कोटि -कोटि जन के मन में प्रीत पले ,
सबसे सुंदर,यही दीप जले।
निशा क्षितिज पर ले आई दिनकर को
कम हुई चंदा से अब दूरी ,
नन्हे तन पर,विशाल हृदय के दीपों से
छा गई नई रौनक सिंदूरी।
अंधियारा बैचेनी से नयन मले,
दीप जले।
गगन मण्डल के विशाल वक्ष पर
जगमग -जगमग चमके तारे,
धरती की इस हरी गोद के,
आज हुए तारे ये नन्हे दीपक सारे।
तारे क्यों दीपक से मन ही मन जले,
दीप जले।
कुण्ठा और भ्रम मन से सभी त्याग
लेलें प्रेम और सदभाव का गुण ,
दिए से दिल में हो तेल सा दया का सागर
प्रेम की बाती हो मन रहे ना रुग्ण।
अवचेतन से उठ चेतन की ओर चले,
दीप जले।
अंधियारा हो तल में चाहे
जग को उजियारा दे दें ,
लौ प्रेम की उठे प्रेम की बाती से
ग़म लें सबके और खुशियां दे दें।
प्रेमी सुर में गम के गीत ढले ,
दीप जले।
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सबसे सुंदर,यही दीप जले।
निशा क्षितिज पर ले आई दिनकर को
कम हुई चंदा से अब दूरी ,
नन्हे तन पर,विशाल हृदय के दीपों से
छा गई नई रौनक सिंदूरी।
अंधियारा बैचेनी से नयन मले,
दीप जले।
गगन मण्डल के विशाल वक्ष पर
जगमग -जगमग चमके तारे,
धरती की इस हरी गोद के,
आज हुए तारे ये नन्हे दीपक सारे।
तारे क्यों दीपक से मन ही मन जले,
दीप जले।
कुण्ठा और भ्रम मन से सभी त्याग
लेलें प्रेम और सदभाव का गुण ,
दिए से दिल में हो तेल सा दया का सागर
प्रेम की बाती हो मन रहे ना रुग्ण।
अवचेतन से उठ चेतन की ओर चले,
दीप जले।
अंधियारा हो तल में चाहे
जग को उजियारा दे दें ,
लौ प्रेम की उठे प्रेम की बाती से
ग़म लें सबके और खुशियां दे दें।
प्रेमी सुर में गम के गीत ढले ,
दीप जले।
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