब समय की तेज धार से 
उसके पंख कट गए। 
आओ तुम मेरे साथ आओ 
शंख ध्वनि ध्वनि करो अलख जगाओ 
मानव के सुशुप्त मन में चेतना जगाओ 
 और पन्द्रह अगस्त मनाओ।